
-गिरीश्वर मिश्र पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा
संक्रांति का अर्थ होता है संक्रमण और 'पर्व' (पोर!) जोड़ या संधि को कहते हैं। याद करें, अंगुली के भी पोर होते हैं और बांस के भी। पोर वह जगह है, जहां जोड़ होता है। मकर संक्रांति का अवसर प्रकृति की लय में एक विशेष किस्म के संयोजन के क्षण को रेखांकित करता है। भारत की सांस्कृतिक परंपरा में यह एक अत्यंत प्राचीन खगोलीय सौर पर्व है। इस दिन सूर्य लगभग 23.5 डिग्री दक्षिण से उत्तर की ओर गति करता है। चूंकि भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है इसलिए इस समय पृथ्वी सूर्य के दायीं तरफ रहती है। यह पर्व पौष के महीने में उस तिथि को मनाया जाता है जब सूर्य देव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण में अवस्थित होते हैं। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, परंतु कर्क एवं मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से विशेष फलदायी माना जाता है।
मान्यता यह भी है कि इस तिथि को सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए यह तिथि 'मकर संक्रांति' के नाम से प्रसिद्ध हुई। संक्रांति के बाद से दिन भी बड़े होने लगते हैं। मकर संक्रांति के आगे के छह महीने बड़े शुभ और शादी ब्याह आदि मांगलिक कार्यों के लिए उत्तम माने जाते हैं। यह पर्व अक्सर 14 या 15 जनवरी को पड़ता है। इसके बाद सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर होता है। इसीलिए इस पर्व को 'उत्तरायण' भी कहते है। वैज्ञानिक तौर पर देखें तो इसका मुख्य कारण पृथ्वी का निरंतर 6 महीनों की अवधि बीतने के बाद उत्तर से दक्षिण की ओर चलना है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह वह अवसर है जब कृषि-चक्र का नया चरण शुरू होता है। दिन-रात्रि संतुलन की ओर आगे बढ़ते हैं। शीत से ऊष्मा की ओर संक्रमण होता है। इसी अर्थ में इसे प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ मानव जीवन की लय का पर्व कहा जाता है। इस अवसर पर किसान अपनी अच्छी फसल के लिए भगवान को धन्यवाद देकर आशीर्वाद मांगते हैं। इसलिए फसलों एवं किसानों के त्योहार के रूप में प्रसिद्ध है।
भारत में यह मुख्य रूप से 'दान का पर्व' है। कहते हैं इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर वापस मिलता है। शुद्ध घी एवं कम्बल के दान का विशेष महत्व है। पद्मपुराण में इस दिन तिलदान, गजदान, तथा वस्त्रदान करने का विधान मिलता है। संक्रांति के दिन प्राय: नदियों के संगम-स्थल पर मेला लगता है। गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है। तीर्थराज प्रयागराज में त्रिवेणी संगम, जहां गंगा, यमुना व सरस्वती तीनों नदियों का प्रवाह है, हर वर्ष एक माह तक चलने वाला माघ मेला लगता है। इस मेले का पहला स्नान मकर संक्रांति को ही होता है। बंगाल में गंगासागर में प्रति वर्ष संक्रांति के दिन विशाल मेला लगता है। कड़ाके की ठंड में भी लोग दूर-दूर से चलकर गंगा-स्नान के लिए आते हैं और भक्ति भाव से स्नान करते हैं। उत्तर भारत में खिचड़ी खाने एवं खिचड़ी-दान का विशेष महत्व है। इस पर्व को उत्तर भारत में 'मकर-संक्रांति', तमिलनाडु में 'पोंगल', असम में 'माघ बिहू', पंजाब में 'लोहड़ी', गुजरात में 'उत्तरायण' और महाराष्ट्र में 'तिलगुल' कहते हैं। कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में 'संक्रांति' और उत्तर प्रदेश तथा बिहार में यह 'खिचड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रांति पर कपास, तेल, नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गुल नामक हलवे के बांटने की प्रथा भी है। बिहार में दिन में दही चूड़ा और रात को उड़द की दाल और चावल की खिचड़ी खाते हैं। इस दिन लाई के लड्डू भी बनाते हैं। तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। पहले दिन भोगी-पोंगल, दूसरे दिन सूर्य-पोंगल, तीसरे दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे दिन कन्या-पोंगल। पहले दिन कूड़ा करकट इकट्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। अगले दिन सूर्य देव को खीर का नैवैद्य चढ़ाया जाता है और उसका प्रसाद सभी ग्रहण करते हैं। राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को बायना देती हैं। साथ ही महिलाएं सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर उसे दान करती हैं। इस अवसर पर कई जगह पतंग उड़ाने की प्रथा है।
गौरतलब है कि यह पर्व केवल ऋतु-परिवर्तन का संकेत बार नहीं, बल्कि धर्म, कर्म, दान, तप, उत्तरायण और मोक्ष-चिंतन के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। यह संक्रांति दूसरी संक्रांतियों से विशिष्ट है, क्योंकि यही वह क्षण है जहां से उत्तरायण का आरम्भ माना जाता है। सूर्य के उत्तरगमन और प्रकाश-वृद्धि की अवधारणा बड़ी पुरानी है। सूर्य को ऋत और धर्म का प्रतीक माना गया है। उपनिषदों में उत्तरायण को देवयान कहा गया है। अर्थात् उत्तरायण का पथ ज्ञान, प्रकाश और मोक्ष की दिशा है। इस तरह संक्रांति एक गहन आध्यात्मिक प्रतीक भी है। मकर संक्रांति संयम-पर्व, कृषि-पर्व, ज्ञान-पर्व और सामाजिक समरसता का पर्व भी कहा जाता है। यह पर्व भारतीय जीवन को प्रकृति, धर्म और अध्यात्म से जोड़ता है। यह सिर्फ पंचांग की तिथि ही नहीं, बल्कि मानव चेतना के उत्तरायण का उत्सव है। यह पर्व सिखाता है कि जीवन का प्रयोजन केवल उपभोग नहीं बल्कि त्याग करते हुए दूसरों का हित साधते हुए आगे बढऩा है। वह यह संदेश भी देता है कि अपने सीमित स्व के घरौंदे को लांघकर दूसरों के कल्याण में ही वास्तविक विस्तार देकर हम उत्कर्ष कर सकते हैं।
Updated on:
14 Jan 2026 02:04 pm
Published on:
14 Jan 2026 02:02 pm
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