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नई दिल्ली, May 23, 2026

भारत की हरित उर्जा को चाहिए ‘सुपर ग्रिड’

भारत की लगातार बढ़ती बिजली की मांग और इसकी आपूर्ति के लिए तैयार हो रहा ग्रीन एनर्जी क्षमता की राह में एक बड़ी बाधा है ट्रांसमिशन नेटवर्क। ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी के चलते सौर उर्जा पार्कों में बिजली उत्पादन में कर्टेलमेंट भी करना पड़ रहा है। चीन ग्रीन एनर्जी के उत्पादन से उपयोग के लिए सुपर ग्रिड विकसित कर रहा है। भारत को भी ऐसी बड़ी परियोजना की आवश्यकता है। गौरतलब है कि पिछले दिनों एक कार्यक्रम में केंद्रीय नवीकरणीय उर्जा सचिव ने भी इसकी जरूरत बताई थी। भारत के 2030 तक 500 गीगावॉट रिन्यूएबल एनर्जी के लक्ष्य के लिए भी जरूरी है।

Green Energy

अभिषेक सिंघल

नई दिल्ली। भारत की लगातार बढ़ती बिजली की मांग और इसकी आपूर्ति के लिए तैयार हो रहा ग्रीन एनर्जी क्षमता की राह में एक बड़ी बाधा है ट्रांसमिशन नेटवर्क। ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी के चलते सौर उर्जा पार्कों में बिजली उत्पादन में कर्टेलमेंट भी करना पड़ रहा है। चीन ग्रीन एनर्जी के उत्पादन से उपयोग के लिए सुपर ग्रिड विकसित कर रहा है। भारत को भी ऐसी बड़ी परियोजना की आवश्यकता है। गौरतलब है कि पिछले दिनों एक कार्यक्रम में केंद्रीय नवीकरणीय उर्जा सचिव ने भी इसकी जरूरत बताई थी। भारत के 2030 तक 500 गीगावॉट रिन्यूएबल एनर्जी के लक्ष्य के लिए भी जरूरी है। एनर्जी परियोजनाएं स्थापित हो गई हैं लेकिन वहां से बिजली को ग्रिड तक पहुंचाने की गति धीमी है। जबकि औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के कारण ऊर्जा खपत में बड़ा उछाल आने की संभावना है।

चीन ने क्या किया है

चीन ने ट्रांसमिशन की चुनौती से निपटने के लिए अल्ट्रा हाई वोल्टेज (यूएचवी) आधारित सुपर ग्रिड विकसित किया है। चीन के पास 60 हजार किलोमीटर से अधिक ±1100 केवी तक की यूएचवी लाइनें हैं, जो एक बार में 8 से 12 गीगावॉट बिजली हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंचाने में सक्षम हैं। यह सुपर ग्रिड पश्चिमी रेगिस्तानी और दूरदराज क्षेत्रों में सौर, पवन और जल विद्युत परियोजनाओं में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं को न्यूनतम नुकसान के साथ पूर्वी चीन में बड़े औद्योगिक शहरों तक पहुंचाएगा। 2026-2030 के बीच ग्रिड विस्तार पर 4 ट्रिलियन युआन (करीब 574 अरब डॉलर) का निवेश करेगा। चीन की पवन और सौर ऊर्जा क्षमता लगभग 1,840 गीगावॉट है।

कर्टेलमेंट बन रहा बड़ा संकट

एनर्जी थिंक टैंक एम्बर की रिपोर्ट के अनुसार भारत में मई-दिसंबर 2025 के बीच करीब 2.3 टेरावॉट-घंटा (टीडब्ल्यूएच) सौर बिजली का कर्टेलमेंट हुआ। अक्टूबर 2025 में 0.9 टीडब्ल्यूएच सौर बिजली ग्रिड में नहीं गई। मई से दिसंबर 2025 के दौरान आपात ग्रिड प्रबंधन के तहत कर्टेलमेंट औसत मासिक सौर उत्पादन का करीब 18% तक पहुंचा।दिसंबर 2025 में ट्रांसमिशन न होने के कारण करीब 4 गीगावाट सौर क्षमता को कर्टेल करना पड़ा। वहीं क्रिसिल के अनुसार 2027 तक करीब 35 गीगावाट रिन्यूएबल क्षमता ग्रिड कर्टेलमेंट जोखिम का सामना कर सकती है।

क्या होता है कर्टेलमेंट

जब मांग से अधिक बिजली पैदा हो जाती है और ग्रिड में उसे संभालने की क्षमता नहीं होती, तब ग्रिड संतुलन बनाए रखने के लिए बिजली उत्पादन में कटौती की जाती है।

भारत की वर्तमान स्थिति

नेशनल इलेक्ट्रिसिटी प्लान के अनुसार फरवरी 2026 में से 5.04 लाख सर्किट किलोमीटर। इसे 2032 तक 6.48 लाख सर्किट किलोमीटर किया जाएगा। इंटररीजनल ट्रांसमिशन कैपिसिटी 120 गीगावाट। 2027 तक 143 गीगावाट और 2032 तक 168 गीगावाट की जाएगी। वर्तमान अधिकतम ट्रांसमिशन क्षमता : 765 केवी एसी देश की स्थापित सौर एवं पवन क्षमता: करीब 257 गीगावॉट। 2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा लक्ष्य : 500 गीगावॉट।

पिछले चार दिन में कैसे बढ़ी बिजली की मांग

18 मई - 257.37 गीगावाट

19 मई- 260.45 गीगावाट

20 मई- 265.44 गीगावाट

21 मई- 270.82 गीगावाट

इनका कहना है

टारगेट और क्षमता बढ़ाने की जरूरत पश्चिम एशिया संकट ने बताया है कि हमें एनर्जी सोर्स डाइवर्ट करने की जरूरत है। डेटा सेंटर्स, ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स, इंडस्ट्रीयल प्रोजेक्ट्स और ट्रांसपोर्ट एनर्जी शिफ्ट के चलते हमारी डिमांड बढ़ेगी। रिन्यूएबल एनर्जी के टारगेट को बढ़ाने और ट्रांसमिशन क्षमता को भी साढ़े छह लाख के टारगेट से बढ़ा कर दस लाख सर्किट किलोमीटर करने की जरूरत है।

- डीडी अग्रवाल, उर्जा विशेषज्ञ

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