यह आत्मघाती कदम न केवल पर्यावरण को मरुस्थल में बदल रहा है, बल्कि खेती की जमीन की उपजाऊ शक्ति को भी पूरी तरह से सोख रहा है। पिछले महज 15 दिनों के भीतर जिले के दो दर्जन से अधिक गांवों में खेतों और खलिहानों में आग लगने की विकराल घटनाएं सामने आ चुकी हैं,
जिले के ग्रामीण अंचलों में भीषण गर्मी की तपिश के बीच खेतों में नरवाई (गेहूं की कटाई के बाद बचे अवशेष) जलाने की घटनाएं तेजी से पैर पसार रही हैं। यह आत्मघाती कदम न केवल पर्यावरण को मरुस्थल में बदल रहा है, बल्कि खेती की जमीन की उपजाऊ शक्ति को भी पूरी तरह से सोख रहा है। पिछले महज 15 दिनों के भीतर जिले के दो दर्जन से अधिक गांवों में खेतों और खलिहानों में आग लगने की विकराल घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिससे सैकड़ों बीघा जमीन की नरवाई और मवेशियों के लिए कीमती भूसा जलकर खाक हो चुका है। साल में तीन फसलें लेने की अंधी होड़ में किसान गेहूं की कटाई के तुरंत बाद खेतों को खाली करने के लिए इस शार्टकट को अपना रहे हैं। हालांकि, जिला प्रशासन द्वारा लगातार दी जा रही चेतावनियों, नोटिस और दंडात्मक कार्रवाई के बावजूद भी जमीनी स्तर पर यह घातक प्रवृत्ति रुकने का नाम नहीं ले रही है।
मिट्टी परीक्षण केंद्र नौगांव के प्रभारी डॉ. प्रतीक भट्ट के वैज्ञानिक आंकड़ों ने इस प्रथा के भयावह पहलुओं को उजागर किया है। डॉ. भट्ट के मुताबिक, नरवाई को आग के हवाले करने से मिट्टी की ऊपरी परत में मौजूद जीवनदायिनी ताकत पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
एक हेक्टेयर खेत की नरवाई जलने पर नुकसान का गणित इस प्रकार है।
नष्ट होने वाले मुख्य पोषक तत्व मात्रा (प्रति हेक्टेयर)
नाइट्रोजन 37 किलोग्राम
फॉस्फोरस 47 किलोग्राम
पोटाश 112 किलोग्राम
सूक्ष्म पोषक तत्व 12 विभिन्न प्रकार के तत्व
0.5 (नाइट्रोजन), 0.6 (फॉस्फोरस) और 1.5 (पोटाश) होता है। जब किसान इसे जलाते हैं, तो इस प्राकृतिक नुकसान की भरपाई के लिए उन्हें बाजार से महंगे रासायनिक उर्वरक खरीदकर मिट्टी में मिलाने पड़ते हैं। आंकड़ों के अनुसार, केवल एक हेक्टेयर खेत में नष्ट हुए तत्वों की भरपाई करने के लिए किसान की जेब पर लगभग 5,800 रुपए का अतिरिक्त आर्थिक बोझ आ रहा है।
खेतों में आग लगाने और फिर फसलों का अधिक उत्पादन लेने के लिए अंधाधुंध यूरिया और अन्य रासायनिक खादों का उपयोग करने से मिट्टी का भौतिक ढांचा पूरी तरह बिगड़ चुका है। निरंतर आग की तपन झेलने और रसायनों के ओवरडोज से जमीन अब पत्थर की तरह कडक़ होती जा रही है। इसका सीधा असर किसानों की जेब और खेती की लागत पर दिख रहा है। कुछ साल पहले तक जिन खेतों की जुताई 35 हॉर्स पावर के ट्रैक्टर से आसानी से हो जाती थी, वहां अब कडक़ हो चुकी मिट्टी को चीरने के लिए 55 हॉर्स पावर के भारी-भरकम ट्रैक्टरों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। इससे डीजल की खपत और ट्रैक्टर का मेंटेनेंस बढ़ गया है, जिससे अंतत: किसानों की उत्पादन लागत लगातार आसमान छू रही है।
- बच्चे और बुजुर्ग निशाने परखेतों से उठने वाला यह जहरीला और घना धुआं केवल आसमान को ही मटमैला नहीं कर रहा, बल्कि इंसानी जिंदगियों में भी जहर घोल रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इस धुएं के कारण ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में गंभीर बीमारियां तेजी से पैर पसार रही हैं।
श्वसन संबंधी बीमारियां- अस्थमा, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस और सांस फूलने की समस्याएं।
घातक रोग- वायुमंडल में घुल रहे सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर के कारण कैंसर और हृदय रोग (हार्ट अटैक) का खतरा।
त्वचा व आंखें- आंखों में लगातार जलन, पानी आना और त्वचा में गंभीर संक्रमण।इस प्रदूषित हवा का सबसे क्रूर और सीधा असर मासूम बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर देखने को मिल रहा है, जिनके फेफड़े इस जहरीले धुएं को झेलने में असमर्थ हैं।
कृषि विभाग के अधिकारियों और कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को इस आत्मघाती कदम से बचने की सख्त सलाह दी है। अधिकारियों का कहना है कि नरवाई को जलाने के बजाय यदि किसान रोटावेटर या हैपी सीडर जैसी आधुनिक मशीनों का उपयोग करें, तो इस अवशेष को जोतकर सीधे मिट्टी में ही मिलाया जा सकता है। मिट्टी में दबी हुई नरवाई कुछ ही दिनों में सडकऱ बेहतरीन 'प्राकृतिक जैविक खाद का रूप ले लेती है। इससे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है और आगामी खरीफ सीजन की फसलों (जैसे सोयाबीन, उड़द) में रासायनिक खादों की आवश्यकता आधी रह जाती है। नतीजतन, किसानों की लागत कम होती है और मुनाफा दोगुना हो जाता है।
नरवाई को रोकने के लिए जिला प्रशासन इस बार बेहद कड़े रुख में नजर आ रहा है। सैटेलाइट इमेजिंग और स्थानीय पटवारियों की रिपोर्ट के आधार पर हाल ही में नरवाई जलाने वाले दर्जनों किसानों को कारण बताओ नोटिस जारी किए जा चुके हैं। इतना ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और सरकारी आदेशों के उल्लंघन के तहत कुछ चिन्हित मामलों में लापरवाह किसानों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई है। इसके बावजूद, मैदानी स्तर पर जागरूकता की कमी और खरीफ की फसल के लिए तत्काल खेत खाली करने की जल्दबाजी के कारण किसान इस विनाशकारी ढर्रे को छोडऩे को तैयार नहीं दिख रहे हैं।