
ट्रेन में इमरजेंसी कोटे से मिलती है बर्थ। (फोटो: AI)
Indian Railways: भारतीय रेलवे में सफर करने वाले करोड़ों यात्रियों की सबसे बड़ी मुसीबत 'वेटिंग लिस्ट' (Train Ticket Booking) है। त्योहारों या छुट्टियों में कन्फर्म टिकट मिलना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता। कई बार तत्काल (Tatkal) में भी टिकट नहीं मिल पाता। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि रेलवे में एक 'इमरजेंसी कोटा' (Emergency Quota Rules) भी होता है? अगर आपको बहुत जरूरी काम से जाना है, तो यह कोटा आपके लिए मददगार साबित हो सकता है। आइए जानते हैं कि यह कैसे काम करता है (Indian Railways EQ) और किसे इसका फायदा मिलता है।
रेल मंत्रालय के अनुसार, इमरजेंसी कोटा मुख्य रूप से उन वीआईपी यात्रियों के लिए बनाया गया है, जिन्हें तत्काल यात्रा करनी पड़ती है। तकनीकी भाषा में इन्हें 'हाई ऑफिशियल रिक्विजिशन' (HOR) होल्डर्स कहा जाता है। इसमें केंद्र सरकार के मंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज और सांसद शामिल हैं। रेलवे का नियम कहता है कि जब भी ट्रेन में सीटें अलॉट की जाती हैं, तो सबसे पहले प्राथमिकता इन्हीं उच्च पदस्थ अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को दी जाती है।
जी हां, बिल्कुल। यह कोटा सिर्फ नेताओं के लिए ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों की 'इमरजेंसी' के लिए भी है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक बयान में साफ तौर पर कहा था कि वीआईपी लिस्ट क्लियर होने के बाद जो सीटें बचती हैं, उन्हें आम यात्रियों की जरूरत के हिसाब से जारी किया जाता है। अगर आप इन स्थितियों में यात्रा कर रहे हैं, तो आपको प्राथमिकता मिल सकती है:
गंभीर बीमारी (Sickness): इलाज के लिए जाने वाले मरीज।
शोक (Bereavement): परिवार में किसी की मृत्यु होने पर।
नौकरी का इंटरव्यू (Job Interview): कॉल लेटर होने पर।
सरकारी ड्यूटी: अगर कोई अधिकारी सरकारी काम से जा रहा हो।
इमरजेंसी कोटे के तहत सीट पाने की प्रक्रिया ऑटोमेटिक नहीं है। इसके लिए आपको थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है। रेलवे के जोनल (Zonal) या डिविजनल (Divisional) हेडक्वार्टर में 'इमरजेंसी कोटा सेल' बने होते हैं। कुछ बड़े स्टेशनों पर भी यह सुविधा होती है। सीट कन्फर्म कराने के लिए आपको एक लिखित आवेदन (Written Request) देना होता है। रेलवे बोर्ड ने भ्रष्टाचार और दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं कि बिना लिखित अर्जी के किसी को भी यह कोटा नहीं दिया जाएगा। आपकी अर्जी और यात्रा के कारण की गंभीरता को देखने के बाद ही अधिकारी सीट रिलीज करते हैं।
सीटों का आवंटन 'वारंट ऑफ प्रेसिडेंस' (Warrant of Precedence) और वरिष्ठता के आधार पर होता है। यानी सबसे पहले लिस्ट में ऊपर आने वाले वीआईपी को सीट मिलेगी। उसके बाद सांसदों की रिक्वेस्ट देखी जाएगी और अंत में बची हुई सीटों पर आम नागरिकों की अर्जेंसी (बीमारी, इंटरव्यू आदि) को देखते हुए फैसला लिया जाएगा।
सोशल मीडिया पर अक्सर यात्री इस कोटे की पारदर्शिता (Transparency) को लेकर सवाल उठाते रहते हैं। कई यात्रियों का कहना है कि "इमरजेंसी कोटा अक्सर 'सिफारिश कोटा' बन जाता है, जहां आम आदमी की अर्जेंसी से ज्यादा नेताओं की पहचान काम आती है।" हालांकि, रेलवे का दावा है कि वे सख्त नियमों का पालन करते हैं, लेकिन यात्री मांग करते हैं कि इस प्रक्रिया को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि वाकई जरूरतमंद को सीट मिल सके।
यात्रियों की सुविधा के लिए अगर 'इमरजेंसी कोटा' के लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा शुरू की जाए, तो स्टेशन के चक्कर काटने की झंझट खत्म हो सकती है। फिलहाल, रेलवे प्रशासन कोटे के दुरुपयोग को रोकने के लिए समय-समय पर मॉनिटरिंग करता है।
विशेषज्ञों की राय है कि यात्रियों को केवल इमरजेंसी कोटे के भरोसे नहीं रहना चाहिए। चूंकि इसमें सीटें बहुत सीमित होती हैं और वीआईपी मूवमेंट पर निर्भर करती हैं, इसलिए रिजेक्शन का चांस ज्यादा होता है। अगर यात्रा बहुत जरूरी है, तो 'प्रीमियम तत्काल' या अन्य विकल्पों को भी बैकअप के तौर पर रखना समझदारी है। इमरजेंसी कोटा अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।
Published on:
07 Feb 2026 02:47 pm
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