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जयपुर, May 12, 2026

संपादकीय: डिजिटल संतुलन में संयुक्त परिवारों की भूमिका अहम

पारिवारिक कारणों के अलावा नौकरी व कारोबार की वजह से भी लोगों की एकल परिवार में रहने की मजबूरी होती है। लेकिन डिजिटल संतुलन को बनाए रखना हमारे हाथ में ही है। संयुक्त परिवार में संकट का समाधान और आसान हो जाता है।

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अगर आप संयुक्त परिवार में रहते हैं तो यह आप और आपके बच्चों के लिए वरदान से कम नहीं है। ऐसे दौर में जब बच्चों से लेकर बड़ों तक में स्क्रीन टाइम बढ़ता जा रहा है, संयुक्त परिवार की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। वह इसलिए भी कि संयुक्त परिवारों में रहने की वजह से डिजिटल व्यसन अपेक्षाकृत कम होता जाता है। कारण साफ है, संयुक्त परिवारों में बच्चों के पास दादा-दादी, नाना-नानी व दूसरे नजदीकी रिश्तों की मौजूदगी उन्हें बढ़ते स्क्रीन टाइम के खतरों से निपटने वाला सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। वहीं परिवार के दूसरे सदस्यों के बीच भी स्क्रीन में डूबे रहने की बजाय आपसी बातचीत, साझा अनुभव और आत्मीयता जैसे भाव संयुक्त परिवार की ताकत का अहसास कराते हैं।

दुनियाभर के अध्ययनों में यह चेतावनी दी जाती रही है कि कम उम्र में ही बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम उनके मानसिक विकास को बाधित कर रहा है। अब तो यह बड़ों को भी स्वास्थ्य समस्याओं से घेरने लगा है। एकल परिवारों में जहां बच्चे सिर्फ माता-पिता के बीच ही पलते हैं, वहां शैशवकाल में ही बच्चों को मोबाइल पकड़ाना आम हो गया है। रोते बच्चे को चुप कराना हो या फिर उसे अन्यत्र व्यस्त रखना हो, माता-पिता के लिए मोबाइल आसान माध्यम हो गया है। कामकाजी माता-पिता के लिए कई बार ऐसा करना मजबूरी भी हो जाता है। लेकिन चिकित्सक सदैव बच्चों की मोबाइल लत को लेकर आगाह करते रहे हैं। चिकित्सकों के मुताबिक कम उम्र में बच्चे का मस्तिष्क विकास की प्रक्रिया में होता है। ऐसे समय में संयुक्त परिवार से जुड़ाव उसके विकास को और मजबूती देता है। सिर्फ बच्चे ही नहीं, बड़ोंं के लिए भी संयुक्त परिवार में रहना पारिवारिक संवाद, दु:ख दर्द में सहभागिता और व्यक्तिगत रिश्तों को मजबूती देने वाला होता है। एकल परिवारों के दौर में माता-पिता और बच्चे साथ रहने के बावजूद स्क्रीन में डूबे रहें तो असली जीवन की बातचीत व आत्मीयता धीरे-धीरे डिजिटल परतों के नीचे आ जाती है। मां-बाप की व्यस्तता के बीच बच्चों के लिए भी मोबाइल ही खिलौना और दोस्त हो जाता है। लेकिन संयुक्त परिवार में ऐसा नहीं होता। देश में सैनिक चिकित्सालयों के सात डॉक्टरों के अध्ययन में भी यह तथ्य सामने आया है कि संयुक्त परिवारों में एकल परिवारों की तुलना में बच्चों का स्क्रीन टाइम तीस फीसदी कम होता है।
यह सच है कि संयुक्त परिवारों के टूटने के अलग-अलग कारण हैं। पारिवारिक कारणों के अलावा नौकरी व कारोबार की वजह से भी लोगों की एकल परिवार में रहने की मजबूरी होती है। लेकिन डिजिटल संतुलन को बनाए रखना हमारे हाथ में ही है। संयुक्त परिवार में संकट का समाधान और आसान हो जाता है। अन्यथा बच्चों से लेकर बड़ों तक को यह समझाया जाना चाहिए कि तकनीकी उपकरणों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। परिवारों को चाहिए कि वे 'डिजिटल डिटॉक्स' के लिए समय निकालें। अन्यथा जो खतरे सामने हैं उनका मुकाबला करना मुश्किल होगा।

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