
बांग्लादेश चुनाव 2026 मैदान में जमात-ए-इस्लामी। ( फोटो: पत्रिका)
Bangladesh Crisis: बांग्लादेश के राजनीतिक भविष्य को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद से ही यह सवाल बना हुआ है कि अगर कट्टरपंथी मानी जाने वाली पार्टी 'जमात-ए-इस्लामी' (Jamaat-e-Islami) सत्ता में आती है, तो वहां के हिंदू अल्पसंख्यकों का क्या होगा? आम धारणा और भारत की चिंताओं के विपरीत, एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में चौंकाने वाला दावा किया गया है। दावा यह है कि जमात के शासन में बांग्लादेशी हिंदू (Bangladesh Hindus), अवामी लीग के शासन की तुलना में अधिक सुरक्षित रहेंगे। जमात के नेता शफीकुर्रहमान (Shafiqur Rahman) ने मतदाताओं से कई वादे किए हुए हैं और हिंदुओं को भी चिंता न करने के लिए कहा है।
अल जजीरा में प्रकाशित एक लेख (6 फरवरी, 2026) के मुताबिक, बांग्लादेश में दशकों से एक 'डर का नैरेटिव' बेचा जा रहा था। लेख में तर्क दिया गया है कि अवामी लीग ने हमेशा हिंदुओं को यह कहकर डराया कि "अगर हम गए, तो जमात आ जाएगी और तुम्हें खत्म कर देगी।" इस डर को दिखाकर अल्पसंख्यकों का वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया गया। लेकिन, जमीनी हकीकत बदलने का दावा किया जा रहा है। लेख में 2024 के विद्रोह का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि जब पुलिस और प्रशासन गायब थे, तब जमात के कार्यकर्ताओं ने ही मंदिरों और हिंदू मोहल्लों की पहरेदारी की थी।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि जमात-ए-इस्लामी अब अपनी पुरानी कट्टरपंथी छवि से बाहर निकलना चाहती है। वे दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि वे एक जिम्मेदार राजनीतिक दल हैं, जो कानून का शासन (Rule of Law) स्थापित कर सकते हैं। तर्क यह दिया जा रहा है कि अवामी लीग के दौर में हिंदुओं की जमीन कब्जाने की घटनाएं स्थानीय नेताओं द्वारा की जाती थीं, जिन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त था। जमात का दावा है कि उनके अनुशासन में ऐसी अराजकता की जगह नहीं होगी।
मैं सुबूत हूं: एक नया दृष्टिकोण लेख में व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर कहा गया है कि आम बांग्लादेशी मुसलमान और हिंदू पड़ोसी के तौर पर शांति से रहते आए हैं। सियासी हिंसा को सांप्रदायिक रंग अक्सर राजनीतिक फायदे के लिए दिया जाता है। लेखक का कहना है कि जमात के सत्ता में आने से कानून का राज होगा, और जब कानून का राज होता है, तो अल्पसंख्यक अपने आप सुरक्षित हो जाते हैं। यह दावा अवामी लीग के उस प्रचार को सीधे चुनौती देता है, जिसमें जमात को 'हिंदू विरोधी' बताया जाता रहा है।
अल्पसंख्यक समुदाय: बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के कुछ नेताओं ने दबी जुबान में कहा है कि वादे अच्छे हैं, लेकिन इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता। वे अभी भी सतर्क हैं और 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में हैं।
राजनीतिक विश्लेषक: ढाका के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जमात के लिए यह 'पीआर एक्सरसाइज' (छवि सुधारना) बहुत जरूरी है क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय वैधता हासिल करना चाहते हैं। अगर वे हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करते, तो पश्चिमी देश और भारत उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे।
आगामी चुनाव: 2026 के अंत तक होने वाले आम चुनावों में यह सबसे बड़ा मुद्दा होगा। जमात अपने घोषणापत्र में अल्पसंख्यकों के लिए क्या खास ऐलान करती है, इस पर सबकी नजर रहेगी।
भारत का रुख: भारतीय विदेश मंत्रालय इस बदलते घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए है। अगर जमात सत्ता में आती है, तो भारत-बांग्लादेश रिश्तों की नई रूपरेखा क्या होगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
भले ही जमात का शीर्ष नेतृत्व (Top Leadership) उदारवादी बातें कर रहा हो, लेकिन सवाल निचले स्तर के कैडर का है। क्या जमात अपने उन कट्टर समर्थकों को नियंत्रित कर पाएगी जो 'इस्लामी राष्ट्र' के नाम पर अतिवाद का समर्थन करते हैं? विश्लेषकों का मानना है कि नेतृत्व की 'सॉफ्ट टॉक' और जमीन पर कार्यकर्ताओं के 'हार्ड एक्शन' के बीच अंतर हो सकता है, जो असली खतरा साबित हो सकता है।
बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद जिस राजनीतिक दल की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है, वह है 'जमात-ए-इस्लामी' और उसके प्रमुख (अमीर) डॉ. शफीकुर्रहमान। एक समय में प्रतिबंधित और हाशिए पर रही जमात अब सत्ता की प्रमुख दावेदार बनकर उभरी है। एक पत्रकार के तौर पर आपके लिए यह समझना जरूरी है कि डॉ. शफीकुर्रहमान कौन हैं और उनकी विचारधारा भारत और हिंदुओं के लिए क्या मायने रखती है।
पद: अमीर (प्रमुख), बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी (नवंबर 2019 से)।
पेशा: पेशे से एक चिकित्सक (Physician)। उन्होंने सिलहट मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया है।
जन्म: मौलवीबाजार जिले (सिलहट संभाग) के कुलाउड़ा में।
राजनीतिक सफर: वे छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे। जमात की छात्र शाखा 'इस्लामी छात्र शिविर' (Islami Chhatra Shibir) के सिलहट शहर के अध्यक्ष रहे। धीरे-धीरे संगठन में ऊपर उठे और 2019 में पार्टी के सर्वोच्च पद पर पहुंचे।
गिरफ्तारी: शेख हसीना सरकार के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। दिसंबर 2022 में उन्हें आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया था (आरोप था कि उनके बेटे के संबंध किसी कट्टरपंथी समूह से थे)। अगस्त 2024 में शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद उन्हें रिहा किया गया।
डॉ. शफीकुर्रहमान जमात के उन नेताओं में गिने जाते हैं जो पार्टी को 1971 के 'युद्ध अपराधी' वाले टैग से बाहर निकालकर एक आधुनिक राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।
उनकी विचारधारा का मूल 'इस्लामी शरीयत' है, लेकिन वे इसे 'इस्लामी कल्याणकारी राज्य' (Islamic Welfare State) के ढांचे में पेश करते हैं, जहां न्याय और सामाजिक सुरक्षा की बात होती है।
पारंपरिक रूप से जमात को भारत-विरोधी और पाकिस्तान-परस्त माना जाता रहा है। लेकिन शफीकुर्रहमान कूटनीतिक भाषा बोल रहे हैं। वे भारत के साथ "स्थिर और संतुलित" रिश्तों की वकालत करते हैं, लेकिन शर्त यह रखते हैं कि भारत को "सिर्फ अवामी लीग के चश्मे से बांग्लादेश को देखना बंद करना होगा।"
शेख हसीना के जाने के बाद डॉ. शफीकुर्रहमान ने हिंदुओं को लेकर जो बयान दिए हैं, वे जमात के पुराने इतिहास से बिल्कुल उलट हैं। इसे उनकी 'इमेज मेकओवर' (Image Makeover) रणनीति माना जा रहा है।
5 अगस्त 2024 के बाद जब बांग्लादेश में हिंसा भड़की, तो शफीकुर्रहमान ने बयान दिया कि "अल्पसंख्यक जैसा कुछ नहीं होता, हम सब बंगाली हैं और नागरिक हैं।"
उन्होंने ढाका के ढाकेश्वरी मंदिर समेत कई पूजा पंडालों का दौरा किया और हिंदू नेताओं को सुरक्षा का भरोसा दिलाया। यह जमात के इतिहास में दुर्लभ घटना थी।
उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं (कैडर) को निर्देश दिया कि वे मंदिरों की पहरेदारी करें। उन्होंने कहा, "जो लोग मंदिरों पर हमला कर रहे हैं, वे देश के दुश्मन हैं।"
अल जजीरा के लेख के अनुसार, शफीकुर्रहमान यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि जमात के शासन में कानून का राज होगा और भीड़तंत्र (Mobocracy) नहीं होगा, जिससे हिंदू सुरक्षित रहेंगे।
यह एक राजनीतिक मजबूरी भी हो सकती हैं। जमात जानती है कि अगर उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता और भारत का साथ चाहिए, तो उसे 'हिंदू विरोधी' छवि तोड़नी होगी। हालांकि, धरातल पर जमात के निचले स्तर के कार्यकर्ता (काडर) कितने अनुशासित रहते हैं और क्या वे अपने अमीर के आदेशों का पालन करते हुए हिंदुओं के साथ सहिष्णुता बरतेंगे, यह देखना अभी बाकी है। बहुत से जानकारों का मानना है कि यह जमात का "सॉफ्ट फेस" (Soft Face) है, जबकि कट्टरपंथी एजेंडा अभी भी पृष्ठभूमि में सक्रिय है।
Published on:
09 Feb 2026 01:11 pm
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