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संपादकीयः आपराधिक न्याय प्रक्रिया में सुधार की दरकार

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में यह प्रावधान किया गया है कि जो आरोपी संभावित अधिकतम सजा का एक तिहाई समय विचाराधीन कैदी के रूप में काट चुके हैं, उन्हें व्यक्तिगत मुचलके पर रिहा किया जा सकता है।

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आपराधिक न्याय प्रक्रिया में सुधार के दावे कोई नई बात नहीं हैं। सरकारें समय-समय पर कानूनों में संशोधन, प्रक्रियाओं के सरलीकरण और डिजिटल व्यवस्थाओं की घोषणा करती रही हैं। लेकिन जब जमीनी स्तर पर एक विचाराधीन कैदी चार साल तक अदालत में पेश ही नहीं किया जाता, तो यह साफ हो जाता है कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय में सामने आए एक मामले ने न्याय तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया। आरोपी को जमानत मिल चुकी थी, पर वह एक लाख रुपए का मुचलका नहीं दे सका और जेल में ही बंद रहा। जबकि इसी आरोपी के एक अन्य मामले में पुलिस ने गैर जमानती वारंट तामिल न होने का कारण यह बताया कि आरोपी मिल नहीं रहा, जबकि वह जेल में ही था। आश्चर्य की बात यह भी है कि दोनों मामले एक ही पुलिस थाने से जुड़े थे। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी भी इंसान है और ऐसी लापरवाही अस्वीकार्य है। यह घटना अपवाद नहीं, बल्कि व्यापक समस्या का संकेत है। कर्नाटक ही नहीं, देश की अधिकांश जेलें क्षमता से अधिक भरी हुई हैं और उनमें बड़ी संख्या विचाराधीन कैदियों की है। अनेक मामलों में अपराध सिद्ध नहीं हुआ, फिर भी लोग वर्षों से सलाखों के पीछे हैं।

जमानत मिलने के बाद भी आर्थिक तंगी के कारण मुचलका न भर पाने से रिहाई संभव नहीं हो पाती। कई मामलों में सुनवाई टलती रहती है, तो कहीं प्रशासनिक उदासीनता बाधा बन जाती है। इस स्थिति में जेल अपवाद और जमानत नियम का सिद्धांत केवल किताबों तक सीमित रह जाता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में यह प्रावधान किया गया है कि जो आरोपी संभावित अधिकतम सजा का एक तिहाई समय विचाराधीन कैदी के रूप में काट चुके हैं, उन्हें व्यक्तिगत मुचलके पर रिहा किया जा सकता है। जेल अधिकारियों को ऐसे मामलों की पहचान कर अदालत का ध्यान आकर्षित करने की जिम्मेदारी दी गई है। यह प्रावधान राहत की उम्मीद जगाता है, लेकिन इसकी सफलता प्रशासनिक जवाबदेही पर निर्भर करेगी। यदि फाइलों में ही प्रक्रिया अटकी रहे, तो कानून का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

इस समस्या के नैतिक और आर्थिक दोनों पहलू हैं। भीड़ वाली जेलों में अनावश्यक रूप से बंद कैदी सरकारी संसाधनों पर बोझ डालते हैं और अमानवीय परिस्थितियों को जन्म देते हैं। समाधान स्पष्ट है, समयबद्ध समीक्षा, अदालत व जेल प्रशासन के बीच सशक्त डिजिटल समन्वय और आर्थिक रूप से कमजोर आरोपियों के लिए व्यावहारिक जमानत शर्तें। न्याय केवल दंड नहीं, बल्कि व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा का दायित्व भी है। यदि लापरवाही के कारण नागरिक की आजादी बाधित होती है, तो यह न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।