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पुष्करणा सावा – टप्पा गीतों में है रिश्तों की मधुर मिठास, मसखरी के साथ बनता है हंसी खुशी का माहौल

विवाह के दौरान होने वाली पारंपरिक मांगलिक रस्मों के अपने गीत हैं।

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फोटो-पत्रिका।

फोटो-पत्रिका।

पुष्करणा ब्राह्मण समाज में होने वाले वैवाहिक कार्यक्रमों की मधुर मिठास और ऐतिहासिकता पारंपरिक गीतों में झलकती है। विवाह के दौरान होने वाली पारंपरिक मांगलिक रस्मों के अपने गीत हैं। इन गीतों में मांगलिक परंपरा का न केवल महत्व छुपा रहता है, बल्कि दो परिवारों के मधुर रिश्तों का मजबूत गठजोड़ भी नजर आता है। इन्ही मांगलिक गीतों के साथ-साथ ‘टप्पा’ गीतों के गायन की भी परंपरा है। टप्पा गीतों में रिश्तों की न केवल मधुर मिठास नजर आती है, बल्कि दूल्हा-दुल्हन के परिवारों में आपसी मसखरी, प्रेम, सौहार्द और अपनापन भी नजर आता है। विवाह की प्रत्येक मांगलिक रस्म के दौरान इन टप्पा गीतों का गायन महिलाएं आवश्यक रूप से करती हैं।

‘टप्पा’ गीतों से बनता है माहौल
पुष्करणा समाज में विवाह की मांगलिक परंपराओं खोळा, प्रसाद, मिलनी, हाथधान, खिरोड़ा, मायरा, छींकी, बारात, दाल, तोरण, गुड्डी जान व बरी सहित सभी मांगलिक गीतों में टप्पा गीतों का गायन होता है। जब वर पक्ष की महिलाएं वधू पक्ष के यहां और वधू पक्ष की महिलाएं वर पक्ष के यहां पहुंचती हैं, तो टप्पा गीतों का गायन करती हैं। ये गीत दोहों के रूप में हैं, जिनको सस्वर सामूहिक रूप से गाया जाता है।

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‘टप्पा’ गीत न केवल मसखरी और हंसी मजाक के रूप में होते हैं, बल्कि मांगलिक रस्म के दौरान अगर किसी प्रकार की कमी नजर आती है, तो उसको भी टप्पा गीत के रूप में गाया जाता है। जैसे पानी, स्थान आदि की कमी होने पर ‘और बात री रेळ पेळ पोणी री सकड़ाई रे’ अथवा ‘और बात री रेळ पेळ जगह री सकडाई रे’ के माध्यम से ध्यान आकृष्ट किया जाता है। सगे के सिर पर पाग न होने पर ‘हाथ में हाथ बाजार बाजार में काथो, लाजो मरू ओ सगाजी थ्होरो ऊगाडों माथौ’। सगे के दिखाई नहीं देने पर ‘इणगी जोऊ उणगी जोऊ सगोजी कठै न दीखै रे’। इसी प्रकार विवाह वाले घर में किसी व्यक्ति की ओर से हर काम में उपिस्थति होने पर ‘छमक कटोरी छमक चणा, सगोजी रे घर में पंच घणा’। टप्पा गीतों में रिश्तों की मधुर मिठास और अपनापन नजर आता है।