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खतरे की घंटी: ढलान पर जन्मदर; छोटे परिवार की चाहत से ‘बूढ़ा’ हो रहा युवा भारत

falling fertility: भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 पर पहुंच गई है। छोटे परिवार की बढ़ती चाहत, महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक बदलावों के बीच देश में जन्मदर लगातार गिर रही है। जानिए कैसे यह बदलाव आने वाले दशकों में भारत को युवा देश से वृद्ध समाज की ओर ले जा सकता है और इसके आर्थिक-सामाजिक प्रभाव क्या होंगे।

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प्रतीकात्मक तस्वीर (IANS)

India fertility rate: एक समय भारत में स्कूल, अस्पताल और सार्वजनिक स्थलों पर ‘छोटा परिवार, सुखी परिवार’ या ‘हम दो-हमारे दो’ जैसे स्लोगन लिखे नजर थे। 70 के दशक में तो जनसंख्या नियंत्रण के लिए नसबंदी अभियान तक चलाए गए। यानी आबादी बड़ी चिंता थी और परिवार नियोजन को विकास की शर्त माना गया। लेकिन छह दशक बाद तस्वीर बदल गई। अब चिंता ज्यादा नहीं, बच्चे कम पैदा होने पर है। हालिया जनसांख्यिकीय आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में सबसे बड़ी और युवा आबादी वाले भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) घटकर 1.9 पर आ गई है। यानी औसतन एक भारतीय महिला दो से भी कम बच्चों को जन्म दे रही है, जो 1985 में 4.6 था। किसी भी देश में आबादी को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने के लिए 2.1 की दर आवश्यक मानी जाती है। इससे नीचे जाने का अर्थ है कि आने वाले दशकों में आबादी की वृद्धि धीमी पड़ेगी और फिर यह घटने लगेगी।

भारत अभी युवा देश है। लगभग 68 प्रतिशत आबादी कार्यशील आयु वर्ग (15-64 वर्ष) में है और 26 प्रतिशत आबादी 10 से 24 वर्ष के बीच है। लेकिन जन्मदर में लगातार गिरावट संकेत दे रही है कि आने वाले दशकों में देश की आयु संरचना तेजी से बदल सकती है। यह बदलाव इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि भारत अभी विकसित देशों जैसी समृद्धि के स्तर तक नहीं पहुंचा है। इसके बावजूद जन्मदर में गिरावट की गति कई विकसित देशों से भी तेज है। यही वजह है कि जनसंख्या विशेषज्ञ भारत को दुनिया के सामने उभरती नई जनसांख्यिकीय चुनौती का सबसे बड़ा उदाहरण मान रहे हैं।

तमिलनाडु में 1200 स्कूल बंद हो गए

भारत की आबादी आज लगभग 145 करोड़ है और अभी कुछ दशकों तक बढ़ती रहेगी। लेकिन इसके बावजूद जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या वर्ष 2001 के शिखर स्तर की तुलना में लगभग 20% कम हो चुकी है। उत्तर की अपेक्षा दक्षिण भारत के राज्यों में इसका असर दिखाई देने लगा है। तमिलनाडु में पिछले वर्ष विद्यार्थियों की कमी के कारण करीब 1200 स्कूल बंद करने पड़े। जो बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं, उनमें भी अकेले बच्चे यानी बिना भाई-बहन वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है। इससे चिंतित आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु सहित कुछ राज्यों ने तो ज्यादा बच्चे पैदा करने पर इनाम तक की घोषणा कर डाली।

दो तिहाई देशों में यही हाल

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार आज दुनिया के दो-तिहाई से अधिक देशों की जन्मदर 2.1 से नीचे पहुंच चुकी है। 1950 में दुनिया की औसत प्रजनन दर लगभग पांच बच्चे प्रति महिला थी। 2025 में यह घटकर करीब 2.2 रह गई है। जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, इटली और स्पेन जैसे देशों में तो स्थिति और गंभीर है। दक्षिण कोरिया की प्रजनन दर 1 से भी नीचे पहुंच चुकी है।

वर्षकुल प्रजनन दर (TFR)प्रति महिला औसत बच्चे
19505.95.9 बच्चे
20142.32.3 बच्चे
20212.02.0 बच्चे
20251.91.9 बच्चे

भारत की बदलती जन्मदर (TFR): 1950 में प्रति महिला औसतन 5.9 बच्चे थे, जो 2025 में घटकर 1.9 रह गए हैं।

कम होती प्रजनन दर के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

चुनौतीसंभावित प्रभाव
बुजुर्ग आबादी में तेज वृद्धिपेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और बुजुर्गों की देखभाल पर सरकारी व सामाजिक बोझ बढ़ेगा।
युवा कामगारों की संख्या में कमीअगले 20-30 वर्षों में श्रमबल घट सकता है, जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
क्षेत्रीय जनसंख्या असंतुलनदक्षिण और पश्चिम के राज्यों में कम जन्मदर, जबकि उत्तर के राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जन्मदर से राजनीति, संसाधनों के बंटवारे और प्रवासन पर असर पड़ सकता है।

राज्यवार प्रजनन दर (TFR)

राज्यटीएफआर
बिहार2.9
उत्तर प्रदेश2.6
मध्य प्रदेश2.4
राजस्थान2.3
छत्तीसगढ़2.2
झारखंड2.1

नोट: केवल 6 राज्य ही प्रतिस्थापन स्तर (2.1) या उससे ऊपर हैं।


सबसे कम प्रजनन दर (TFR) वाले राज्य/केंद्रशासित प्रदेश

राज्य/केंद्रशासित प्रदेशटीएफआर
नई दिल्ली1.2
तमिलनाडु1.3
केरल1.3
पश्चिम बंगाल1.3

दुनिया में सबसे कम टीएफआर वाले देश

देशटीएफआर
दक्षिण कोरिया0.68
अल्बानिया1.09
ताइवान1.12
बोस्निया1.15
सिंगापुर1.18
चीन1.20
लिथुआनिया1.22

चार दशक में ऐसे बदलेगी भारत की उम्र संरचना

आयु वर्ग202520502065-70
0-14 वर्ष24%18-19%15-17%
10-24 वर्ष (युवा)26%21-22%16-18%
15-64 वर्ष (कार्यशील आयु)68%61-63%58-60%
65 वर्ष+ (बुजुर्ग)7%14-20%20-23%

स्रोत: यूएनएफपीए, यूएन पॉपुलेशन प्रोजेक्शन

आज क्या है स्थिति? (2025 में 146.4 करोड़ आबादी के आधार पर)

आयु वर्गअनुमानित आबादी
10-24 वर्ष (युवा)38 करोड़
15-64 वर्ष (कार्यशील आयु)99-100 करोड़
65 वर्ष+ (बुजुर्ग)10 करोड़

क्यों घट रही है जन्मदर?

शिक्षा: विशेषज्ञों के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह महिलाओं की शिक्षा है। पिछले तीन दशक में लड़कियों की स्कूली शिक्षा में जबरदस्त वृद्धि हुई है। इससे महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता बढ़ी, विवाह की उम्र बढ़ी और परिवार के आकार को लेकर सोच बदली।

खर्च: आज शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास का खर्च पहले की तुलना में कहीं अधिक है। माता-पिता कम बच्चे चाहते हैं, लेकिन हर बच्चे पर अधिक निवेश करना चाहते हैं। यही कारण है कि भारत में निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का अनुपात 2015 के 32% से बढ़कर 2024 में 39% हो गया है।

सामाजिक बदलाव: केबल टीवी से लेकर स्मार्टफोन तक ने गांवों और छोटे शहरों को महानगरीय जीवनशैली से जोड़ दिया है। छोटे परिवार, बेहतर जीवन और उच्च आकांक्षाओं का मॉडल तेजी से फैल रहा है। इसके अलावा शिशु मृत्युदर पर नियंत्रण, गर्भनिरोधक साधनों का बढ़ता प्रयोग, देर से शादी और कॅरियर की महत्वाकांक्षा आदि।

दुनिया के लिए चेतावनी क्यों?

  • दुनिया के दो-तिहाई से अधिक देशों की प्रजनन दर 2.1 से नीचे पहुंच चुकी है। ब्राजील, ईरान, तुर्किये और थाईलैंड जैसे मध्यम आय वाले देश वर्षों पहले इस स्तर से नीचे आ चुके हैं। श्रीलंका की प्रजनन दर 1.3 और ट्यूनीशिया की 1.6 है। यहां तक कि अफ्रीका के कई देशों में भी जन्मदर तेजी से घट रही है।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आबादी का शिखर पहले की अपेक्षा जल्दी आ सकता है। भारत की आबादी अगले दो दशक में लगभग 160 करोड़ तक पहुंच सकती है। एशिया की आबादी भी 2040 के दशक में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच सकती है।