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पढ़े-लिखे और संपन्न परिवारों के ‘प्रोग्रेसिव चोले’ में घुट रहा बेटियों का दम, दहेज और प्रताड़ना का नया कॉर्पोरेट मॉडल बेनकाब

Dowry in Corporate Style: पढ़े-लिखे और संपन्न परिवारों में भी दहेज और पितृसत्ता की सोच नए रूप में सामने आ रही है। खुली मांगों की जगह अब महंगे गिफ्ट, स्टेटस, आलीशान शादी और सामाजिक दबाव के जरिए बेटियों व उनके परिवारों पर बोझ डाला जा रहा है।

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Corporate Style Dowry Harassment (AI Image)

Corporate Style Dowry Harassment: अब यह धारणा दरकने लगी है नई पीढ़ी दहेज, पितृसत्ता और महिलाओं के प्रति भेदभाव जैसी सामाजिक बुराइयों से मुक्त हो चुकी है। ट्विशा जैसे मामलों ने दिखाया है कि पढ़े-लिखे, आर्थिक रूप से सम्पन्न और खुद को प्रोग्रेसिव बताने वाले परिवारों में भी महिला विरोधी सोच कई रूपों में मौजूद है। फर्क इतना है कि अब इसका चेहरा बदल गया है। दहेज खुले तौर पर नहीं मांगा जाता, बल्कि आलीशान शादी, महंगे उपहार, कार, स्टेटस, सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक अपेक्षाओं के रूप में सामने आता है।

शादी के बाद बहू से आर्थिक योगदान, करियर और घर की दोहरी जिम्मेदारी निभाने की उम्मीद की जाती है, लेकिन बराबरी, स्वतंत्र निर्णय या असहमति को आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता। समाजशास्त्रियों का कहना है कि नई पीढ़ी में प्रताडऩा के तरीके भी बदल गए हैं। गाली-गलौज और प्रत्यक्ष हिंसा की जगह अब ताने, भावनात्मक दबाव, आर्थिक नियंत्रण और मानसिक उत्पीडऩ ने ले ली है। सच्चाई यह है कि ‘पितृसत्ता’ मरी नहीं है, बल्कि अमीर, संभ्रांत और रसूखदार युवा पीढ़ी के बीच इसने अपना 'ड्रेस कोड' बदल लिया है।

कदम-कदम पर ताने और तुलना

  • सीधे दहेज की मांग करने की बजाय महंगे गिफ्ट्स, आलीशान शादी, कार, स्टेटस और ‘लड़के के स्तर’ के नाम पर दबाव बनाया जाता है।
  • शादी को भव्य बनाने, 'रीति-रिवाजों' को निभाने और समधियों के स्वागत के नाम पर लडक़ी वालों को लाखों-करोड़ों खर्च करने पर मजबूर किया जाता है।
  • हमारे रिश्तेदारों ने अपनी बेटी को फलां कार दी थी, पर हमें गाड़ियों का कोई शौक नहीं है। ऐसे ताने लड़की के माता-पिता को मानसिक रूप से तोड़ देते हैं।
  • आधुनिक बहुओं से उम्मीद की जाती है कि वे कॉर्पोरेट जॉब करें, घर के खर्चों में वित्तीय योगदान दें, लेकिन बराबरी का अधिकार या सम्मान की बात न करें।

डराने वाले आंकड़े

एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल औसतन 7,000 से अधिक दहेज हत्याएं/संदिग्ध मौतें दर्ज होती हैं। यानी हर दिन करीब 19 से 20 लड़कियां दम तोड़ रही हैं।

विश्व बैंक के अनुसार, भारत में कुछ दशक में शादियों में वित्तीय लेन-देन में बड़ी गिरावट नहीं आई। शिक्षा बढ़ने के बावजूद अमीर परिवारों में छिपा हुआ लेन-देन बढ़ा है।

द लांसेट के मुताबिक, भारत में 15 से 49 वर्ष की महिलाओं में आत्महत्या की दर वैश्विक औसत से तीन गुना अधिक है, जिसका बड़ा कारण वैवाहिक कलह, घरेलू हिंसा है।

कैसे पहचानें 'नई उम्र की पुरानी सोच'?

जिम्मेदारी से बचना: यदि लडक़ा शादी तय होते समय कहे कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, पर मेरे माता-पिता की इच्छा के अनुरूप शादी हो, तो सतर्क हो जाएं।

आजादी पर कटाक्ष: यदि वह बातों-बातों में महिला अधिकारों के कानूनों को पक्षपाती बताता है या कामकाजी महिलाओं की स्वतंत्रता का मजाक उड़ाता है, तो उसका प्रोग्रेसिव चोला नकली है।

घर का माहौल परखें: शादी से पहले केवल लडक़े का पैकेज न देखें। यह देखें कि वह अपनी मां या बहन के साथ कैसा व्यवहार करता है और क्या उसके घर में महिलाओं को फैसले लेने का अधिकार है या नहीं।

-राजीव गुप्ता, समाजशास्त्री, जयपुर

यदि फंस गए हैं, तो क्या करें?

  • ताने या प्रताड़ना का स्क्रीनशॉट और वित्तीय लेन-देन का रिकॉर्ड रखें।
  • मायके वालों से बातें न छुपाएं। 'लोग क्या कहेंगे' के डर से समझौता न करें।
  • यदि स्थिति असहनीय हो रही है, तो कानूनी सलाह लें और घर लौट आएं। याद रखें, शादी को निभाना आपकी जिंदगी से बड़ा नहीं है।

हाईप्रोफाइल केस, जहां रसूख की भेंट चढ़ी बेटियां

आयशा आरिफ खान (2021): अहमदाबाद की इस बेटी ने कॉर्पोरेट पति की पैसों की लगातार मांग से तंग आकर साबरमती नदी में कूदकर जान दे दी थी।

विस्मया वी. नायर (2021): केरल की मेडिकल छात्रा, जिसे उसके सरकारी अधिकारी पति ने दहेज में मिली कार और सोने की शुद्धता को लेकर प्रताड़ित किया।

गीतिका शर्मा (2012): पूर्व एयरहोस्टेस, जिसने एक रसूखदार राजनेता और कॉर्पोरेट प्रोफाइल वाले मालिक के मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर सुसाइड किया था।

अंजलि मखीजा (2010): मुंबई के बेहद धनी कारोबारी परिवार की बहू, जिसने अमरीका में प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने और कम दहेज के तानों के कारण आत्महत्या कर ली।

निशा शर्मा (2003): सॉफ्टवेयर इंजीनियर निशा ने शादी के मंडप में ऐन वक्त पर कार और कैश मांगने वाले रसूखदार दूल्हे की बारात को वापस लौटाकर मिसाल पेश की थी।

पत्रिका इंस्टेंट सर्वे

1. क्या दहेज प्रथा आज भी संपन्न-शिक्षित परिवारों में किसी न किसी रूप में मौजूद है?

जवाबप्रतिशत
हां94%
नहीं4%
कुछ हद तक2%

2. क्या आपने अपने आसपास लड़की पक्ष को उपहार, कार या खर्च को लेकर ताने देते सुना या देखा है?

जवाबप्रतिशत
हां68%
नहीं26%
कभी-कभी6%

3. क्या बहू की कमाई को परिवार की आय मानना, लेकिन बराबर निर्णय का अधिकार न देना मानसिक प्रताड़ना है?

जवाबप्रतिशत
हां93%
नहीं7%

4. शादी तय करते समय आपकी नजर में सबसे महत्वपूर्ण क्या होना चाहिए?

विकल्पप्रतिशत
परिवार की आर्थिक स्थिति12%
लड़के/लड़की का पैकेज4%
विचार और आपसी सम्मान80%
सामाजिक प्रतिष्ठा4%

ऐसी सोच हो तो सम्मान मुश्किल

दहेज और पितृसत्ता का नया चेहरा अक्सर खुले तौर पर दिखाई नहीं देता, लेकिन व्यवहार और अपेक्षाओं में साफ झलकता है। यदि शादी से पहले या बाद में परिवार की ओर से लगातार 'स्टेटस' के हिसाब से खर्च की उम्मीद की जाए, महंगी कार, गिफ्ट और लग्जरी आइटम को 'प्यार' का नाम दिया जाए या 'लोग क्या कहेंगे?' कहकर दबाव बनाया जाए, तो यह चेतावनी का संकेत हो सकता है।

मिलनी और रस्मों में रकम की तुलना करना, शादी के बाद यह ताना देना कि 'उन्होंने अपनी बेटी को क्या दिया?', बहू की सैलरी को परिवार की आय मानना लेकिन उसे बराबर निर्णय का अधिकार न देना और लड़की वालों से हर मौके पर खर्च की उम्मीद रखना भी उसी सोच का हिस्सा है, जो आधुनिक दिखने के बावजूद बराबरी और सम्मान को स्वीकार नहीं करती।