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वीर सैनिक… हर ऑपरेशन में मारे आतंकी, एक भी सैनिक नहीं गवाया

सेना में 38 साल सेवा देने वाले सेवानिवृत्त कर्नल अजय तिवारी ने एक भी ऑपरेशन में अपने साथियों की जान नहीं गवाई। मणिपुर में 25 से ज्यादा लाइव मुठभेड़, जम्मू कश्मीर में 50 से अधिक बार आतंकियों से आमना सामना हुआ और जमकर फायरिंग भी हुई, लेकिन एक भी ऑपरेशन में किसी साथी की मौत […]

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खंडवा

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Manish Arora

Jan 22, 2026

सेना में 38 साल सेवा देने वाले सेवानिवृत्त कर्नल अजय तिवारी ने एक भी ऑपरेशन में अपने साथियों की जान नहीं गवाई। मणिपुर में 25 से ज्यादा लाइव मुठभेड़, जम्मू कश्मीर में 50 से अधिक बार आतंकियों से आमना सामना हुआ और जमकर फायरिंग भी हुई, लेकिन एक भी ऑपरेशन में किसी साथी की मौत नहीं हुई। कर्नल अजय तिवारी ने 38 साल की सेवा में 16 साल सिर्फ फिल्ड में बिताए। इस दौरान आपॅरेशन विजय, ऑपरेशन पराक्रम का भी हिस्सा रहे। कर्नल तिवारी की वीर गाथा उन्हीं की जुबानी।

मणिपुर, वर्ष 2006। घना कोहरा इतना कि सौ मीटर दूर भी कुछ दिखाई न दे। सूचना मिली कि कुकी उग्रवादियों का एक दल इलाके में छिपा है। खबर पक्की नहीं थी, पर आदेश सर्वोपरि था। कर्नल अजय तिवारी बताते हैं, सुबह सात बजे हम निकले। इलाका नया था, इसलिए 16 जवानों की टीम को पाइंट्स पर रोककर मैं खुद रैकी के लिए आगे बढ़ा। तभी फायरिंग की आवाज गूंजी। रेडियो पर लोकेशन ली और पलटन तक पहुंचा। करीब डेढ़ घंटे मुठभेड़ चली। तीन उग्रवारी घायल हुए, बाद में उनकी मौत की खबर भी मिली। मणिपुर में यह मेरा पहला लाइव एक्शन था, कुछ साथी घायल हुए थे इसका दुख भी था, लेकिन संतोष भी कि हमारे किसी जवान की जान नहीं गई।

अचानक आतंकियों ने किया हमला
कश्मीर के अनुभव याद करते हुए कर्नल तिवारी कहते हैं जम्मू में तैनाती के दौरान विक्टर फोर्स हेडक्वाटर की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। हमें सूचना मिली कि विक्टर फोर्स कुछ कार्रवाई करने वाली है। हम भी तैयार थे, सूचना मिली कि 10 किमी दायरे में हलचल है। मेरी पार्टी को लांच किया गया, जिसमें 30 लोग शामिल थे। रात 11 बजे हमने काफिला लगाया, पर आतंकियों को भनक लग गई। अचानक फायरिंग शुरू हुई। हमने जवाबी मोर्चा संभाला—दो आतंकी ढेर हुए। मेरे लीडिंग स्काउट को सेना मेडल मिला, एक और जवान सम्मानित हुआ। यह ऑपरेशन ‘सांझीवतुरा’ था।

जवान से कमिशन ऑफिसर तक का किया सफर
1998 में मिलिट्री इंटेलिजेंस कोर से करियर शुरू करने वाले अजय तिवारी 1997 में मिलिट्री कैडेट कॉलेज से पास होकर देश की सबसे पुरानी पलटन 2 गाड्र्स में कमीशंड हुए। 38 साल की सेवा में ग्वालियर, पठानकोट, मणिपुर, रजौरी, लेह, तवांग और सिक्किम जैसे कठिन मोर्चों पर तैनात रहे। अपनी सेवा के 16 साल सीधे फील्ड में गुजरे। इसमें जम्मू-कश्मीर में 10 और नॉर्थ-ईस्ट में 6 साल फिल्ड में बिताए। पिछले साल सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद हाल ही में सैनिक वेलफेयर में जिला अधिकारी का पदभार संभाला है। कर्नल तिवारी कहते है अब तन पर वर्दी नहीं है, लेकिन आज भी दिल सेना के लिए ही धडक़ता है।