जयपुर, May 14, 2026

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अतुल कनक,(स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार) - प्रसिद्ध शायर शाद का एक शेर है-'विसाल-ए-यार से दूना हुआ इश्क, मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।' हालांकि शायर ने यह शेर किसी प्रेमी के हाल का चित्रण करते हुए लिखा था, लेकिन हमारे दौर में यह आम आदमी की स्वास्थ्यगत परेशानियों का चित्रण करता प्रतीत होता है। हालत यह है कि पिछले दिनों राजस्थान के कोटा शहर के सरकारी अस्पताल में सिजेरियन प्रसव के दौरान भर्ती कई प्रसूताओं को एक ही रात में ऐसा संक्रमण हुआ कि उनमें से कुछ को तो सरकारी तंत्र पर भरोसा करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। लेकिन यह पहला मौका नहीं है, 11 मई को मध्यप्रदेश के भिंड के जिला अस्पताल में माताएं नवजात शिशुओं को दूध पिला रही थीं कि सीलिंग भरभराकर गिर पड़ी। इसी साल 30 अप्रेल को बेंगलूरु के एक अस्पताल की दीवार गिर जाने से सात लोगों की मौत हो गई। लगभग एक साल पहले दिल्ली के विवेक विहार के एक अस्पताल में लगी आग ने सात मासूमों को लील लिया था। ये तो कुछ उदाहरण हैं। अस्पतालों में बदइंतजामी और उसके कारण लोगों में पैदा होने वाले आक्रोश की खबरें आए दिन मीडिया की सुर्खियों में रहती हैं।
तमिलनाडु के रानीपेट जिले के सरकारी अस्पताल से जुड़ा एक अन्य मामला सामने आया- सड़क दुर्घटना में घायल एक व्यक्ति को जब अस्पताल लाया गया, तो उसका उपचार एक सफाई कर्मचारी ने किया। बात मीडियाकर्मियों के सामने आ गई, तो प्रबंधन अपनी लापरवाही पर लीपापोती करने लगा। याद करिए कुछ समय पहले का उड़ीसा का वह प्रसंग, जब एक पिता को एंबुलेंस या किसी अन्य साधन के अभाव में अपनी बेटी के शव को साइकिल से अपने गांव ले जाना पड़ा था। दरअसल, लोगों के लिए हर प्रकरण अपने प्रियजन के जीवन से जुड़ा प्रसंग होता है। निश्चित रूप से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सामान्यजन की अपेक्षाएं अधिक होती हैं। चिकित्सक केवल जीवन को बचाने के प्रयास ही कर सकते हैं। लेकिन यदि ये प्रयास गंभीर नहीं हों, तो फिर पूरे सिस्टम पर सवाल उठते हैं। जो प्रकरण किसी अनुभवी चिकित्सक के लिए सिर्फ एक 'केस' होता है, वह प्रकरण किसी परिवार के लिए उसकी उम्मीदों का आसमान होता है।
ऐसे में हर जिम्मेदार व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह किसी की उम्मीदों के आसमान को बचाने के लिए संवेदनशील भी रहे और सजग भी। कोई परिवार जब अपने किसी प्रियजन को लेकर अस्पताल पहुंचता है, तो वह इसी संवेदना और सजगता के विश्वास को अंतस में संजोए होता है। दुर्भाग्य से बढ़ते पेशेवर रवैये ने समूचे तंत्र के बड़े हिस्से को संवेदनाहीन कर दिया है। व्यक्ति पेशेवर हो, तो स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन जहां जरा-सी लापरवाही किसी की जान के लिए खतरा बन सकती हो, वहां सजग नहीं होना 'पेशेवरÓ होने के प्रतिमानों के भी खिलाफ है। बहुत सारे प्रकरणों में ये आरोप लगते आए हैं कि सिर्फ अस्पताल का बिल बढ़ाने के लिए दम तोड़ चुके व्यक्ति को भी वेंटिलेटर पर रखा गया या सरकारी अस्पतालों में वेतन लेकर इलाज करने वाले चिकित्सकों ने किसी मरीज का इलाज करने के लिए घर बुलवाकर घूस ली। देश की अदालतों में ऐसे कई मुकदमे दर्ज हैं।
भले ही सब जगह ऐसा नहीं होता हो, या सब लोग ऐसा नहीं करते हों- लेकिन किसी भी एक मामले से प्रतिष्ठा पर आंच आती है। लेकिन चिकित्साकर्मियों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण मुद्दा हो गया है अस्पताल परिसरों में मिलने वाली सेवाओं का सुपरविजन और अस्पतालों की देखभाल। कोटा के जिस अस्पताल में प्रसूताओं की मौत मीडिया की सुर्खियों में है, उस अस्पताल के प्रसूति वार्ड में दीवारों पर फंगस थी। ऑपरेशन टेबल पर खून जमा हुआ था। भिंड के अस्पताल की हालत की मॉनिटरिंग ढंग से होती, तो दरकती हुई छत पहले ही दिख जाती और उसका मलबा बच्चों पर नहीं गिरता। लोकतंत्र की बहुत सारी विसंगतियों का कारण यह है कि निरीक्षण, पर्यवेक्षण और लापरवाही पर नियंत्रण की समुचित व्यवस्था नहीं है। अस्पतालों के संदर्भ में भी ऐसा पाया गया है। वीआइपी विजिट के समय आनन-फानन में पलंग की चादरें बदलवाने या वार्ड की सफाई करवाने के टोटके इसलिए होते हैं। सरकारें आम आदमी को सस्ता और सुलभ उपचार उपलब्ध करवाने के लिए अलग-अलग योजनाएं तो बनाती हैं, लेकिन उन योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगरानी रखने के लिए एक अनुभवी और जिम्मेदार इकाई की कमी हमेशा महसूस की जाती है।
वर्ष 2021 में नीति आयोग ने जिला अस्पतालों के कामकाज में अपनाए जा रहे विविध तौर-तरीकों पर विस्तृत रिपोर्ट जारी की थी। रिपोर्ट को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आपसी सहयोग से तैयार किया था।'क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया' के एक घटक 'नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स' ने रिपोर्ट में शामिल किए गए तथ्यों का सत्यापन किया था। रिपोर्ट में माना गया था कि जिला अस्पताल भारत में चिकित्सा सेवा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भूमिका रखते हैं, क्योंकि आम आदमी की उन तक सहज पहुंच है, लेकिन इसके बावजूद 'दुर्भाग्य से सिस्टम की कुछ कमियों' के प्रति खेद भी जताया गया था। यदि जिम्मेदार लोग उस रिपोर्ट को भी गंभीरता से पढ़कर उसमें दर्शाई गई कमियों के समाधान के लिए सार्थक कदम उठाते, तो हमारे स्वास्थ्य तंत्र की सेहत दुरुस्त हो जाती।
Published on: 14 May 2026 04:55 pm

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