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यात्री बसें या जीएसटी चोरी का सेफ कॉरिडोर? दिल्ली-कानपुर-इंदौर से बिना बिल आ रहा करोड़ों का माल

मुनाफे की इस हवस में बस ऑपरेटर न केवल सरकार के खजाने को चूना लगा रहे हैं, बल्कि मासूम यात्रियों की जिंदगी को भी मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

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ओवर लोड बसें

बुंदेलखंड के हृदय स्थल छतरपुर में परिवहन नियमों और राजस्व कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जिले की सडक़ों पर दौडऩे वाली यात्री बसें अब यात्रियों को सुविधा देने के बजाय जीएसटी चोरी का सेफ कॉरिडोर बन चुकी हैं। दिल्ली, कानपुर, आगरा और ग्वालियर जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों से करोड़ों रुपए का माल बिना किसी वैध दस्तावेज के यात्री बसों की छतों पर लदकर छतरपुर पहुंच रहा है। मुनाफे की इस हवस में बस ऑपरेटर न केवल सरकार के खजाने को चूना लगा रहे हैं, बल्कि मासूम यात्रियों की जिंदगी को भी मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

करोड़ों का अवैध कारोबार- बसों की छत पर लदा काला धन


विश्वस्त सूत्रों और जमीनी पड़ताल से पता चला है कि दिल्ली के चांदनी चौक, करोल बाग और कानपुर के थोक बाजारों से आने वाला होजऱी, रेडीमेड गारमेंट्स, कॉस्मेटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और गुटखा जैसे कीमती सामान को मालवाहक ट्रकों के बजाय यात्री बसों के जरिए छतरपुर लाया जा रहा है।

जीएसटी की भारी चोरी- व्यापारिक माल के परिवहन के लिए अनिवार्य ई-वे बिल और जीएसटी रसीदों को दरकिनार कर यह सारा खेल कच्ची पर्चियों पर चल रहा है।

सिंडिकेट का जाल- बड़े शहरों के व्यापारियों और स्थानीय बस ऑपरेटरों के बीच एक मजबूत सिंडिकेट सक्रिय है। ट्रक की तुलना में बसों से माल मंगवाना सस्ता पड़ता है और चेकिंग की गुंजाइश भी कम रहती है, जिसका फायदा उठाकर सरकार को हर महीने करोड़ों रुपए के राजस्व का नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

सुरक्षा को ठेंगा- छत पर पहाड़ जैसा लगेज


बस ऑपरेटरों ने बसों को मालवाहक गोदाम बना दिया है। नियमानुसार यात्री बसों की छत पर केवल यात्रियों का निजी सामान रखने की अनुमति है, लेकिन हकीकत में बसों की छतों पर 1.5 से 2 मीटर ऊंचा माल लादा जा रहा है।

असंतुलन का खतरा- भारी वजन के कारण बसों का सेंटर ऑफ ग्रेविटी बिगड़ जाता है, जिससे मोड़ पर बस के पलटने का खतरा बना रहता है।

मौत का करंट- शहर और ग्रामीण इलाकों में सडक़ के ऊपर से गुजरने वाली हाईटेंशन लाइनें और बिजली के झूलते तार इन ऊंचे लगेज से टकरा सकते हैं। ऐसे में पूरी बस में करंट फैलने या आग लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

विभागीय सांठगांठ- रस्म अदायगी बनी चेकिंग

हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ जिला प्रशासन, परिवहन विभाग और यातायात पुलिस की नाक के नीचे हो रहा है। जिले के मुख्य चौराहों और बस स्टैंडों पर तैनात पुलिसकर्मियों के सामने से ये ओवरलोड बसें गुजरती हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बस ऑपरेटरों और विभागीय अधिकारियों के बीच एक मजबूत सांठगांठ है, जिसके कारण इन पर हाथ डालने से अधिकारी बचते हैं। जब भी कोई शिकायत होती है, तो विभाग जांच का आश्वासन देकर पल्ला झाड़ लेता है। एआरटीओ और ट्रैफिक पुलिस के दावे केवल बैठकों और कागजों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर मौत का यह सफर बेरोकटोक जारी है।

यात्रियों की मजबूरी- जान हथेली पर रखकर सफर

बस के भीतर क्षमता से अधिक सवारी और छत पर टन के हिसाब से वजन, इस दोहरी मार के बीच यात्री खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। कई यात्रियों ने बताया कि विरोध करने पर बस कंडक्टर और ऑपरेटर बदतमीजी करते हैं। छतरपुर से दिल्ली और कानपुर जाने वाली लग्जरी और स्लीपर बसों की हालत तो और भी बदतर है, जहां गैलरी से लेकर छत तक व्यापारिक माल भरा रहता है।

सवाल जो प्रशासन से जवाब मांगते हैं:

  1. व्यापारिक शहरों से आने वाली इन बसों के ई-वे बिल की जांच वाणिज्यिक कर विभाग क्यों नहीं करता?
  2. ओवरहाइट लगेज के साथ सडक़ों पर दौड़ती बसें आरटीओ और पुलिस को दिखाई क्यों नहीं देतीं?
  3. क्या प्रशासन किसी बड़ी जनहानि के बाद ही कुंभकर्णी नींद से जागेगा?

आश्वासन के सिवा कुछ नहीं


परिवहन और यातायात विभाग की टीम अभी तक महज जांच के आश्वासन तक सीमित है। मधु सिंह (एआरटीओ, छतरपुर) ने कहा कि संयुक्त जांच टीम जल्द बनाई जाएगी और दोषी बस ऑपरेटरों पर कार्रवाई की जाएगी। बृहस्पति साकेत (ट्रैफिक इंचार्ज) ने कहा कि सडक़ सुरक्षा समिति की बैठक में आए निर्देशों का पालन कराया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बसें रोजाना भारी लगेज के साथ सडक़ों पर सरपट दौड़ रही हैं और कोई पूछने वाला नहीं।