
Faridabad: दिल्ली से सटे फरीदाबाद जिले में उस वक्त इंसानियत शर्मसार हो गई, जब एक गरीब मजदूर को अपनी पत्नी का शव ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिली। स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल तब खुल गई, जब मजबूर होकर उसे पत्नी का शव रिक्शे पर ले जाना पड़ा। इंसानियत को मरते तब देखा गया जब व्यक्ति के साथ उसका छोटा बच्चा और वह मिलकर शव को रिक्शे पर लाद रहे थे, लेकिन कोई उनकी मदद करने के लिए आगे नहीं आया।
आपको बता दें कि दिल को झकझोर देने वाली यह घटना हरियाणा के फरीदाबाद जिला अस्पताल की है। दरअसल, बिहार का रहने वाला एक परिवार फरीदाबाद के सारण गांव में एक कमरा किराए पर लेकर रहता था। गुनगुन नाम का व्यक्ति ऑटो चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसकी पत्नी पिछले तीन महीनों से टीबी से जूझ रही थी। इलाज के लिए वह उसे नियमित रूप से सिविल अस्पताल लेकर जाता था। गुनगुन के मुताबिक, पत्नी को बेहतर इलाज के लिए बड़े अस्पतालों में भी रेफर किया गया था, लेकिन वहां से भी कोई खास सुधार नहीं हुआ। पत्नी को बचाने के लिए ऑटो चालक ने अपनी पूरी कमाई खर्च कर दी थी। बुधवार को भी वह हमेशा की तरह इलाज के लिए पत्नी को अस्पताल लेकर आया था, लेकिन इसी दौरान महिला की मौत हो गई।
गुनगुन का कहना है कि पत्नी की मौत होने के बाद बाद डॉक्टरों ने शव को घर ले जाने के लिए कह दिया । पूरे अस्पताल में घूमता रहा लेकिन वहां पर कोई एंबुलेंस नहीं था, जिससे वह अपनी पत्नी को घर लेकर जाता। इसके बाद गुनगुन प्राइवेट एंबुलेंस से पत्नी को ले जाने की सोची तो पता चला कि वे 7 किलोमीटर जाने के लिए 700 रुपए मांग रहे है। गरीब मजदूर ने अस्पताल के बाहर घंटों खड़ा होकर सोच विचार किया जब कुछ आस नहीं बचा तो वह अपनी पत्नी के शव को रिक्शे पर ले जाने के लिए मजबूर हो गया।
इस घटना ने न सिर्फ अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरियों को भी उजागर कर दिया है। इस मामले पर सिविल अस्पताल के डिप्टी सिविल सर्जन एम.पी. सिंह ने सफाई देते हुए कहा कि हरियाणा स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस सेवाओं में शव ले जाने की व्यवस्था नहीं होती। इसके लिए मोर्चरी वैन की सुविधा रेड क्रॉस के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है। उन्होंने बताया कि फिलहाल फरीदाबाद में यह सेवा मौजूद नहीं है और इसके लिए कंट्रोल रूम के जरिए मांग भेजी जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी परिजन को शव ठेले या रिक्शे पर ले जाना पड़ा है, तो पूरे मामले की जांच कराई जाएगी और लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
अब सवाल यह है कि आखिर रिक्शे पर किसकी लाश है? उस बदनसीब की, जिसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह एंबुलेंस से पत्नी का शव ले जा सके? या उस सिस्टम की, जिसके पास एक एंबुलेंस तक नहीं थी कि किसी गरीब मजदूर के काम आ सके? या फिर उन संवेदनाओं की लाश है, जो समाज में कहीं मर चुकी हैं।
Published on:
29 Jan 2026 05:39 pm

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