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‘बराबरी पर सिर्फ सवाल नहीं उठाना है, उसे सामान्य बनाना है’, रानी मुखर्जी ने ‘मर्दानी 3’ को लेकर की बात

Rani Mukherji Exclusive Interview on Mardaani 3: अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने पत्रिका से बातचीत करते हुए अपनी हालिया फिल्म 'मर्दानी 3' पर बात की है।

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Rani Mukherji Exclusive Interview on Mardaani 3

Rani Mukherji Exclusive Interview (सोर्स- एक्स)

Rani Mukherji Exclusive Interview on Mardaani 3: करीब डेढ़ दशक में तीसरी बार रानी मुखर्जी अपने दमदार किरदार शिवानी शिवाजी रॉय के साथ बड़े पर्दे पर लौटी हैं। 'मर्दानी-3' सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा और जागरूकता का जरूरी और सशक्त संदेश है। पत्रिका से खास बातचीत में रानी मुखर्जी ने अपने किरदार के बदलते सफर, महिला-केंद्रित सिनेमा, समाज की जरूरतों और अपनी निजी सोच पर खुलकर बात की।

शिवानी शिवाजी रॉय की बदली हुई यात्रा (Rani Mukherji Exclusive Interview on Mardaani 3)

मर्दानी के शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार में लौटना मेरे लिए मानसिक और भावनात्मक रूप से बिल्कुल अलग अनुभव रहा। जैसे-जैसे इंसान की जिंदगी आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे अनुभव भी जुड़ते जाते हैं। मर्दानी साल 2012 में आई थी और अब 2026 में मर्दानी-3 आ रही है। इस लंबे सफर में शिवानी का पद भी बदला है और उसका नजरिया भी। पहले वह क्राइम ब्रांच की अधिकारी थी, मर्दानी-2 में वह एसएसपी बनी और अब मर्दानी-3 में उसका पद फिर बदल चुका है। अब शिवानी पहले से कहीं ज्यादा अनुभवी है, उसने कई कठिन केस सुलझाए हैं और इसी वजह से इस बार उसका व्यक्तित्व थोड़ा अलग और ज्यादा परिपक्व है।

'यूनिफॉर्म में ताकत का अहसास'

मर्दानी-3 एक अहम सामाजिक मुद्दे पर बात करती है। देश में आज मिसिंग गर्ल्स एक बहुत बड़ी समस्या बन चुकी है। इतनी सारी छोटी बच्चियां गायब हो रही हैं और उनके साथ अलग-अलग तरह के अपराध हो रहे हैं। यह फिल्म उस पूरे नेक्सस को दिखाती है कि क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है और क्यों हो रहा है। मुझे लगता है कि मर्दानी देखने के बाद लड़कियों को एक तरह की ताकत महसूस होती है। जब एक महिला यूनिफॉर्म पहनती है और शिवानी शिवाजी रॉय जैसी बनती है, तो वही पावर हर महिला में ट्रांसफर होती है। उन्हें यह अहसास होता है कि हम भी लड़ सकते हैं, खुद को बचा सकते हैं, बस हमें जागरूक होने की जरूरत है।

'डिस्टर्बिंग कंटेंट भी जरूरी है'

मर्दानी-3 के दौरान लगभग हर सीन मेरे लिए चुनौतीपूर्ण रहा, क्योंकि फिल्म का विषय ही थोड़ा डिस्टर्बिंग है। लेकिन मैं हमेशा यही मानती हूं कि दर्शकों तक कभी-कभी डिस्टर्बिंग कंटेंट भी पहुंचना चाहिए। जब तक हम ऐसे मुद्दों को देखेंगे नहीं, उन पर चर्चा नहीं करेंगे, तब तक समाज में जागरूकता भी पैदा नहीं होगी। सिनेमा का काम सिर्फ मनोरंजन करना नहीं, बल्कि सवाल उठाना और सोचने पर मजबूर करना भी है।

'महिला-केंद्रित कहानियों में अलग तरह की ईमानदारी'

आज महिला-केंद्रित फिल्में ज्यादा बन रही हैं और मैं इस बदलाव को बहुत सकारात्मक रूप से देखती हूं। मुझे बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि मैं हमेशा से यही मानती आई हूं कि असल में फिल्म अच्छी या बुरी होती है, मेल या फीमेल सेंट्रिक नहीं। अगर किसी किरदार में गहराई है, एक मजबूत कैरेक्टर आर्क है, तो वह कहानी अपने आप दर्शकों से जुड़ जाती है। मैं कभी यह सोचकर फिल्म नहीं करती कि यह मेल-सेंट्रिक है या फीमेल-सेंट्रिक। अगर कहानी मुझे पसंद आती है और मुझे लगता है कि इसे दर्शकों तक पहुंचना चाहिए, तो मैं उस फिल्म का हिस्सा बनती हूं। हां, महिलाओं के नजरिये से बनी कहानियों में एक अलग तरह की ईमानदारी और इंटरेस्टिंग लेयर होती है।

अपने तरीके से जियो जिंदगी- रानी

मैंने जो दौर देखा है, जो सीखा है, जो गलतियां की हैं, उन सबने मिलकर मुझे आज की रानी मुखर्जी बनाया है। दर्शकों ने हर दौर में मेरा साथ दिया, मुझे स्वीकार किया और सराहा। इसलिए मैं बस यही कहूंगी कि अपने तरीके से जिंदगी जियो, अपने अनुभव खुद हासिल करो।

'पुरुष को बराबरी का हक मांगते नहीं देखा होगा'

जो लड़कियां आज मुझे शिवानी शिवाजी रॉय के रूप में देखती हैं, उन्हें मैं यही कहना चाहती हूं कि जब हम किसी पीड़ा से गुजरते हैं, किसी बच्ची के अपहरण, किसी लड़की के साथ हिंसा, एसिड अटैक या घरेलू अत्याचार की खबर सुनते हैं तो डर लगना स्वाभाविक है। लेकिन हमें खुद को इतना सशक्त बनाना होगा कि हम एक-दूसरे की मदद कर सकें, एक-दूसरे को जागरूक कर सकें। जितना हम इन मुद्दों पर खुलकर बात करेंगे, उतना ही हम खुद को और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित बना पाएंगे। हमें लड़कियों को सम्मान देना, समान अधिकार और समान अवसर की बात को नॉर्मलाइज करना होगा। कभी कोई आदमी यह नहीं कहता कि उसे बराबरी चाहिए, क्योंकि उसे पहले से मिलती है। यही सोच बदलनी होगी।

कैमरे के बाहर की रानी

काम के अलावा मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी मेरी मम्मी के हाथ का खाना, अपनी बेटी और पति के साथ समय बिताना है। उनके साथ छुट्टियों पर जाना, छोटी-छोटी खुशियां और सेलिब्रेशन, यही मुझे सबसे ज्यादा सुकून देता है।

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