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Bengal politics: जब कोलकाता की गलियों में गरजी बूंदकें, ऑपरेशन स्टेपलचेज में चुन चुनकर मारे गए नक्सली

पश्चिम बंगाल के दार्जलिंग जिले के नक्सलबाड़ी में हिंसक किसान आंदोलन आगे चलकर देश का सबसे आंतरिक विद्रोह नक्सलवाद बन गया। जानिए कानू सान्याल और चारू मजूमदार क्या चाहते थे?

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नक्सलियों से मुठभेड़ (photo AI Genrated photo)

बीसवीं शताब्दी में वामपंथी विचारधारा दुनिया भर में फैल रही थी। भारत में साल 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हो चुका था। 1964 में CPI दो धड़ों में बट गईं थी, लेकिन 1964 में सीपीआई के विभाजन के बाद सीपीआई(एम) बनी, लेकिन उसमें भी असंतोष था। चारू मजूमदार और कानू सान्याल जैसे CPM नेता चीन के माओ त्से-तुंग की विचारधारा से प्रभावित थे। उन्होंने चीन की क्रांति को मॉडल मानते हुए भारत में 'लंबे समय तक चलने वाले जनयुद्ध' की बात की।

किसानों की हालत बद से बदतर

1960 के दशक में भारत में भूमि सुधारों की विफलता और जमींदारी प्रथा के चलते सीमांत किसानों की हालत बद से बदतर हो चुकी थी। पश्चिम बंगाल में अधियार किसान जमींदारों की शोषण व्यवस्था से त्रस्त थे। वे जमीन पर बुआई करते, कटाई करते, देखभाल करते। साथ ही, फसल लगाने का खर्च भी खुद वहन करते, लेकिन उन्हें उपज का सिर्फ आधा हिस्सा मिला। जमीन पर उनका कोई मालिकाना हक नहीं था। इधर, सीपीएम भी चुनावी राजनीति में उलझ गई, जबकि कानू और चारू जैसे कार्यकर्ता सशस्त्र संघर्ष चाहते थे।

3 मार्च 1967 को सशस्त्र क्रांति की शुरुआत

3 मार्च 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव में किसानों ने जमींदारों की जमीन हथिया ली थी। उनके अनाज से भरे गोदाम लूट लिए थे। सीपीआई (माले) नेता कानू सान्याल और चारू मजूमदार के नेतृत्व में किसान समितियों के लोगों ने घटना को अंजाम दिया था। इस कांड में चाय बागान मजदूरों और आदिवासी किसान शामिल थे। उन्होंने माओ के नारे 'सत्ता बंदूक की नली से निकलती है' लगाते हुए हमले किए।

25 मई 1967 को पुलिस ने किसानों की भीड़ पर चलाई गोली

इस घटना के बाद जमींदारों ने सरकार व शासन पर दवाब बनाया। 25 मई 1967 को दार्जलिंग जिले मुख्यालय सिलिगुड़ी के पास नक्सलबाड़ी के बेंगाई जोत गांव में पुलिस ने किसानों की भीड़ पर गोली चलाई। इसमें 11 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे। शासन की कार्रवाई के बाद दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी और आसपास के इलाकों में फैल गया। हजारों किसानों ने जमीन कब्जाई, जमींदारों को मारकर या भागाकर उनकी संपत्ति जब्त की। आगे चलकर नक्सलबाड़ी का यह सशस्त्र किसान आंदोलन देश का सबसे बड़ा आतंरिक विद्रोह 'नक्सलवाद' बन गया। जो एक समय देश के 200 से अधिक जिलों में फैल हुआ था और रेड कोरिडर बन गया। जिसे खत्म करने की केंद्र की मोदी सरकार ने डेडलाइन मार्च 2026 रखी है।

ऑपरेशन स्टेपलचेज की शुरूआत, कोलकाता में गरजी बंदूकें

नक्सलबाड़ी के हिंसक आंदोलन की चपेट में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता भी आ गई। 1970 में कोलकाता में रोजाना 4-5 हत्याएं होने लगीं, शहर 'बम फैक्ट्री' बन गया और अराजकता चरम पर पहुंच गई। नक्सलियों ने 'वर्ग शत्रुओं का सफाया' नीति अपनाई और पुलिस, जमींदार, व्यापारी पर हमले किए। हिंसा इतनी बढ़ गई थी कि केंद्र की तत्कालीन इंंदिरा गांधी की सरकार को इसमें दखल देना पड़ा।

संयुक्त कार्रवाई में मारे गए कई नक्सली

साल 1971 में केंद्र सरकार ने सेना, CRPF और राज्य पुलिस की संयुक्त कार्रवाई शुरू की। यह कार्रवाई करीब 45 दिनों तक चली। सुरक्षा कर्मी की बंदूकों की गोली से कई उग्र वामपंथी समर्थक कार्यकर्ता मारे गए। सिद्धार्थ शंकर रे जो इंदिरा गांधी के करीबी थे। उन्होंने ऑपरेशन स्टेपल चेज को तेज किया। साल 1972 में पुलिस ने वामपंथी नेता चारू मजूमदार को गिरफ्तार किया। जिनकी मौत पुलिस हिरासत में हो गई। वहीं, चारू मजूमदार के अन्य सहयोगी सालों तक जेल में बंद रहे। कानू सान्याल की मौत भी 23 मार्च 2010 को हो गई। उन्होंने नक्सलबाड़ी में आत्महत्या कर ली।