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चीन में एआई जज सुना रहे फैसले, क्या भारत में कम हो सकता है मुकदमों का अंबार?

Artificial Intelligence Judiciary: चीन में एआई जज तकनीक के जरिए अदालतों में तेजी से फैसले सुना रहे हैं, जिससे मुकदमों का निस्तारण मिनटों में हो रहा है। भारत में भी लंबित मामलों के बोझ को कम करने के लिए एआई आधारित न्यायिक प्रणालियों की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है।

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एआई आधारित कोर्ट सिस्टम के जरिए चीन में मुकदमों का निस्तारण कुछ ही मिनटों में किया जा रहा है। (X/@BimalGST)

China AI judge: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) युग में क्या एआई जज को भारत में लंबित मुकदमों के अंबार से निपटने का जिम्मा दिया जा सकता है? चीन के हांग्जो में शाओ जी एआइ कोर्ट का उदाहरण इस सवाल का जवाब दे सकता है। यहां पिछले दिनों एआई टूल (जज) ने लोन और एग्रीमेंट से संबंधित 10 विवादों के सबूत एक साथ देखे, बहस पढ़ी और फैसला कर दिया। इन फैसलों का मानव जज ने मूल्यांकन किया और 30 मिनट में मुकदमों का निस्तारण हो गया।

भारत की निचली अदालतों में 4.76 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमें 3.59 करोड़ केस एक साल से अधिक पुराने हैं। सालों से लंबित मुकदमे भारतीय न्यायपालिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। अब एआई में इसका समाधान खोजा जाने लगा है। हालांकि, भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल कोर्ट में फैसलों के लिए एआई का उपयोग नहीं होगा। सिस्टम को तेज बनाने के लिए नई संभावनाएं लगातार तलाशी जा रही हैं। इसके लिए कुछ बेहद अनूठी पहल हो रही है।

खतरे भी कम नहीं: पूर्वाग्रह से बचाना बड़ी चुनौती

दरअसल, इंटरनेट पर मौजूद सामग्री एआई को प्रशिक्षित करने में अहम भूमिका निभाती है, भेदभावपूर्ण सामग्री की भरमार है। तकनीक को ताकत देने वाले विशेषज्ञ भी अक्सर अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं रह पाते। नतीजतन, एआई के भी विभिन्न प्रकार के आग्रहों-दुराग्रहों का शिकार होने का जोखिम बना हुआ है। अमेरिका में अश्वेतों के प्रति एआई में पूर्वाग्रह मिलने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में तो यह खतरा और बढ़ जाता है। इसलिए यहां फूंक-फूंककर कदम बढ़ाया जा रहा है।

कोर्ट रूम में बढ़ती तकनीक

1)- ई फाइलिंग : सुप्रीम कोर्ट में केस फाइलिंग में एआई का उपयोग शुरू किया जा रहा है। इसके जरिए वकालतनामा दाखिल करते समय समय अगर कोई दस्तावेज नहीं दिया गया है तो इसे पकड़ा जा सकता है। अकेले केरल में इस तरह की स्क्रीनिंग 50 हजार के करीब पहुंचने को है, जहां एआई का उपयोग बढ़ाया जा रहा है।

2)- अनुवाद : सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर यानी सुवास के जरिए सुप्रीम कोर्ट के एक लाख के करीब निर्णयों का अनुवाद किया गया है। इससे आम नागरिकों को स्थानीय भाषाओं में आदेश पढ़ने में मिल रहा है। करीब 18 भारतीय भाषाओं में यह अनुवाद हो रहा है।

3)- टेरेस : सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक पीठ की सुनवाई के दौरान एक एआई टूल टेरेस यानी टेक्नोलॉजी इनेबल्ड रेजोल्यूशन एंड एन्हांस्ड सिस्टम बहस दर्ज कर रहा है। हालांकि, स्टाफ इसके लिखे हुए का मूल्यांकन करता है। इससे सुनवाई की गति बढ़ रही है। भारत में ही विकसित टेरेस के उपयोग से सिंगापुर और दुबई में कोर्ट के बाहर समाधान निकाला जा रहा है।

4)- अदालत एआई : देश की नौ हाईकोर्ट ने इस एआई आधारित टूल का उपयोग शुरू कर दिया है, तो पांच अन्य में यह प्रायोगिक तौर पर अपनाया गया है। इसके जरिए कोर्ट में गवाहों के बयान, जिरह, आदि को दर्ज किया जा रहा है। यह स्थानीय भाषाओं में भी उपयोग हो रहा है। यह अदालती भाषा को ठीक से समझने के लिए बना है।

जरूरत : क्योंकि, न्याय में देरी भी 'अन्याय'

-निचली अदालतों में 9 जनवरी 2026 तक 1.10 करोड़ सिविल और 3.65 करोड़ आपराधिक मामले लंबित। इनमें से 29 फीसदी एक से तीन साल तो 16 फीसदी तीन से पांच साल पुराने।
-कुल लंबित मुकदमों में हाईकोर्ट के 63.75 लाख और सुप्रीम कोर्ट के 92.1 हजार मिला दें तो संख्या करीब साढ़े 5 करोड़ पहुंच जाती है।

चीन: संपत्ति विवाद में एआई जज की बढ़ी भूमिका

चीन की सुप्रीम पीपल्स कोर्ट यानी एसपीसी ने वर्ष 2022 में स्मार्ट कोर्ट के लिए जारी गाइडलाइन में 2025 तक एआई टूल उपयोग करने और 2030 तक न्यायिक प्रक्रिया में एआई को पूरी तरह उपयोग करने की समय सीमा तय की गई है। अकेले 2023 में स्मार्ट कोर्ट ने 70,635 मुकदमे सुने, इनमें 98.05 फीसदी में ऑनलाइन फाइलिंग और 99.71 फीसदी में रिमोट सुनवाई हुई। आज संपत्ति के विवादों में यह स्मार्ट कोर्ट मुख्य कानूनी प्रश्न तय कर रही हैं और सुनवाई के बाद निर्णय का 70 फीसदी हिस्सा लिख रही हैं।

अमेरिका: क्या अपराध दोहराएगा, एआई से जांच

चीन से उलट अमेरिकी न्यायपालिका में एआई का इस्तेमाल बहुत सावधानी और सीमित तरीके से हो रहा है। फोकस एथिकल नियमों, जोखिम समझने और काम को आसान बनाने पर है। कंपास जैसे एआई टूल से किसी अपराध में शामिल अपराधी जांचा जा रहा है कि वह फिर से तो अपराध नहीं करेगा। इससे परोल और बेल में मदद ली जा रही है। कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क जैसे राज्यों ने जजों को एआई से मिले आउटपुट की खुद जांच करके ही उन्हें काम में लेने के निर्देश दिए हैं।

यूरोपीय संघ : एआई न्यायपालिका में जोखिमपूर्ण

वर्ष 2024 के अगस्त में यूरोपीय संघ में दुनिया का पहला प्रमुख एआइ कानून पारित हुआ जो अगस्त 2026 से पूरी तरह लागू होगा। इसमें एआइ के न्यायपालिका में उपयोग को जोखिमपूर्ण मानते हुए सख्त नियम रखे गए हैं। नए एआइ टूल को प्रयोग के तौर पर अपनाया जा रहा है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया के हर पहलू को मानव नियंत्रित रखने पर जोर दिया जा रहा है।