
प्रतीकात्मक फोटो
SC Order : सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा मृत्यु मांगने के मामले में अपना फैंसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच के सामने रखा गया था। वकील को सुनने के बाद बेंच ने इस मामले को बेहद संवेदनशील मुद्दा बताते हुए, कहा कि इस मामले में बेंच हरीश राणा की जीवन रक्षक चिकित्सा को हटा लेने पर विचार करेगी।
इस मामले की सुनवाई सो पहले दोनों जस्टिस ने हरीश के माता-पिता से मुलाकात की। अदालत ने कहा कि यह इतना बेहद संवेदनशील मामला है कि इसमे फैसला सुनान बहुत कठिन है। अदालत ने यह भी कहा कि हम सभी इंसान हैं किसी भी मामले में यह तय करना कि कौन जिंदा रहे और कौन नहीं यह तय करना आसान नहीं होता। इसलिए इस फैसले को सुरक्षित रख लिया जता है। अगली तारीख पर अब अदालत इस मामले में आपना फैंसला सुनाएगी।
हरीश के माता-पिता की ओर से अमीकस क्यूरी ने इस मामले में पक्ष रखा। उन्होंने अदालत से कहा कि हरीश पिछले 13 वर्षों से बेड पर है। सिर्फ बेड पर ही नहीं है बल्कि पूरी तरह से कोमा में है। वह अपना कोई दैनिक कार्य नहीं कर पाता उसे कुछ नहीं पता है कि क्या हो रहा है। एक तरह से सिर्फ उसका शरीर जिंदा है और वह भी पूरी तर से नहीं। यह भी कहा कि हरीश के ठीक होने की अब कोई उम्मीद नहीं है। इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अपना पक्ष पखा और दलीलें दी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अब देखना यह होगा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला सुनाता है।
हरीश राणा अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहते हैं। 2013 में वह चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान रक्षाबंधन के दिन चौथी मंजिल से गिर गए थे। पीजी की चौथी मंजिल की बालकनी से गिरने के बाद हरीश के सिर में काफी चोट आई थी। इसके बाद हरीश ने आखें तो खोली लेकिन शरीर का कोई हिस्सा नहीं चल सका। इसके बाद से हरीश 13 साल बाद भी इसी स्थिति में हैं। हरीश हिल-डुल नहीं पाते खाने के लिए उनके गले से पेट तक के लिए ट्यूब डाली गई है। इस दुर्घटना के बाद और पिछले 13 साल में हरीश की हालत ने इनके परिवार को पूरी तरह से तोड़ दिया है। आर्थिक रूप से और मानसिक रूप से परिवार जैसे हर दिन टूट रहा है।
इलाज के लिए परिवार ने दिल्ली में स्थित अपना घर तक बेच दिया और गाजियाबाद में रहने लगे। परिवार में दो और बच्चे हैं उनकी भी जिम्मेदारी यह परिवार निभा रहा है। इतने लंबे समय बाद भी जब हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और चिकित्सकों ने उसके ठीक होने की सारी उम्मीद छोड़ दी तो परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में एक विनती डालते हुए इच्छा मृत्यु की मांग की। परिवार ने हाइकोर्ट में पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत मांगी थी लेकिन हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी थी. कोर्ट का कहना था कि हरीश किसी मशीन से पूरी तरह जुड़े नहीं हैं और उनका शरीर बुनियादी काम मेडिकल मदद से कर रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर खाने की सप्लाई बंद कर दी जाए तो इसे एक्टिव यूथेनेशिया माना जाएगा जो भारत में गैरकानूनी है।
जब हाइकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली तो 2025 में हरीश के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट जाते हुए हरीश के माता-पिता ने कहा था कि हरीश की हालत और अधिक खराब होती जा रही है। उसे सिर्फ मशीनों के सहारे जबरन जिंदा रखा जा रहा है। इस पर कोर्ट ने एक मेडिकल टीम बनाकर पूरे मामले की जानकारी रिपोर्ट मांगी थी। मेडिकल टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हरीश के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है। इसके बाद 18 दिसंबर को जस्टिस जेबी पारदीवाला ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 15 जनवरी को फैसला सुनाने की तारीख तय की थी। गुरुवार आज इस मामले में फैसला सुनाया जाना था लेकिन अदालत ने फैसले को सुरक्षित रख लिया है।
Published on:
15 Jan 2026 02:38 pm

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