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दूषित पानी से दानवाखेड़ा में खुजली का प्रकोप, पहले दो बच्चों की जा चुकी जान, फिर भी प्रशासन बेपरवाह

दनवाखेड़ा में आज भी नहीं पहुंचा शुद्ध पेयजल, आवेदन-ज्ञापन तक सीमित रही कार्रवाई बैतूल। जिले के शाहपुर विकासखंड के आदिवासी गांव दानवाखेड़ा में दूषित पेयजल ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है। गांव में गंदे पानी से फैली उल्टी-दस्त की बीमारी ने पहले ही दो मासूम बच्चों की जान ले ली है, लेकिन इसके […]

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दनवाखेड़ा में आज भी नहीं पहुंचा शुद्ध पेयजल, आवेदन-ज्ञापन तक सीमित रही कार्रवाई

बैतूल। जिले के शाहपुर विकासखंड के आदिवासी गांव दानवाखेड़ा में दूषित पेयजल ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है। गांव में गंदे पानी से फैली उल्टी-दस्त की बीमारी ने पहले ही दो मासूम बच्चों की जान ले ली है, लेकिन इसके बावजूद आज तक गांव में शुद्ध पेयजल की स्थायी व्यवस्था नहीं की जा सकी। यह गंभीर मामला श्रमिक आदिवासी संगठन एवं समाजवादी जन परिषद द्वारा कलेक्टर को दिए गए आवेदन में उजागर किया गया है।
आवेदन के अनुसार दानवाखेड़ा एक आदिवासी बाहुल्य गांव है, जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। गांव में न तो पक्की सडक़ है, न बिजली की समुचित व्यवस्था और न ही पीने के साफ पानी का इंतजाम। दो माह पूर्व दूषित पानी के सेवन से गांव में उल्टी-दस्त का प्रकोप फैला, जिसमें दो नन्हे बच्चों की मौत हो गई। यह घटना प्रशासन की संवेदनहीनता और स्वास्थ्य तंत्र की नाकामी का बड़ा उदाहरण मानी जा रही है। बताया गया है कि दिसंबर माह की शुरुआत में प्रशासनिक अमले ने गांव का दौरा किया था और साफ पानी उपलब्ध कराने के आश्वासन भी दिए गए। अधिकारियों ने हैंडपंप खुदवाने और टैंकर से पानी सप्लाई करने की बात कही, लेकिन यह आश्वासन कागजों से आगे नहीं बढ़ सके। ग्रामीणों का आरोप है कि सडक़ निर्माण के नाम पर केवल औपचारिकताएं पूरी की गईं, जबकि पेयजल संकट जस का तस बना हुआ है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बीमारी का प्रकोप अब भी जारी है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग और पंचायत स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। ग्रामीणों को मजबूरन दूषित जल का उपयोग करना पड़ रहा है, जिससे भविष्य में और जनहानि की आशंका बनी हुई है। आवेदन में मांग की गई है कि दनवाखेड़ा गांव में तत्काल शुद्ध पेयजल की व्यवस्था की जाए, साथ ही सडक़, बिजली और स्वास्थ्य जैसी अन्य मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी और मौत का इंतजार कर रहा है? या फिर आदिवासी गांवों की समस्याएं सिर्फ फाइलों और ज्ञापनों तक ही सिमटकर रह जाएंगी?।

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