हाल के वर्षों में जैसलमेर सहित प्रदेश के कई शहरों में वेपिंग शब्द युवाओं की बातचीत का हिस्सा बन चुका है। कॉलेज विद्यार्थियों और युवा पेशेवरों के बीच इसे आधुनिक जीवनशैली से जोड़कर देखा जा रहा है। कई युवा इसे पारंपरिक धूम्रपान से कम हानिकारक मानते हैं, जबकि विशेषज्ञ इस धारणा को भ्रामक बताते हैं।
सीमावर्ती रेगिस्तानी जिले में युवाओं के बीच एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है। पारंपरिक सिगरेट और तम्बाकू उत्पादों की जगह अब वेपिंग डिवाइस और ई-सिगरेट चर्चा का विषय बन रहे हैं। रंगीन डिजाइन, फलों और मिठास वाले फ्लेवर, सोशल मीडिया पर ग्लैमरस प्रस्तुति और आधुनिक गैजेट जैसी बनावट ने इसे युवा वर्ग को मोहपाश में जकड़ना शुरू कर दिया है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे निकोटिन सेवन का नया और खतरनाक स्वरूप मान रहे हैं।
हाल के वर्षों में जैसलमेर सहित प्रदेश के कई शहरों में वेपिंग शब्द युवाओं की बातचीत का हिस्सा बन चुका है। कॉलेज विद्यार्थियों और युवा पेशेवरों के बीच इसे आधुनिक जीवनशैली से जोड़कर देखा जा रहा है। कई युवा इसे पारंपरिक धूम्रपान से कम हानिकारक मानते हैं, जबकि विशेषज्ञ इस धारणा को भ्रामक बताते हैं।
पहले जहां निकोटिन सेवन का मतलब सिगरेट, बीड़ी या गुटखा माना जाता था, वहीं अब इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के माध्यम से निकोटिन शरीर तक पहुंचाया जा रहा है। इन उपकरणों में प्रयुक्त लिक्विड को गर्म कर एयरोसोल बनाया जाता है, जिसे उपयोगकर्ता सांस के जरिए शरीर में लेता है। दुनिया भर में करोड़ों युवा ई-सिगरेट और वेपिंग उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं। कई देशों में किशोरों के बीच इसका उपयोग पिछले दशक में तेजी से बढ़ा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह निकोटिन निर्भरता का नया चेहरा बनकर उभर रहा है।
-स्ट्रॉबेरी, मिंट, मैंगो और चॉकलेट जैसे फ्लेवर
-आधुनिक और स्टाइलिश गैजेट जैसी बनावट
-धुएं की बजाय भाप निकलने से कम नुकसान का भ्रम
-सोशल मीडिया रील्स और इन्फ्लुएंसर संस्कृति का प्रभाव
स्थानीय कॉलेज छात्र राहुल चौधरी बताते हैं कि कई युवाओं को शुरुआत में यह केवल फैशन का हिस्सा लगता है। अधिकांश को यह जानकारी नहीं होती कि कई वेपिंग उत्पादों में निकोटिन मौजूद होता है और इसकी लत लग सकती है।.शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि कई बार विद्यार्थी इसे तम्बाकू उत्पाद मानते ही नहीं हैं। यही गलतफहमी सबसे बड़ी चुनौती बन रही है।रेगिस्तान में बदलती जीवनशैली के साथ नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। वेपिंग का बढ़ता चलन केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के भविष्य से जुड़ा विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते जागरूकता और रोकथाम के प्रयास नहीं बढ़ाए गए तो निकोटिन निर्भरता का यह नया स्वरूप आने वाले वर्षों में बड़ी सामाजिक और स्वास्थ्य चुनौती बन सकता है।
जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. अजयसिंह के अनुसार निकोटिन किशोर मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकता है। लगातार उपयोग से लत लगने का खतरा बढ़ता है। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में फेफड़ों, हृदय और मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभावों की आशंका जताई गई है। डॉ. सिंह का कहना है कि वेपिंग को पूरी तरह सुरक्षित मानना वैज्ञानिक रूप से गलत है। युवाओं को इसके वास्तविक जोखिमों की जानकारी देना जरूरी है।
जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. मनीषा सरस्वत बताती हैं कि वेपिंग उत्पादों की मार्केटिंग सीधे युवाओं को लक्ष्य बनाकर तैयार की जाती है। चमकदार डिजाइन, आकर्षक पैकेजिंग और डिजिटल प्रचार यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि यह आधुनिक और सुरक्षित विकल्प है। जबकि वास्तविकता इससे काफी अलग हो सकती है। उनके अनुसार निकोटिन उद्योग समय के साथ अपना स्वरूप बदल रहा है, लेकिन मूल उद्देश्य नए उपभोक्ता तैयार करना ही रहता है।
- स्कूल और कॉलेजों में नियमित जागरूकता अभियान
-अभिभावकों के लिए विशेष परामर्श कार्यक्रम
-डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्वास्थ्य संबंधी तथ्य आधारित सामग्री
-स्वास्थ्य विभाग और शिक्षा विभाग की संयुक्त पहल
-युवाओं के लिए नशा-मुक्ति और परामर्श