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संघर्ष ऐसा भी: सारे रास्ते बंद हुए तब पढ़ाई का खोला रास्ता

- अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस: पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिए शुगन की जगह पौधे बांटने का सिलसिला

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श्रीगंगानगर. घड़साना की मूल की रहने वाली नीतू बिश्नोई ने अपने संघर्ष को चुनौती के रूप में स्वीकार किया है। उसने बताया कि अब किसी के जन्मदिन या शादी में शुगन की जगह पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधे को गिफ़ट में देती है। यह पौधा जीवन के उस दौर की याद दिलाता है जब खुद के लिए पहले संघर्ष करता है फिर हरा भरा होने पर दूसरों को हवा और सुकून देता है। नीतू ने बताया कि वर्ष 2007 में जब उसकी शादी हुई तब उसकी दसवीं कक्षा की पढ़ाई बीच में छुडा दी गई। आ​र्थिक तंगी से जूझ रहे परिजनों ने अगले घर सुकून का होगा, यह सोच कर विवाह कर दिया। लेकिन अगले घर उसे सुख की बजाय तकलीफ मिली तो वह अपने छोटे से बच्चे के साथ वापस अपने मायके आ गई। लेकिन तब उसे आ​र्थिक तंगी की चुनौती देने लगी। बच्चे के जीवन के लिए उसने किसी के सामने हाथ फैलाने की बजाय पढ़ाई को अपना रास्ता खुद तय किया। विवाह के सात साल बाद दसवीं और बारहवीं बोर्ड परीक्षा पार करने के बाद पढ़ाई को जूनुन बना लिया। बच्चे की पालना के लिए प्ले स्कूल में नौकरी की। इसके बाद बच्चेों को टीचिंग करने लग गई। डबल एमए के बाद प्रतियोगी परीक्षाएं दे रही है। वहीं पर्यावरण बचाने के लिए हर कार्यक्रम में पौधा गिफट करती है। सैन्य अ​धिकारियों के परिवार की महिलाओं के संगठन वामा श​क्ति से भी जुड़कर सामाजिक कार्यो में अग्रणी भूमिका निभा रही है। नीतू का कहना है कि विवाह करने से अपने परिजन अपनी बेटियां को ​सम्पूर्ण ​शि​क्षित करें बीच में पढु़ाई छोड़ने पर भविष्य में ऐसी चुनौती आ सकती है जब निर्णय लेने की क्षमता भी नहीं रहती।