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संपादकीय: समाज को झकझोरने वाली संवेदनहीनता की पराकाष्ठा

वेंकटरमन की मौत से यह तथ्य भी सामने आता है कि संकट की घड़ी में कोई असहाय हो उस वक्त लोगों की संवेदनहीनता कितनी घातक हो सकती है।

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जयपुर

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ANUJ SHARMA

Dec 18, 2025

संकट के समय तात्कालिक मदद मिल जाए तो बड़ी से बड़ी मुसीबत के वक्त राहत मिलती है लेकिन बेंगलूरु के बालाजी नगर में रहने वाले 34 वर्षीय मैकेनिक वेंकटरमन की मौत से जुड़ा घटनाक्रम न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाला है, बल्कि हमारे समाज के रवैये और चिकित्सा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। वेंकटरमन की मौत से यह तथ्य भी सामने आता है कि संकट की घड़ी में कोई असहाय हो उस वक्त लोगों की संवेदनहीनता कितनी घातक हो सकती है। वेंकटरमन के सीने में तेज दर्द हृदयाघात का स्पष्ट संकेत था, इसके बावजूद समय पर चिकित्सा सहायता का न मिलना, अस्पतालों की लापरवाही और राहगीरों की उदासीनता ने मिलकर एक परिवार की समूची दुनिया उजाड़ दी।


मदद मांगती हुई महिला की उस पीड़ा की गहराई का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है जब वह अपने पति को जान बचाने के लिए मोटरसाइकिल पर अस्पताल-दर-अस्पताल भटकती है। पहले निजी अस्पताल में डॉक्टर ही उपलब्ध नहीं हुआ तो दूसरे में ईसीजी के बाद भी न तो आपातकालीन उपचार शुरू किया गया और न ही मरीज को अन्यत्र भिजवाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था की गई। निश्चित ही यह हमारे स्वास्थ्य ढांचे की खोखली तैयारियों को दर्शाता है। लेकिन इससे ज्यादा शर्मनाक घटनाक्रम उस हादसे से जुड़ा है जिसकी चपेट में आकर सड़क पर पति घायल अवस्था में पड़ा हुआ था और पत्नी लोगों से मदद के लिए हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती रही। वाहन बिना रुके निकलते गए। बाद में एक टैक्सी चालक ने अपनी गाड़ी रोक पति-पत्नी को अस्पताल पहुंचाया तब तक काफी देर हो चुकी थी। लोगों की संवेदनाओं के मरते ही वेंकटरमन भी यह दुनिया छोड़ चुका था। यह कोई अकेला घटनाक्रम नहीं। ऐसी आपदा के दौरान जब संवेदनहीन रवैया नजर आता है तो उसके लिए कोई एक व्यक्ति या संस्था नहीं बल्कि पूरा समाज जिम्मेदार होता है। हम व्यवस्था को कोसते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि व्यवस्था हमसे ही बनती है। अस्पतालों की लापरवाही ने इस महिला की त्रासदी को बढ़ाया तो राहगीरों की चुप्पी ने क्रूरता का चेहरा सामने ला दिया। कहा तो यह जाता है कि आपातकालीन चिकित्सा में समय ही जीवन है। हृदयाघात के मामलों में तो पहले 60 मिनट (गोल्डन ऑवर) सबसे निर्णायक होते हैं। ऐसे में अस्पतालों की जिम्मेदारी है कि वे हमेशा प्रशिक्षित स्टाफ, त्वरित उपचार प्रोटोकॉल और एम्बुलेंस उपलब्ध रखें। ईसीजी के बाद उपचार टालना अपराध सरीखा है। निजी अस्पतालों की जवाबदेही और लापरवाही पर सख्त सजा हो।


यह घटना एक ही सीख देती है कि रुकिए, देखिए, मदद कीजिए। सड़क पर किसी की पुकार अनसुनी न करें। क्योंकि संवेदना कोई अतिरिक्त गुण नहीं, यह हमारी मानवीय पहचान है। हमें बदलना होगा- ताकि अगली बार कोई समय पर इलाज मिलने से वंचित न हो तथा मदद के लिए कोई पीछे न हटे।


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