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कबड्डी की पकड़ भी पड़ रही ढीली… पारंपरिक खेलों पर क्रिकेट भारी

गांवों में बदली खेल संस्कृति की तस्वीर, ग्रामीण खेल संस्कृति में बदलाव का संकेत

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बज्जू में क्रिकेट खेलते खिलाड़ी।

बज्जू में क्रिकेट खेलते खिलाड़ी।

भागीरथ ज्याणी

बज्जू. खेलों की दुनिया में क्रिकेट का प्रभाव इस कदर बढ़ गया है कि गांवों में पारंपरिक खेल धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए हैं। किशोरों से युवाओं और बुजुर्गों में क्रिकेट अब सबसे पसंदीदा खेल बन चुका है। बड़े शहरों से शुरू हुआ क्रिकेट का यह जुनून अब गांवों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। गांवों की गलियों और मैदानों में दिन के साथ अब रात्रिकालीन क्रिकेट प्रतियोगिताओं का आयोजन हो रहा है। क्षेत्र के अधिकांश गांवों में केवल क्रिकेट प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं। समाज से ग्रामीण स्तर तक क्रिकेट टूर्नामेंट हो रहे हैं। अब गांवों की लड़कियां भी क्रिकेट में रुचि लेने लगी हैं, जो ग्रामीण खेल संस्कृति में बदलाव का संकेत है।

क्रिकेट का क्रेज

क्रिकेट अब सिर्फ खेल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक आयोजन का रूप ले चुका है। प्रतियोगिताओं में आसपास के गांवों की टीमें भाग ले रही हैं और दर्शकों की उपस्थिति भी बढ़ रही है। आयोजनों पर खर्च किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में क्रिकेट को लेकर माहौल बन रहा है। हरिराम ज्याणी ने बताया कि एक समय गांवों में कबड्डी और वॉलीबॉल प्रमुख खेल हुआ करते थे, लेकिन अब ये खेल लोगों की स्मृतियों तक सीमित रह गए हैं। फुटबॉल का दौर आया, लेकिन अब उसकी चमक भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। खो-खो, रस्साकशी, संतोलिया, लंबी दौड़, ऊंची कूद, एक पांव दौड़ और जलेबी सहित अनेक पारंपरिक ग्रामीण खेलों का अस्तित्व अब लगभग समाप्त हो चुका है।

संस्कृति से जुड़े थे खेल
रामेश्वरलाल गायणा ने बताया कि पुराने खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा थे। शाम के समय चौपालों पर लोग एकत्र होकर खेल खेलते थे, जिससे आपसी मेलजोल और सामाजिक जुड़ाव बना रहता था। अब न केवल ये खेल कम हो गए हैं, बल्कि सामाजिक सहभागिता भी घटती जा रही है। ग्रामीणों का मानना है कि पारंपरिक खेलों को फिर से प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। स्कूल, पंचायत स्तर और ग्रामीण मेलों में इन खेलों को शामिल कर नई पीढ़ी को अपनी खेल संस्कृति से जोड़ा जा सकता है।

स्कूल स्तर पर भी सीमाएं..
शारीरिक शिक्षक बृजलाल खिलेरी, ओमप्रकाश बिश्नोई, कैलाश खिलेरी और प्रकाश मेघवाल ने बताया कि स्कूलों में खेलों के लिए कोई अतिरिक्त कक्षाएं नहीं होतीं और खेल विषय अनिवार्य नहीं है। इसी कारण स्कूल स्तर पर भी युवाओं में अन्य खेलों में महत्व कम ही देते है।

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