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बढ़ता पर्यावरणीय असंतुलन, भविष्य की आशंकाएं

वास्तव में हर वन की अपनी विशिष्ट पारिस्थितिकीय प्रकृति होती है, जिसके अनुरूप वहां पादप और जीव-जंतुओं की विविध प्रजातियां विकसित होती हैं।

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डॉ. विवेक एस. अग्रवाल, (पर्यावरण से जुड़े मामलों के जानकार)

बढ़ता तापमान, घटते वन, रेगिस्तानों से विलुप्त होती आवश्यक वनस्पतियां एवं जीव, बढ़ता समुद्री जलस्तर और इनसे जुड़े अनेक कारण भविष्य में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का संकेत देते हैं। ये परिस्थितियां मानवता के समक्ष खड़ी हो रही गहरी आशंकाओं को भी रेखांकित करती हैं। विडंबना यह है कि विगत कई दशकों से दुनिया में शायद ही किसी अन्य समस्या पर उतनी चर्चा हुई हो, जितनी पर्यावरण को लेकर हुई है। इसके बावजूद वैश्विक परिदृश्य चिंता की रेखाओं को और गहरा करता जा रहा है। पर्यावरण संतुलन का सबसे महत्त्वपूर्ण मानदंड बढ़ते तापमान को नियंत्रित करना है, किंतु लगभग सभी देश इस दिशा में अपेक्षित सफलता से अभी भी कोसों दूर हैं। तापमान पर प्रभावी नियंत्रण के बिना प्रकृति के अन्य महत्त्वपूर्ण संसाधनों का संरक्षण भी लगभग असंभव प्रतीत होता है। 'प्रकृति ही जीवन है और जीवन ही प्रकृति'- इस तथ्य पर लगभग सभी सहमत हैं, लेकिन इसे व्यवहार में उतारने में बरती जा रही लापरवाही तथा स्वयं जिम्मेदारी लेने के बजाय दूसरों से अपेक्षा करना ही पारिस्थितिकीय असंतुलन का मूल कारण बन गया है।

विगत पांच वर्षों के पारिस्थितिकीय आंकड़ों का अध्ययन करें तो स्पष्ट होता है कि रेगिस्तानों ने अपना स्वरूप बदल लिया है। जंगल, अग्निकांड जैसी अप्राकृतिक आपदाओं के कारण संकुचित हो रहे हैं और अत्यधिक दोहन के चलते अनेक देशों में समुद्री जलस्तर बढ़ रहा है। यही स्थिति पर्वतीय क्षेत्रों की भी है, जहां बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने से प्राकृतिक आपदाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने से प्राकृतिक आपदाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। हर वर्ष की तरह इस बार भी विश्व पर्यावरण दिवस पर पूरी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की जाएगी, लेकिन अधिकांश प्रयास आयोजन की सीमाओं तक ही सिमट जाते हैं। पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए केवल क्षणिक उपाय पर्याप्त नहीं हैं।

स्थायी और दीर्घकालिक प्रयासों के बिना प्राकृतिक क्षरण को नहीं रोका जा सकता। सामान्य धारणा है कि पर्याप्त संख्या में पेड़ लगा देने से पारिस्थितिक संतुलन स्थापित हो जाएगा, लेकिन यह वास्तविक क्षतिपूर्ति नहीं है। भारत में शहरीकरण, विकास परियोजनाएं, कृषि विस्तार तथा जंगली आग की घटनाओं के कारण वन क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं। वास्तव में हर वन की अपनी विशिष्ट पारिस्थितिकीय प्रकृति होती है, जिसके अनुरूप वहां पादप और जीव-जंतुओं की विविध प्रजातियां विकसित होती हैं। यही जैव विविधता प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने से भविष्य में पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।

पारिस्थितिक संतुलन के लिए केवल वन ही नहीं, बल्कि रेगिस्तान भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। बढ़ती आबादी, औद्योगीकरण और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के कारण जहां प्राकृतिक रेगिस्तानों का स्वरूप बदल रहा है, वहीं बढ़ते तापमान, वनस्पति क्षेत्र में कमी और भूजल के अंधाधुंध दोहन से नए मरुक्षेत्र भी विकसित हो रहे हैं। इन कृत्रिम मरुस्थलों में जैव विविधता का स्वाभाविक विकास संभव नहीं हो पाता। अनुमान है कि विश्वभर में प्रतिवर्ष लगभग सवा करोड़ हेक्टेयर भूमि अनुपजाऊ या शुष्क होती जा रही है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि बढ़ती जनसंख्या और विकास गतिविधियों के लिए भूमि की मांग लगातार बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से समुद्री जलस्तर में वृद्धि हो रही है। जिसके कारण प्राकृतिक आपदाओं की संख्या बढ़ी हैं।

ये आपदाएं मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना को गहरा आघात पहुंचाती हैं। जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव मौसम चक्र पर भी दिखाई दे रहा है जो आमजन के जीवन को भी प्रभावित कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप तूफान, बाढ़, बादल फटना, अत्यधिक गर्मी और असामान्य ठंड जैसी घटनाओं में वृद्धि हुई है। इन परिस्थितियों के बावजूद प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में उत्तरदायित्व का भाव पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं देता। हमारा प्रत्येक व्यवहार पर्यावरण संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बिना सोचे-समझे संसाधनों का उपयोग अंतत: प्राकृतिक संपदा के विनाश का कारण बनता है। केवल एक दिन की चिंता या पौधारोपण, वर्ष भर के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार की भरपाई नहीं कर सकता। इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर जागरूकता, आत्मबोध और अनुशासित जीवनशैली की आवश्यकता है।