एक तरफ शहर का तेजी से होता भौगोलिक विस्तार, चमचमाती नई कॉलोनियां और आधुनिक व्यावसायिक भवन हैं, तो दूसरी तरफ दम तोड़ती हरियाली, कंाक्रीट के बढ़ते जंगल और हर साल रिकॉर्ड तोड़ता पारा है।
विश्व पर्यावरण दिवस के विशेष अवसर पर यदि हम अपने छतरपुर शहर के पर्यावरण का एक निष्पक्ष और विस्तृत रिपोर्ट कार्ड तैयार करें, तो विकास की चमक के पीछे एक बेहद चिंताजनक और डरावनी तस्वीर उभरकर सामने आती है। आज छतरपुर दोराहे पर खड़ा है, एक तरफ शहर का तेजी से होता भौगोलिक विस्तार, चमचमाती नई कॉलोनियां और आधुनिक व्यावसायिक भवन हैं, तो दूसरी तरफ दम तोड़ती हरियाली, कंाक्रीट के बढ़ते जंगल और हर साल रिकॉर्ड तोड़ता पारा है। आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में छतरपुर का हरित आवरण (ग्रीन कवर) लगातार सिकुड़ रहा है, जिसने अब सीधे तौर पर इंसानी जीवन और प्रकृति के संतुलन पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
पिछले कुछ वर्षों में छतरपुर के विकास की रफ्तार जितनी तेज हुई है, प्रकृति को उसका उतना ही बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा है। शहर के प्रमुख मार्गों, रिहायशी इलाकों और मुख्य व्यावसायिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुए हैं। इस विकास की सबसे पहली बलि दी है उन दशकों पुराने विशाल पेड़ों ने, जो कभी राहगीरों को अपनी ठंडी छांव से सराबोर करते थे।
आज कई प्रमुख स्थानों पर उन पुराने वृक्षों की जगह बहुमंजिला इमारतें और पक्के निर्माण खड़े हो चुके हैं। कांक्रीट की यह अधिकता सूरज की रोशनी को सोखकर हीट आइलैंड इफेक्ट पैदा कर रही है। इसका सीधा असर इस वर्ष मई और जून महीने के शुरूआती दिनों में देखने को मिला, जब आसमान से बरसती आग और तपती सडक़ों के कारण दोपहर के समय पूरा शहर एक अघोषित कफ्र्यू जैसी स्थिति में नजर आया। दोपहर में लोगों का घरों से निकलना दूभर हो गया है।
विकास कार्यों की वजह से छतरपुर की वायु गुणवत्ता भी बेहतर नहीं रह गई है। शहर के सबसे व्यस्त और मुख्य इलाकों जैसे बस स्टैंड क्षेत्र, छत्रसाल चौक, महोबा रोड और सागर रोड, पन्ना रोड पर हर समय उड़ती धूल के गुबार देखे जा सकते हैं। लगातार चल रहे निर्माण कार्यों और सडक़ों पर वाहनों के बढ़ते दबाव के कारण हवा में पीएम स्तर खतरनाक रूप से बढ़ रहा है, जिससे सडक़ किनारे बिखरी निर्माण सामग्री और प्रशासनिक अनदेखी के कारण उड़ती यह धूल अब आम नागरिकों के फेफड़ों में जमा हो रही है।
छतरपुर की पहचान कभी इसके समृद्ध तालाबों और जलस्रोतों से होती थी, लेकिन आज उन पर अतिक्रमण और लापरवाही का सबसे बड़ा ग्रहण लगा हुआ है। शहरीकरण के बढ़ते दबाव के कारण पारंपरिक जल स्रोतों का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है। इसका नतीजा यह है कि हर साल गर्मी की शुरुआत होते ही शहर के अधिकांश वार्डों में बूंद-बूंद पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच जाती है।
वर्षा जल का संचयन न होने और जमीन के पक्के होने के कारण बारिश का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पा रहा है, जिससे भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का साफ मानना है कि यदि जल्द ही तालाबों के संरक्षण और वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य नहीं किया गया, तो आने वाले समय में छतरपुर को भीषण जल अकाल का सामना करना पड़ेगा।
भीषण गर्मी को देखते हुए प्रशासन ने इस बार भी कागजों पर हीट एक्शन प्लान तैयार किया था। इसके तहत सार्वजनिक स्थानों पर पेयजल व्यवस्था, अस्पतालों में हीट स्ट्रोक वार्ड और जागरूकता अभियानों जैसे कदमों का दावा किया गया। लेकिन, जब बात जमीनी हकीकत की आती है, तो शहरवासियों में भारी असंतोष दिखाई देता है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पिछले वर्षों की तरह इस बार भीषण गर्मी के दौरान प्रमुख चौराहों और भारी भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में तापमान को नियंत्रित करने के लिए मिस्टिंग मशीनों (पानी की बौछार करने वाली मशीनें) का उपयोग नहीं किया गया। इस प्रशासनिक उदासीनता के कारण राहगीरों और ठेले-खोमचे वालों को इस तपती गर्मी में कोई फौरी राहत नहीं मिल सकी।
शहरी विकास, नए जमीनी आंकड़ों और पर्यावरणीय मापदंडों व पर्यावरणविदों और आमजन के मतों के आधार पर तैयार किया गया छतरपुर का यह लेटेस्ट रिपोर्ट कार्ड साफ दर्शाता है कि स्थिति कितनी गंभीर हो चुकी है। छतरपुर का ओवरऑल ग्रेड सी पर अटका हुआ है, जो यह चेतावनी देता है कि शहर को पर्यावरण प्रबंधन के मोर्चे पर सुधार की सख्त और तत्काल आवश्यकता है।
मूल्यांकन के प्रमुख पैरामीटर जमीनी स्थिति अंक फाइनल ग्रेड
हरित क्षेत्र (ग्रीन कवर) नई कॉलोनियों में पेड़ बेहद कम हैं, कई क्षेत्रों में हरियाली तेजी से घटी है। 5/10 सी
जल संरक्षण (वॉटर कंजर्वेशन)ऐतिहासिक तालाब मौजूद हैं, लेकिन कई स्थानों पर गंभीर जल संकट 6/10 सी प्लस
वायु गुणवत्ता (एयर क्वालिटी)धूल और लगातार चल रहे निर्माण कार्यों से प्रदूषण का ग्राफ ऊपर भागा है 5/10 सी
नगर पालिका/ प्रशासन प्रयास नगर पालिका द्वारा पौधारोपण व स्वच्छता अभियान जारी हैं, सुधार की जरूरत 6/10 बी
जन जागरूकता (पब्लिक अवेयरनेस)पर्यावरण दिवस और पौधारोपण कार्यक्रमों में नागरिकों की भागीदारी 7/10 बी
कुल संचयी ग्रेड (ओवरऑल) छतरपुर जिला मुख्यालय का कुल रिपोर्ट कार्ड 29/50 सी
छतरपुर की इस बदहाल होती स्थिति पर शहर के प्रशासनिक अधिकारियों, डॉक्टरों और पर्यावरणविदों ने अपनी गंभीर चिंताएं और पक्ष साझा किए हैं।बढ़ती गर्मी और हवा में तैरते धूल के कण सीधे तौर पर लोगों की सेहत को निशाना बनाए रहे हैं। इस सीजन में हमारे पास हीट स्ट्रोक, गंभीर डिहाइड्रेशन, त्वचा की बीमारियां और श्वास संबंधी (अस्थमा व ब्रोंकाइटिस) रोगियों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी देखी गई है। पर्यावरण का बिगडऩा अब एक मेडिकल इमरजेंसी बनता जा रहा है।
डॉ. शरद मिश्रा (प्रसिद्ध चिकित्सक)
पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए केवल नए पौधे लगाना ही काफी नहीं है, बल्कि हमारे पास जो दशकों पुराने विशाल वृक्ष हैं, उनका संरक्षण करना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। शहर में हरियाली का दायरा बढ़ाने के लिए अब प्रशासन के साथ-साथ जनसहभागिता की सबसे ज्यादा जरूरत है।
विपिन अवस्थी, समाजसेवी
नगरपालिका अपनी तरफ से शहर की स्वच्छता, सौंदर्यीकरण और समय-समय पर पौधारोपण अभियान चलाकर पर्यावरण को बचाने का प्रयास कर रही है। पार्क और डिवाइडरों पर हरियाली विकसित की जा रही है। हम छतरपुर को और अधिक ग्रीन बनाने के लिए नई कार्ययोजनाओं पर काम कर रहे हैं।
माधुरी शर्मा, सीएमओ
कांक्रीट के बढ़ते जाल और लगातार घटती हरियाली के कारण छतरपुर स्थानीय स्तर पर एक बड़े थर्मल जोन में तब्दील हो रहा है। यदि हमने अब भी कड़े और प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो आने वाले 4-5 वर्षों में यहां का सामान्य तापमान हमारी सहनशक्ति से बाहर हो जाएगा। यह विकास नहीं, बल्कि भविष्य का विनाश है।
डॉ. राजेश अग्रवाल, वरिष्ठ पर्यावरणविद
छतरपुर का यह विस्तृत पर्यावरण रिपोर्ट कार्ड हमें आगाह कर रहा है कि हम विकास की अंधी दौड़ में अपने अस्तित्व की नींव को ही खोद रहे हैं। शहर का विस्तार जरूरी है, लेकिन वह पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढिय़ां साफ हवा और पानी के लिए न तरसें, तो हमें तुरंत निम्नलिखित मोर्चों पर काम करना होगा।
-शहरी विकास योजनाओं में हरियाली को अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।
-धूल प्रदूषण को रोकने के लिए निर्माण स्थलों पर ग्रीन नेटिंग और नियमित पानी के छिडक़ाव का नियम कड़ाई से लागू करना होगा।
- वर्षा जल संचयन को हर नए भवन और नई कॉलोनियों के लिए अनिवार्य व दंडनीय बनाना होगा।
छतरपुर में कांक्रीट के बढ़ते जाल, झुलसाती गर्मी और सी ग्रेड पर अटके पर्यावरण रिपोर्ट कार्ड ने जिला मुख्यालय की बदहाली उजागर कर दी है। सबसे बड़ा सवाल जिले के उन राजनेताओं पर उठता है, जो चुनाव और मंचों से विकास, सडक़ों और बड़ी-बड़ी सुविधाओं की मांग तो पुरजोर तरीके से करते हैं, लेकिन सुरक्षित पर्यावरण के इस संवेदनशील मुद्दे पर पूरी तरह मौन साधे हुए हैं। आखिर जनता की सांसों और पानी से जुड़े इस संकट पर जनप्रतिनिधियों की यह चुप्पी क्या साबित करती है?इन जिम्मेदार नेताओं को अब केवल बयानबाजी छोडकऱ सरकार के स्तर पर ठोस नीतिगत प्रयास करने होंगे। इन्हें विधानसभा से लेकर प्रशासनिक बैठकों तक दबाव बनाकर शहरी मास्टर प्लान में ग्रीन कवर (हरित क्षेत्र) को अनिवार्य हिस्सा बनवाना चाहिए। इसके अलावा, ऐतिहासिक तालाबों के पुनरुद्धार के लिए विशेष सरकारी बजट स्वीकृत कराना होगा और नए निर्माण कार्यों में वॉटर हार्वेस्टिंग व ग्रीन नेटिंग के नियमों को कड़ाई से लागू करवाने के लिए विधायी कदम उठाने होंगे, ताकि छतरपुर को झुलसने से बचाया जा सके।
जरा विचार करिए, यदि विकास की यही अंधी दौड़ जारी रही और पर्यावरण को यूं ही नजरअंदाज किया जाता रहा, तो हम अपनी आने वाली पीढयि़ों के लिए विरासत में क्या छोडकऱ जाएंगे? क्या हम उन्हें उपहार में कंक्रीट के तपते हुए जंगल, सांस लेने के लिए प्रदूषित हवा और बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते हुए सूखे जल स्रोत सौंपेंगे?
आज छतरपुर जिस नाजुक मोड़ पर खड़ा है, वहां तात्कालिक मुनाफे के लिए हमारे बच्चों के सुरक्षित भविष्य की बलि दी जा रही है। अगर हम आज भी सचेत नहीं हुए, तो आने वाली नस्लें इस पर्यावरणीय विनाश के लिए हमें कभी माफ नहीं करेंगी। यह समय केवल आधुनिकता की चकाचौंध का जश्न मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने का है। समय कम है और चुनौतियां बहुत बड़ी। अगर छतरपुर को इस सी ग्रेड से निकालकर एक स्वच्छ और हरित शहर बनाना है, तो प्रशासन और आम जनता दोनों को मिलकर एक भागीरथी प्रयास करना ही होगा, वरना कंाक्रीट का यह जंगल एक दिन पूरे शहर को झुलसा कर रख देगा।