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भारत, May 21, 2026

एक बड़े IAS का फोन, कांची मठ से आया फैक्स…तो क्या बच सकती थी राजीव गांधी की जान!

Rajeev Gandhi Death Anniversary: वो आईएएस जिसे हो गया था राजीव गांधी पर खतरे का अहसास। मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए भी चुनाव के बीच में किया था खतरे से आगाह। कांची मठ से भी आया था फैक्स। पढ़िए राजीव गांधी से जुड़े कुछ अहम प्रसंग।

RAJIV

Rajeev Gandhi Death Anniversary: 21 मई, 1991 की वह शाम बड़ी मनहूस थी। देश में लगातार दूसरे प्रधानमंत्री की हत्या हुई थी। राजीव गांधी... देश के युवा प्रधानमंत्री। चुनाव प्रचार करते हुए, जनता से घुलते-मिलते, आत्मघाती बम हमले में मार डाले गए थे। उनसे पहले 31 अक्तूबर, 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके ही सुरक्षा गार्ड ने गोलियों से छलनी कर दिया था। उनकी हत्या के बाद ही इंदिरा के बेटे राजीव प्रधानमंत्री बनाए गए थे।

राजीव की जान को खतरा है, इसका अहसास देश के एक बड़े आईएएस अफसर को पहले से हो गया था। वह थे टीएन शेषन। शेषन ने राजीव गांधी के साथ लंबे समय तक काम किया था। वह उनकी सुरक्षा के प्रभारी भी रह चुके थे। उन्हें ज्योतिष में बड़ी दिलचस्पी थी और इस आधार पर भी उन्हें राजीव गांधी पर खतरे का अनुमान हो चुका था।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने किया फोन, कांची मठ से आया फैक्स

लोक सभा के चुनाव चल रहे थे। 20 मई को पहले दौर की वोटिंग हो चुकी थी। टीएन शेषन उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त थे। वह ज्योतिष के आधार पर चुनाव में राजीव गांधी की जीत देख रहे थे। राजीव के साथ उन्होंने लंबे समय तक काम किया था। 10 मई, 1991 को उन्होंने उनसे यूं ही बात की। कोई एजेंडा नहीं था। यूं ही, व्यक्तिगत बातचीत। इसमें उन्होंने उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। साथ ही सलाह दी कि इस तरह खुले आम प्रचार नहीं करें। राजीव ने यह कहते हुए हंस कर बात टाल दी, 'मैं दो बार थोड़े न मरूंगा।' शेषन ने उन्हें एक बार फिर आगाह किया।

चार दिन बाद, 14 मई को कांची मठ के शंकराचार्य की ओर से शेषन के लिए एक संदेश आया। कहा गया कि राजीव को सचेत रहने के लिए कहें। शेषन की ओर से बताया गया कि उनकी सलाह के बावजूद राजीव खतरे को हल्के में ले रहे हैं। तब सीधे प्रधानमंत्री को फैक्स किया गया। यह फैक्स उनके टेबल पर 17 मई को पहुंचा। लेकिन इसे राजीव गांधी पढ़ पाते, उससे पहले ही उनकी हत्या हो गई। 21 मई की देर शाम तमिलनाडु के श्रीपेरंबूदुर में आत्मघाती बम धमाके में उनकी जान ले ली गई। तब वह चुनाव प्रचार ही कर रहे थे।

टीएन शेषन ने अपनी आत्मकथा 'थ्रू द ब्रोकन ग्लास' में इस वाकये का जिक्र किया है। उन्होंने उनके साथ के कई किस्से किताब में दर्ज किए हैं।

राजीव गांधी को पर्यावरण की थी बड़ी चिंता, कर लिया था बड़ा वादा

राजीव गांधी पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर बड़े चिंतित रहते थे। वन और वन्यजीव (forests and wildliefe) मंत्रालय उन्होंने ही बनाया था। 1984-85 में जब वह चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री बने थे, तब उन्होंने कृषि मंत्रालय से अलग कर यह मंत्रालय बनाया था। इस मंत्रालय के पहले सचिव थे टीएन शेषन। जी हां, वही शेषन जो बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Officer) बने और सख्त सीईसी के रूप में अपनी पहचान बनाई।

शेषन को दिल्ली राजीव गांधी ही लाए थे। उन्हें लगातार घटते जंगल और वन्यजीवों की कमी से पर्यावरण पर पड़ने वाले बुरे असर को लेकर चिंता थी। उन्होंने शेषन को बताया कि वह हर साल 50 लाख हेक्टेयर जमीन पर पेड़ लगाने की योजना पर अमल कराना चाहते हैं। टीएन शेषन ने इस घटना का जिक्र करते हुए अपनी आत्मकथा 'थ्रू द ब्रोकन ग्लास' में लिखा है कि एक हेक्टेयर के लिए 2000 पौधे चाहिए थे। इतने बड़े पैमाने पर पौधों का इंतजाम, फिर उन्हें लगाना, उनकी देखभाल करना…बहुत ही मुश्किल काम था। लेकिन, राजीव गांधी ने बतौर पीएम टीवी पर अपने पहले भी भाषण में साफ कर दिया था कि इस वादे से पीछे नहीं हटना है।

खरी-खरी बात करने वाले को पसंद करते थे राजीव गांधी

एक सांसद ने सदन में पीएम से सवाल पूछा कि आप अपना यह वादा पूरा कैसे करेंगे? पीएम को जवाब देना था। एक बैठक में उन्होंने शेषन से पूछा, 'बताइए, कैसे करेंगे?' शेषन ने अपने अफसरों से योजना पर अमल के बारे में सुझाव मांगे थे, लेकिन किसी ने कोई सुझाव नहीं दिया था। शेषन ने बैठक में साफ कहा, '50 लाख हेक्टेयर जमीन पर पौधे लगाने का वादा आपका है। हमें इस स्कीम की बारे में कुछ पता नहीं।' बैठक में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया था।

शेषन ने बोलना जारी रखा था, 'एक हेक्टेयर में ढाई एकड़ होते हैं। हमें 125 लाख एकड़ जमीन चाहिए होगी। इतनी जमीन कहां से मिलेगी? एक हेक्टेयर में हम 2000 पौधे लगा सकते हैं। इस हिसाब से हर साल 1000 करोड़ पौधे चाहिए होंगे। एक पौधे का खर्च ढाई रुपये पड़ेगा तो पौधे उगाने के लिए 2500 करोड़ रुपये चाहिए। पर, इसके लिए कोई बजट ही नहीं रखा गया है। इसके अलावा पौधों की सिंचाई, मजदूरों की मजदूरी और अन्य खर्च के लिए भी पैसे चाहिए।'

शेषन लगातार बोले जा रहे थे। उनकी बगल में बैठा एक अफसर उनकी शर्ट खींच कर चुप रहने का इशारा कर रहा था। एक सेक्रेटरी ने धीरे से चुप रहने के लिए भी कहा। शेषन ने सामान्य आवाज में साफ कहा, 'मैं क्यों चुप रहूं? कुछ गलत तो नहीं कह रहा हूं?' इस पर राजीव बोले, 'आप एकदम साफ बात कह रहे हैं।'

मीटिंग के बाद शेषन के साथी अफसर कहने लगे- अब तो आपका ट्रांसफर पक्का। भला पीएम से ऐसे बात की जाती है? लेकिन, शेषन पर कोई एक्शन लेने के बजाय राजीव गांधी ने स्पष्ट बोलने के लिए उनकी तारीफ की।

राजीव के बारे में शेषन लिखते हैं, 'राजीव ऐसे व्यक्ति को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे जो जानता कुछ न हो, पर ढोंग सब कुछ जानने का करता हो।'

जब एक अनुभवहीन अफसर को दे दी थी अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी

1986 में दो अक्तूबर को राज घाट पर राजीव गांधी पर एक हमला हुआ था। इस हमले में वह बाल-बाल बच गए थे। अगले दिन उन्होंने टीएन शेषन को बुला कर घटना की पूरी रिपोर्ट देने के लिए कहा। शेषन ने कहा कि उन्होंने सुरक्षा से संबन्धित काम पहले कभी नहीं किया है, इसलिए कोई और व्यक्ति इस काम के लिए सही रहेगा। राजीव नहीं माने। उन्होंने कहा, 'आप साफ बोलते हैं, किसी से डरते नहीं हैं। इसीलिए यह काम आपको दिया है। चार लोगों की एक कमिटी बनी। शेषन ने 150 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की और 26 अक्तूबर को प्रधानमंत्री को सौंप दी।

15 दिसंबर को राजीव गांधी के दफ्तर (पीएमओ) से शेषन को एक फोन आया। कहा गया- एयरपोर्ट जाकर पीएम से मिलें। राजीव गांधी जयपुर से लौटने वाले थे। शेषन जल्दी से हवाईअड्डे पहुंचे। राजीव गांधी आए। अपनी इंपोर्टेड लाल जीप की ड्राइविंग सीट पर बैठ गए। बगल में पी चिदंबरम और पीछे की सीट पर शेषन बैठे थे। जीप चलाते-चलाते राजीव गांधी ने टीएन शेषन के लिए अपना आदेश सुना दिया। उन्होंने कहा- आपने अपनी रिपोर्ट में सुरक्षा से संबन्धित जो सुझाव दिए हैं, उन पर अमल सुनिश्चित कराइए। शेषन बोले- मगर कैसे? प्रधानमंत्री ने तुरंत जवाब दिया- सुरक्षा का जिम्मा अपने पास लेकर। इस तरह शेषन पीएम की सुरक्षा के इंचार्ज हो गए।

ज्यादा खर्च न हो, इसलिए एंबेसेडर को ही बुलेटप्रूफ करवाया

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी और अरुण सिंह (तब के संचार मंत्री) की पहल पर प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए एसपीजी बनाई गई थी। राजीव की सुरक्षा के लिए इंपोर्टेड बुलेटप्रूफ कार खरीदना काफी महंगा पड़ता. इसलिए शेषन और एसपीजी ने मिल कर उनकी एंबेसेडर कार को ही बुलेटप्रूफ करवा दिया।

राजीव अपनी सुरक्षा को कभी हल्के में नहीं लेते थे, लेकिन कुछ मौकों पर वह अपनी सुरक्षा टीम की बात अनसुनी भी कर देते थे। शेषन ने उन्हें भारत-श्री लंका समझौते पर दस्तखत के लिए कोलंबो नहीं जाने की सलाह दी थी। गृह राज्य मंत्री के तौर पर पी चिदंबरम भी शेषन की राय से सहमत थे। लेकिन, राजीव ने किसी की नहीं सुनी। वहां एक सैनिक ने राइफल की बट से उन पर हमला कर ही दिया। गनीमत रही कि वह बाल-बाल बच गए।

शेषन लिखते हैं कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा का ख्याल रखते हुए वह कई बार कुछ ऐसा भी कर देते थे, जो उनके लिए ठीक नहीं था। जैसे कई बार उन्होंने राजीव गांधी के हाथ से बिस्किट तक छीन लिया था। उनका मानना था कि पीएम को कोई भी चीज बिना जांच-परख के नहीं खानी चाहिए।

मनचाही तारीख पर करवाना चाहते थे लोक सभा चुनाव

1989 में राजीव गांधी ने आम चुनाव कराने की घोषणा की। राजीव गांधी ने टीएन शेषन को बुलाया और कहा कि चुनाव नवंबर में 21, 22 और 25 तारीख को होने चाहिए। शेषन को राजीव गांधी ने तब तक कैबिनेट सेक्रेटरी बना दिया था। उन्होंने पीएम को साफ बता दिया कि तारीख तय करने का कानूनी अधिकार चुनाव आयोग का है, हम सरकार की तरफ से सुझाव दे सकते हैं। पर राजीव अड़े थे। उन्होंने शेषन से कहा, 'मेरी बताई तारीखों पर ही चुनाव हों। आप यह बात पेरी शास्त्री (आरवीएस पेरी शास्त्री, जो तब मुख्य चुनाव आयुक्त थे) को बता दें।' शेषन ने साफ इंकार कर दिया। तब राजीव गांधी ने अपने प्रिंसिपल सेक्रेटरी को इस काम के लिए चुनाव आयोग भेजा था। शेषन लिखते हैं कि दोनों की मीटिंग अच्छी नहीं रही थी। वैसे, 1989 के चुनाव 22 और 26 नवंबर को हुए थे।

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