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जो बोल नहीं सकते, उनकी सुनिए सरकार

- कोक्लियर इम्प्लांट तो कर रहे, लेकिन बच्चे और बडे़ बोलना कैसे सीखे? - प्रदेश में स्पीच थैरेपिस्ट केवल आरयूएचएस जयपुर में, अन्य संभाग मुखालयों पर इंतजार - सरकार ने सेवा प्रदाता एजेंसी से लेने के आदेश जारी किए, लेकिन अब तक कहीं नहीं लगे

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कोक्लियर इम्प्लांट

कोक्लियर इम्प्लांट

बच्चों से लेकर बड़ों को बोलना सिखाने और उनकी बोलने सुनने की कमी को दूर करने के लिए जिन चिकित्सकों की जरूरत होती है, वह प्रदेश में केवल जयपुर में उपलब्ध हैं। एक भी मेडिकल कॉलेज में ये स्पीच थैरेपिस्ट नहीं है। ये बात दीगर है कि सरकार ने इन्हें लगाने के लिए दो वर्ष पहले ही आदेश जारी कर दिए। नियमों में खामी के कारण इन बीमारों को तकनीकी परेशानी से लड़ना पड़ रहा है। खास बात ये है कि किसी भी कोक्लियर इम्प्लांट के बाद इनकी मदद जरूरी है, लेकिन प्रदेश में कहीं भी ऐसा नियमानुसार नहीं हो रहा।

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इतनी पुरानी घोषणा-

मुख्यमंत्री की बजट घोषणा वर्ष 2012-13 के क्रियान्वयन में राजकीय चिकित्सा महाविद्यालयों में स्पीच थैरेपिस्ट के कुल 18 पद स्वीकृत किए गए थे। लेकिन इनकी नियुक्ति नहीं हुई।

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कहा कितने प्रस्तावित....

क्रम. महाविद्यालय का नाम - पद संख्या

1 . उदयपुर - 03

2 . बीकानेर - 02

3 . जयपुर - 03

4 . जोधपुर - 04

5 . अजमेर- 03

6 . कोटा- 03

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योग- 18

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ये भी जानना जरूरी

- राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय में स्पीच थैरेपिस्ट के दो पद आदेश 16 सितंबर 2013 के माध्यम से सृजित किए गए थे।- चिकित्सा शिक्षा विभाग के अराजपत्रित संवर्ग के सेवा नियमों के कारण ये परेशानी आ रही है।

- राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के सेवा नियमों का अनुमोदन वर्ष 2020 में किया गया है। उक्त सेवा नियमों में स्पीच थैरेपिस्ट के पद से संबंधित सेवा नियम भी सम्मिलित हैं।

- प्रदेश में स्पीच थैरेपिस्ट केवल चिकित्सा महाविद्यालयों के अराजपत्रित सेवा नियम अधिसूचित होने तक स्पीच थेरेपिस्ट के पदों को सेवा प्रदाता एजेंसी के माध्यम से भर सकते हैं। नियम अधिसूचित नहीं होने से नियमित पदों पर उन्हें लेना संभव नहीं।

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क्या है स्पीच थैरेपी- यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे बच्चों या बड़ों में बोलने की या इससे जुड़ी कोई परेशानी होने पर इलाज के लिए की जाती है। कई बार बच्चों को खाना खाने या निगलने में भी परेशानी होती है, इसका उपचार भी इसके माध्यम से करते हैं। सीखने में परेशानी, अटककर बोलने, सुनने में परेशानी, मुंह के ऊपरी होंठ या जीभ में एक जन्मजात विभाजन होता है, जिसे भंग तालु या खंड तालु भी कहते हैं। हकलाने, ऑटिस्टिक स्पेक्ट्रम डिस ऑर्डर डिस्लेक्सिया, हलका गूंगापन आदि में इस थैरेपी से मदद ली जाती है।

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ऐसे मरीज जो बोल सुन नहीं सकते हैं, उन्हें कोक्लियर इम्प्लांट के बाद ये चिकित्सक बोलना सिखाते हैं। इसमें मरीजों की ओडियोमेट्री की जाती है। यदि मरीज नाक में बोलता है, आवाज भारी होती है, तो इसे इस थैरेपी के जरिए ठीक किया जाता है, फिलहाल उदयपुर में एक भी स्पीच थैरेपिस्ट नहीं है।

डॉ नवनीत माथुर, विभागाध्यक्ष इएनटी, आरएनटी मेडिकल कॉलेज उदयपुर

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