
The system failed: the bicycles were delivered, but the wheels wouldn't turn; the students dragged their broken dreams home.
सरकार की मंशा थी कि बेटियों का सफर आसान हो, लेकिन जिम्मेदारों की लापरवाही ने इस सफर को और मुश्किल बना दिया। शनिवार को शहर में नि:शुल्क साइकिल वितरण के दौरान एक अजीब नजारा देखने को मिला। छात्राओं को साइकिलें तो मिलीं, लेकिन वे उन पर सवार होकर घर नहीं जा सकीं, बल्कि पैदल घसीटते हुए ले जाने को मजबूर हुईं।
शहर के सेठ मुरलीधर मानसिंहका राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय समेत जिलेभर के कई स्कूलों में शनिवार को भी साइकिल वितरण का कार्यक्रम हुआ। लेकिन, यहां भारी अव्यवस्था देखने को मिली। स्कूल प्रबंधन ने साइकिलों को 'रेडी' (तैयार) कराने की जहमत तक नहीं उठाई। छात्राओं को थमाई गई साइकिलों के टायरों में न हवा थी, न चेन चढ़ी हुई थी और न ही सीटें कसी हुई थीं।
साइकिल पाकर छात्राओं के चेहरों पर जो मुस्कान आई थी, वह चंद मिनटों में परेशानी में बदल गई। एक छात्रा ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा, हमें साइकिल मिलने की बहुत खुशी है, लेकिन हम इसे चलाकर नहीं ले जा सकते। टायरों में हवा ही नहीं है। सोचा था साइकिल पर घर जाएंगे, अब इसे पैदल लेकर जाना पड़ रहा है।
वितरण के बाद सड़क पर अजीब स्थिति थी। कई छात्राएं अपनी नई साइकिलों को पैदल धकेलती हुई नजर आईं। वहीं, कई अभिभावक अपनी बेटियों की साइकिलों को स्कूटर या बाइक पर लादकर ले जाते दिखे। जिन छात्राओं के परिजन नहीं आए थे, उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ा। स्कूल प्रबंधन ने साइकिलों को वितरण से पहले चेक क्यों नहीं किया? क्या सिर्फ लक्ष्य पूरा करने के लिए बिना हवा और बिना मेंटेनेंस की साइकिलें बांट दी गईं। अधिकांश साइकिलों के दोनों टायरों में हवा नदारद थी। अभिभावकों का कहना था कि कम से कम साइकिल चलाने योग्य तो दी जानी चाहिए थी।
Published on:
25 Jan 2026 09:17 am
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