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क्या आप जानते हैं? राजस्थान में यहां 50 साल पहले बिना ट्रेन रोके बनाया था पुल, आज आधुनिक दौर में भी हो रही देरी

सवाईमाधोपुर का हम्मीर ब्रिज 1975 में बिना रेलवे ब्लॉक बना था, लेकिन आज चौड़ीकरण में देरी से जाम की समस्या बनी हुई है।

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हम्मीर ब्रिज सवाईमाधोपुर

फाइल फोटो-पत्रिका

सवाईमाधोपुर: मानटाउन और शहर को सडक़ मार्ग से जोडने वाला हम्मीर ब्रिज सवाईमाधोपुर की जीवनरेखा माना जाता है, लेकिन इसके चौड़ाईकरण कार्य में हो रही देरी से आमजन को जाम की समस्या से राहत नहीं मिल पा रही है।

वर्तमान में कार्य पूरा करने के लिए रेलवे लाइन पर ब्लॉक लेना आवश्यक बताया जा रहा है, जिसके चलते यहां से गुजरने वाली लगभग सवा सौ रेलगाडिय़ों का मार्ग परिवर्तित या स्थगित करना पड़ेगा।

यही कारण है कि काम लगातार अटका हुआ है। विडंबना यह है कि यही हम्मीर ब्रिज, जिसे आज चौड़ा करना चुनौती बना हुआ है, उसका मूल निर्माण वर्ष 1970 में शुरू होकर 16 दिसंबर 1975 को बिना किसी रेलवे ब्लॉक के पूरा कर लिया गया था। यह तथ्य आज की परिस्थितियों में आश्चर्यचकित करने वाला है।

1970 में सवाईमाधोपुर रेलवे लाइन पर ओवरब्रिज निर्माण का ठेका श्रीनारायण ठेकेदार को लगभग तीन से चार लाख रुपए में दिया गया था। उस दौर में सीमित संसाधनों के बीच, चालू रेल यातायात के ऊपर और नीचे दोनों गेज की रेल लाइनों के बीच पुलिया का निर्माण सबसे बड़ी चुनौती थी। बावजूद इसके श्रीनारायण ठेकेदार ने बिना ब्लॉक लिए यह कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया, जिसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया।

इतिहास के पन्नों से निकली कहानी

पुल के निर्माण इतिहास को खोजते हुए लेखक प्रभाशंकर उपाध्याय की मुलाकात स्व. श्रीनारायण ठेकेदार के पोते विशाल कुमावत से हुई। विशाल बताते हैं कि कोटा स्थित डीआरएम कार्यालय में उनके दादाजी से पूछा गया था कि कार्य के लिए कितने दिन का ब्लॉक चाहिए, जिस पर उन्होंने स्पष्ट कहा था ‘‘इस काम के लिए ब्लॉक की कोई आवश्यकता नहीं है।’’ आज भी पुल के मध्य ट्रैफिक पुलिस की गुमटी के पास लगी धुंधली पट्टिका पर श्रीनारायण ठेकेदार का नाम देखा जा सकता है।

शहर के विकास में अहम भूमिका

मूल रूप से फुलेरा निवासी श्रीनारायण ठेकेदार निर्माण कार्यों के चलते सवाईमाधोपुर में ही स्थायी रूप से बस गए थे। ओवरब्रिज से पहले उन्होंने 1953 में सीमेंट फैक्ट्री में बॉयलर, पानी की टंकी और कॉलोनी की सडक़ें बनाईं। सवाईमाधोपुर कलेक्ट्रेट भवन के निर्माण में भी उनका अहम योगदान रहा।

1956 में भैरूं दरवाजे से शहर को जोडऩे वाली लटिया नाले की पुलिया, 1958 में ईएसआईसी डिस्पेंसरी, कुस्तला से इन्द्रगढ़ माताजी मंदिर तक सडक़, 1960 में भेरू दरवाजे की पहाड़ी पर जलदाय विभाग की पानी की टंकी - ये सभी निर्माण बिना आधुनिक मशीनों के किए गए। इसके अलावा रेलवे क्वार्टर, पोस्ट एंड टेलीग्राफ क्वार्टर, जीवन बीमा भवन, जिला चिकित्सालय और जनता धर्मशाला जैसे अनेक महत्वपूर्ण भवनों के निर्माण में भी उनका योगदान रहा।

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