जयपुर, May 30, 2026

फोटो: पत्रिका
अव्यय पुरुष सृष्टि में ब्रह्म का रूप ही है। सृष्टि का प्रथम सत्य है। जल समुद्र का प्रथम बुद्बुद् है। इस बुद्बुद् का केन्द्र परात्पर है, परिधि मायाबल है। वेदत्रयी ही बुद्बुद् है- केन्द्र ऋक्, परिधि साम, मध्य में यत्+जू। यहां यह केन्द्र में 'यत्’ रूप पुरुष प्रतिष्ठित है। यही केन्द्र हृदय बनता है- अव्यय मन का। मनोमयी अव्यय की कामना हृदय के ब्रह्मा प्राण की अशनाया बनती है। इन्द्र और विष्णु प्राण इस क्षुधा/कामना की पूर्ति करते हैं। उस हृदय को ही ब्रह्म की मूल प्रकृति कहा जाता है। अव्यय पुरुष एवं प्रकृति मिलकर ही 'एकोहं बहुस्याम्’ रूप विश्व का निर्माण और संचालन करते हैं।
अव्यय स्व है और अक्षर तंत्र है। जब दोनों साथ रहते हैं तब व्यक्ति स्वतंत्र कहलाता है। साधारणत: अव्यय मन सृष्टि कार्य में- आनन्द, विज्ञान गर्भित 'मन’ - रूप कार्य करता है। जैसे ही पुरुष मन में कामभाव उत्पन्न होता है, यह बुद्धि से होता हुआ सर्वेन्द्रिय मन में पहुंचता है। हृदयस्थ मन में प्राणन होता है। यही आत्मा का भी स्थान है।
स्त्री की कामना पुरुष के सोम भाग पर प्रहार करती है। चन्द्रमा से अन्न और अन्न से बना मन दुर्बल होता है- आग्नेयी कामना के आगे। स्त्रैण कामना भी हृदय में पहुंचती है। इसका प्राणिक आदान-प्रदान पुरुष हृदय में होता है। दोनों कामना घनीभूत होती हैं।
कामना का स्वरूप सदा समान नहीं रहता। स्वयं कामना कितनी तीव्र है। पुरुष और स्त्री कामना के 6-6 स्तर होते हैं- घन, तरल, विरल रूप से। इसी के अनुरूप प्राण गतिमान होते हैं। शरीर पर (क्षर) है। इसका सीधा अव्यय से सम्पर्क परतंत्रता उत्पन्न करता है। मन की कामना आत्मा पर भारी पड़ती है। मनमानी भोग का लक्षण है। पर-तंत्र बन जाता है।
हमारे तीन शरीर, तीन मन हैं, अत: कामना के भी तीन ही स्तर हैं। स्थूल शरीर की कामना भी स्थूल स्तर की, आहार-निद्रा-भय-मैथुन (पाशविक) ही होगी। अपरा प्रकृति का क्षेत्र होने से यह जीव की कामना का क्षेत्र है जो इन्द्रियों द्वारा (परा प्रकृति) विषयों के आकर्षण से उत्पन्न होती है। कामना का कारण परा में तथा कार्य अपरा में होते हैं। कई बार सूक्ष्म मन का जुड़ाव नहीं भी होता। तब न तो स्मृति होती है, न ही फल। प्यास लगी, पानी पिया, गिलास रखकर चले गए। देश-काल का प्रभाव नहीं जैसा।
सूक्ष्म मन की कामना में राग-आसक्ति-पुनरावृत्ति जैसे भाव पैदा हो जाते हैं। कर्म तो स्थूल शरीर ही करता है, किन्तु आसक्ति आदि भावों से युक्त होने पर वे कर्मफल और स्मृति उत्पन्न करते हैं। जीवात्मा का स्तर होने के कारण इसका सम्बन्ध अव्यय (कारण) शरीर से भी रहता है। जीवन का संचालन सूक्ष्म स्तर से ही होता है। पौरुष भाव स्थूल के प्रभाव में अधिक रहता है। संवेदनशील होने के लिए अलग से अभ्यास करना होता है। स्त्रैण का विकास ही मन में होता है। जन्म से ही स्त्री में मातृत्व भाव प्रतिष्ठित रहता है। अत: वह दोनों स्तरों पर साथ-साथ जीती है। पुरुष पर यही स्त्री की श्रेष्ठता है।
कामना जब अव्यय मन से उठती है तब उसमें विवर्त भाव भी होता है और प्रारब्ध भी होता है। यही कामना हृद् प्राणों को गतिमान करती है। दोनों ओर के जीवात्मा इस यज्ञ में जुड़ते हैं। स्त्री शरीर में रक्त की उष्णता बढ़ती है, पुरुष शरीर में प्राणों का तपन होता है। पुरुष शरीर के सभी अंगों से अंश द्रवित होकर शुक्र की ओर प्रवाहित होते हैं।
अव्यय मन की कामना पूर्ण होती ही है। सम्पूर्ण चराचर इसी कामना से संचालित होता है। अव्यय कामना में ब्रह्म और माया को भी भूमिका निभानी होती है। यही तो वह ब्रह्म-अंश है, जो जीवात्मा के साथ साक्षी रूप में रहता है। जहां कामना स्थूल शरीर से उठती है, वहां माया की भूमिका अनिवार्य नहीं होती। वहां विवर्त भाव भी नहीं बनता। सूक्ष्म मन का जुड़ना भी वैकल्पिक ही होगा। यह शुद्ध भोग दृष्टि है, भले ही अप्राकृतिक नहीं है। भोग और मनोरंजन की निरन्तरता ब्रह्ममार्ग और जीवात्मा के मध्य की स्पन्दनात्मक पृष्ठभूमि को ही समेट देती है। जीवात्मा का सम्बन्ध कारण शरीर से होता ही नहीं।
इसका उदाहरण है मन की चंचलता। मन का विषयों की ओर दौड़ना, बार-बार दौड़ना, नवो नवो भवति जायमान:। इस चंचलता की दिशा मन ही तय करता है। मुक्ति साक्षी अथवा सृष्टि साक्षी, सतोगुणी-रजोगुणी अथवा तमोगुणी। सौम्य अथवा आग्नेय, घन-तरल-विरल इत्यादि। अर्जुन, कृष्ण से यही कह रहे हैं कि मन बड़ा ही चंचल, प्रमथनशील (मथने वाला), दृढ़ (जिद्दी) और बलवान् है। उसका निग्रह करना मैं वायु की तरह अत्यन्त कठिन मानता हूं—
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।। (गीता 6/34)
पुरुष भीतर सौम्य है, स्त्री बाहर सौम्य। ऋत भाव होने से चंचलता ही सोमाश्रित भाव होता है। स्त्री शरीर चंचलता का पर्याय है। खाने-पहनने से लेकर जीवन के प्रत्येक आयाम में यह चंचलता - नयेपन के प्रति रुझान - परिलक्षित होता है।
एक ओर स्त्री स्वयं कामना का पर्याय है, दूसरी ओर चंचलता का। इसी स्वभाव से तो वह विश्व को गतिमान रख पाती है। स्वाद की चंचलता सर्वविदित है। यही उसके मन का निर्माण करती है। यही विश्व का उपादान कारण बनती है। यह तो सही है कि जीवन का बड़ा भाग पूर्व निर्धारित है, शेष ही चक्र को नई गति प्रदान करता है। आत्मा में कर्ता भाव नहीं है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् (4.19) में कहा गया है कि यह आत्मा न ऊपर है, न बीच में, न नीचे ही किसी योनि में स्थित है- नैनमूध्र्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये न परिजग्रभत्। आत्मा वस्तुत: साक्षी चैतन्य है जो 84 लाख योनियों में भ्रमण करता हुआ भी स्वतंत्र रहता है, उसमें बंधन नहीं होता।
प्रकृति में मायाबल ही दोनों ओर कार्य करता है। आत्मा भी कर्तृत्व भाव से मुक्त है। स्त्री-पुरुष के मध्य मायाबलों का ही आदान-प्रदान है। पुरुष भीतर सौम्य भी है और दुर्बल भी। चंचलता की मार यहीं पड़ती है। पुरुष भीतर के प्रति सचेत भी कम होता है। सोम दुर्बल हो और अग्नि बलवान तब सोम का क्या होगा? स्त्री की अन्तर्दृष्टि पुरुष को भीतर से पकड़ लेती है। उसकी वहां पर भाषा भी परोक्ष होती है या मात्र सांकेतिक होती है।
नर रूप में भी ब्रह्म स्वच्छन्द अवस्था में रहना चाहता है। उसके साथ उसकी इच्छा 'एकोऽहं बहुस्याम’ रहता है। यहां माया उसे बांधती है। उसका स्वरूप निर्माण करती है। उसमें स्नेह की रसधार प्रवाहित करती है। उसे जीवन का मार्ग तय करना आता है। नव निर्मित ब्रह्म का यह स्वरूप साधारण नर से भिन्न हो जाता है। इसी प्रक्रिया में माया का भी स्वरूप बदलता है। माया का रूप संकुचन है। ब्रह्म फैलाव चाहता है। माया ग्रहण करती है। विस्तार के लिए संकल्पित होकर आगे आती है। ब्रह्म की शक्ति बनकर ब्रह्म का विस्तार करती है। उसका पोषण करती है। विस्तार को भी ब्रह्म की प्रतिकृति बनाने का प्रयास माया ही करती है।
आज तो स्त्री कई गुणा अधिक आक्रामक हो गई है। उसका पौरुष भाव भी बढ़ा है, स्त्रैण भाव घटा है। अर्थात् पुरुष के समान भीतर का आग्नेय भाव बढ़ा है। सौम्य भाव ढलान पर आ गया। उसकी भीतरी आक्रामकता झलक रही है। चंचलता के लिबास में पुरुष को कहां तक लपेटकर ले जाएगी, समय ही बताएगा।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com
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Published on: 30 May 2026 09:52 am

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