Chhattisgarh woman Everest climber Amita Shrivas: छत्तीसगढ़ की अमिता श्रीवास ने -40 डिग्री तापमान, ऑक्सीजन की कमी और दो साथियों की मौत जैसे कठिन हालातों के बीच माउंट एवरेस्ट फतह कर तिरंगा फहराया।
रायपुर@गुंजन परमार। Amita Shrivas Everest success story: सपने देखने से ज्यादा जरूरी उन्हें पूरा करने का साहस होता है। अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत लगातार हो, तो कोई भी ऊंचाई असंभव नहीं रहती। यह कहना है पर्वताराेही अमिता श्रीवास का। जांजगीर-चांपा जिले की पर्वतारोही अमिता श्रीवास ने 22 मई को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8,848 मीटर) पर तिरंगा फहराया।
रायपुर पहुंची पर्वताराेही अमिता ने पत्रिका को बताया कि, बेस कैंप लौटते समय मौसम खराब होने और ऑक्सीजन की कमी के कारण वे गंभीर फ्रॉस्टबाइट का शिकार हो गईं, जिसके काठमांडू के हास्पिटल में भर्ती हाेना पड़ा। कठिन चढ़ाई करते हुए ग्रुप के दो साथियों की जान भी चली गई। इस दर्दनाक अनुभव ने मुझे भीतर से और मजबूत बना दिया। अमिता श्रीवास आंगनबाड़ी कार्यकर्ता है, उन्हाेंने पर्वतारोहण की शुरुआत करीब 26 साल की उम्र में की थी। उनका मानना है कि, अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।
सामान्य परिवार से आने वाली अमिता ने बताया कि बचपन में डिस्कवरी चैनल पर रॉक क्लाइंबिंग देखकर उनके मन में यह सपना जगा। 2017-18 में पर्वतारोहण की शुरुआत की और धीरे-धीरे इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्हाेंने बताया कि, रॉक क्लाइंबिंग से शुरुआत कर खुद को इस कठिन क्षेत्र के लिए तैयार किया। पर्वतारोहण में जेंडर नहीं, बल्कि हिम्मत, अनुशासन और मानसिक मजबूती सबसे जरूरी है। किलिमंजारो जैसी अंतरराष्ट्रीय चोटी फतह कर उन्होंने अपनी पहचान मजबूत की। मेरा सपना अब अलग-अलग महाद्विपाें के ऊंची चोटियों को फतह करना है।
अमिता श्रीवास ने बताया कि, र्वतारोहण के दौरान -40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान का सामना करना पड़ा। 8,000 मीटर से ऊपर ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम हो जाता है, जिससे शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। इस दौरान फ्रॉस्टबाइट जैसी गंभीर शारीरिक समस्याएं भी सामने आईं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।लगभग 40 से 45 दिनों की कठिन चढ़ाई और यात्रा के दौरान ग्रुप के दो साथियों की जान चली गई। लगातार कठिन परिस्थितियों में मानसिक रूप से मजबूत बने रहना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी।
वे बताती है कि, शुरुआत में संसाधनों की कमी बाधा थी। प्रशिक्षण, यात्रा और पर्वतारोहण पर लाखों रुपये का खर्च आता है। परिवार को मनाना आसान नहीं था, लेकिन सरकारी और प्रशासनिक सहयोग के साथ उन्होंने अपने सपनों को आगे बढ़ाया।
अमिता श्रीवास की एवरेस्ट यात्रा यह साबित करती है कि कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी मजबूत इरादों और लगातार मेहनत के सामने टिक नहीं पातीं। -40 डिग्री तापमान, ऑक्सीजन की कमी और दो साथियों की मौत जैसे दर्दनाक अनुभवों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और विश्व की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराकर छत्तीसगढ़ और देश का नाम रोशन किया। उनकी कहानी आज हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों और संघर्षों के बीच अपने सपनों को पूरा करना चाहता है।