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Aditya Sagar Ji Maharaj : बिना पानी के स्नान कैसे होता है, जैन मुनि आदित्य सागर जी महाराज ने बताया वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पहलू

Why Jain monks do not take bath : जैन मुनि बिना पानी के स्नान कैसे करते हैं? परमपूज्य मुनि आदित्य सागर जी महाराज ने ‘अस्नान’, वायु-स्नान, संयमित जीवनशैली और इसके वैज्ञानिक व आध्यात्मिक कारणों को विस्तार से समझाया।

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भारत

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Manoj Vashisth

Jan 18, 2026

How do Jain monks bathe without water

How do Jain monks bathe without water : जैन मुनि स्नान नहीं करते क्यों (फोटो सोर्स: AI image@Gemini)

How do Jain monks bathe without water : जैन मुनि अपनी दुनिया छोड़ देते हैं मतलब, वो अपने पुराने जीवन को पीछे छोड़कर जैन धर्म के नियमों और सिद्धांतों पर चलने लगते हैं। उनका जीवन बहुत सादा रहता है, और वो गहरी तपस्या करते हैं। अहिंसा उनके लिए सबसे बड़ा नियम है, इसी वजह से वो बहुत सीमित और अनुशासित ज़िंदगी जीते हैं। एक बात जो आम लोगों को हैरान कर सकती है। ये मुनि कभी नहीं नहाते। मुनि बनते ही नहाने जैसी रोजमर्रा की चीजें भी छोड़नी पड़ती हैं। हाल ही में, जाने-माने जैन मुनि आदित्य सागर (Aditya Sagar Ji Maharaj) ने जैन सिद्धांतों को लेकर कुछ ऐसी बातें बताईं, जिन पर यकीन करना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा।

Aditya Sagar Ji Maharaj : परमपूज्य मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने कहा-

परमपूज्य मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने कहा , मैं तो कभी नहाता ही नहीं हूं मैं जैन मुनि हूं, और हमारे 28 मूल गुणों में से एक है ‘अस्नान’। मतलब, पिछले 13 साल से मैंने पानी से नहाया ही नहीं। फिर भी लोग मुझसे पूछते हैं, आपके पास तो बदबू नहीं आती, ये कैसे?” मैं सीधा जवाब देता हूं हां , मैंने 13 साल से नहाया नहीं, क्योंकि दीक्षा ली है, अब इसका पालन कर रहा हूं। मैं रोज वायु-स्नान करता हूं। हर दिन ताज़ी हवा में बैठता हूं, शरीर को खुली हवा लगने देता हूं। तो हां, बदबू जैसी कोई चीज नहीं आती, बल्कि कई बार तो एक अलग-सी खुशबू महसूस होती है शायद तपस्या की वजह से।

पहले समझते हैं कि स्नान असल में क्या

स्नान दो तरह के होते हैं।

पहला, बाहरी स्नान। ये हम रोज करते हैं। इससे शरीर का मैल साफ होता है।

दूसरा, अंदरूनी स्नान। ये कभी-कभी होता है, जब हम अच्छे लोगों की संगत में आते हैं या अकेले बैठकर सोचते हैं। इससे मन की गंदगी धुलती है।

बाहरी स्नान भी कई तरीके के होते हैं। पानी से नहाना, जब मौका मिले। हवा में बैठना, सुबह या शाम को। फिर ताप स्नान, जिसमें गर्मी में रहकर शरीर पसीना बहाता है, मगर ये थोड़ा मुश्किल है और हर किसी के बस की बात नहीं। सबसे कठिन है अग्नि स्नान, जो आज के लोग शायद ही कर पाते हैं।

अब बात करते हैं असल सवाल की जैन साधु-साध्वियों के शरीर से बदबू क्यों नहीं आती, जबकि वे दीक्षा के बाद नहाते भी नहीं?

सलीकेदार और संयमित जीवनशैली

वे जितनी भूख–प्यास महसूस करते हैं, उससे भी कम खाते-पीते हैं, और वो भी पूरी तरह शाकाहारी, जो जल्दी पच जाता है।

जब तक आपकी पाचन और उत्सर्जन की क्रिया सही चल रही है, तब तक शरीर से बदबू नहीं आती। बदबू तब आती है जब इन दोनों में गड़बड़ी हो जाए। अगर आप भी संतुलित खाना और सादा जीवन अपनाओ, तो शरीर स्वस्थ रहेगा और बदबू की चिंता नहीं रहेगी।

अक्सर जैन साधु-साध्वी भीगाए हुए कपड़े से शरीर पोंछते हैं। बहुत लोग मानते हैं कि उनकी कठिन तपस्या की वजह से भी बदबू नहीं आती।

वैज्ञानिक नजरिए से भी हर बार पसीना बदबूदार नहीं होता। लेकिन अगर पसीना देर तक शरीर पर लगा रहे, तो फिर चाहे कोई भी हो, शरीर से बदबू आने लगती है।