
Donald Trump (Photo - Washington Post)
Membership: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump)अपनी 'अनकन्वेंशनल' यानि लीक से हट कर की जाने वाली राजनीति के लिए जाने जाते हैं। इस बार उन्होंने वैश्विक युद्धों को समाप्त करने के लिए एक ऐसा बिजनेस मॉडल पेश किया है, जिसने दुनिया भर के राजनयिकों की नींद उड़ा दी है। ट्रंप ने गाजा, यूक्रेन और अन्य संघर्ष क्षेत्रों में शांति स्थापित करने के लिए एक 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) बनाने का प्रस्ताव रखा है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस शांति क्लब का सदस्य (Membership) बनने के लिए देशों को भारी कीमत चुकानी होगी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप के इस प्रस्तावित 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने वाले सदस्य देशों से 1 बिलियन डॉलर यानि भारतीय मुद्रा में लगभग 8,200 करोड़ रुपये की 'मैम्बरशिप फीस' मांगी जा सकती है। ट्रंप का तर्क है कि अमेरिका दुनिया भर के युद्धों को खत्म करवाने के लिए अपने संसाधन और समय खर्च करता है, इसलिए अब लाभार्थी देशों को इसकी लागत शेयर करनी चाहिए। इसे एक तरह से 'पीस सब्सक्रिप्शन मॉडल' के रूप में देखा जा रहा है।
ट्रंप का दावा है कि उनके इस बोर्ड के सक्रिय होते ही महीनों से चल रहे युद्ध हफ्तों में रुक सकते हैं। इस बोर्ड में शामिल होने वाले धनी खाड़ी देश और यूरोपीय देश मिल कर शांति के लिए एक बड़ा फंड बनाएंगे, जिसका इस्तेमाल प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण (Reconstruction) में किया जाएगा। लेकिन आलोचक इसे 'शांति की नीलामी' कह रहे हैं, जहां केवल अमीर देशों की आवाज सुनी जाएगी।
भारत हमेशा से 'शांति का दूत' रहा है और वैश्विक विवादों को बातचीत से सुलझाने का पक्षधर है। हालांकि, ट्रंप का यह 'पे एंड प्ले' (पैसे दो और शामिल हो) मॉडल भारत की पारंपरिक विदेश नीति के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकता है। यदि भारत इस बोर्ड का हिस्सा बनता है, तो उसे भारी भरकम राशि देनी होगी, लेकिन इससे वैश्विक फैसलों में भारत की भूमिका और मजबूत हो सकती है। विशेषज्ञ इसे भारत के बढ़ते आर्थिक कद और 'विश्व गुरु' की छवि के बीच एक कठिन चुनाव मान रहे हैं।
यूरोपीय संघ (EU): "शांति कोई व्यापारिक सौदा नहीं है। इसे पैसों के तराजू में नहीं तोला जा सकता। यह लोकतंत्र और मानवाधिकारों का अपमान है।"
अरब देश: कुछ तेल समृद्ध देश इस प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि वे युद्ध के कारण हो रहे व्यापारिक नुकसान को रोकने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं।
विपक्ष (अमेरिका): अमेरिका के भीतर भी इस योजना की आलोचना हो रही है। डेमोक्रेट्स का कहना है कि ट्रंप अमेरिका की छवि एक 'मर्सिनरी' (किराए के सैनिक) जैसी बना रहे हैं।
आने वाले दिनों में ट्रंप इस योजना का औपचारिक मसौदा (Draft) व्हाइट हाउस में पेश कर सकते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत, सऊदी अरब और ब्रिटेन जैसे देश इस 'शांति की सदस्यता' को स्वीकार करेंगे या इसे खारिज कर देंगे। यदि 10 देश भी इसमें शामिल होते हैं, तो ट्रंप के पास 10 बिलियन डॉलर का एक विशाल फंड होगा, जिसे वे अपनी मर्जी से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस्तेमाल कर सकेंगे।
बहरहाल, इस प्रस्ताव का एक अलग पहलू यह है कि ट्रंप अंतरराष्ट्रीय कूटनीति (Diplomacy) को पूरी तरह से व्यावसायिक बना रहे हैं। पहले नाटो (NATO) को लेकर उनका रुख और अब 'बोर्ड ऑफ पीस' के लिए पैसे मांगना, यह संकेत देता है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय मदद केवल दोस्ती के आधार पर नहीं, बल्कि 'डॉलर' के आधार पर मिलेगी।
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Updated on:
18 Jan 2026 01:47 pm
Published on:
18 Jan 2026 01:46 pm

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