
तारिक रहमान के शपथग्रहण में मोदी के बजाय बिरला जाएंगे ढाका। (सांकेतिक फोटो: AI)
Swearing-in ceremony : भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में आई हालिया तल्खी के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है-आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पड़ोसी मुल्क में आयोज्य तारिक रहमान के प्रधानमंत्री पद शपथग्रहण समारोह (Tariq Rahman oath ceremony) में शिरकत करने के लिए इस देश के दौरे पर क्यों नहीं जा रहे हैं (PM Modi Dhaka visit cancelled) और भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla Bangladesh visit)क्यों करेंगे? ढाका के 'द डेली स्टार' और भारत के प्रमुख समाचार पत्रों की रिपोर्ट्स का विश्लेषण करने पर इसके पीछे कई कूटनीतिक और राजनीतिक कारण नजर आते हैं। प्रत्यक्ष तो यह बात सामने आती है कि बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद बनी मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार का रवैया भारत के प्रति सहज नहीं रहा है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और कट्टरपंथी गुट भारत में शरण ले कर रह रहीं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण (Sheikh Hasina extradition)की मांग कर रहे हैं। वहां की अदालतों में हसीना के खिलाफ हत्या के मुकदमे चल रहे हैं और वहां की अदालत से उन्हें 'फांसी' देने का तक का फैसला आ चुका है। बांग्लादेशियों की भारत में घुसपैठ का मामला भी दोनों देशों के बीच तनाव का कारण है। ऐसे माहौल में पीएम मोदी का जाना कूटनीतिक रूप से संभव नहीं था। ध्यान रहे कि तारिक रहमान 17 फरवरी को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथग्रहण करेंगे और वे शेख हसीना के बारे में भारत से लाने के बारे में अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं।
बांग्लादेशी मीडिया रिपोर्ट्स (जैसे 'प्रथम आलो') और भारतीय खुफिया इनपुट्स के मुताबिक, वहां हिंदुओं पर हमले और मंदिरों में तोड़फोड़ की घटनाएं बढ़ी हैं। भारत में इसका तीखा विरोध है। यदि पीएम मोदी ऐसे समय में ढाका जाते, तो घरेलू राजनीति में विपक्ष और समर्थक, दोनों ओर से सवाल उठते।
बांग्लादेश का एक तबका ऐसा है जो भारत से नफरत करता है। ढाका की सड़कों पर भारत विरोधी भावनाएं उफान पर हैं। सुरक्षा कारणों से भी पीएम का दौरा जोखिम भरा हो सकता था।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का चयन भारत की एक सधी हुई चाल है, जिसे भाजपा का 'ट्रंप कार्ड' कहा जा सकता है।
ओम बिरला कार्यपालिका (सरकार) के प्रमुख नहीं, बल्कि विधायिका (संसद) के प्रमुख हैं। उनके जाने से यह संदेश जाएगा कि भारत अपने पड़ोसी से रिश्ते तोड़ना नहीं चाहता, लेकिन पीएम स्तर की यात्रा के लिए अभी माहौल अनुकूल नहीं है। घरेलू राजनीति के लिहाज से देखें तो लोकसभा में विपक्ष के साथ चल रहे गतिरोध के बीच, बिरला को एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर भेज कर सरकार उनकी स्वीकार्यता और कद को बढ़ाना चाहती है। यह भाजपा, विशेषकर मोदी की 'सेफ डिप्लोमेसी' है।
विपक्ष का आरोप है कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी को नरवणे आदि चर्चित मुद्दों पर संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है।
विपक्ष के नजरिये के लिहाज से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का मुख्य कारण सदन में उनके कथित 'पक्षपातपूर्ण रवैये' और विपक्षी सांसदों की आवाज़ को अनसुना करना है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि अध्यक्ष सदन के संरक्षक (कस्टोडियन) होने के बजाय सत्ता पक्ष के बचाव में काम कर रहे हैं, जिसमें विपक्षी नेताओं के माइक बंद करना, मनमाने ढंग से सांसदों को निलंबित करना और सरकार से जुड़े अहम मुद्दों पर बहस की अनुमति न देना शामिल है। यह कदम हालिया संसद सत्र में हुए भारी हंगामे और गतिरोध के बाद उठाया गया, जब 'इंडिया' गठबंधन ने महसूस किया कि उन्हें सदन में बोलने का पर्याप्त मौका नहीं मिल रहा है; इसलिए अपनी नाराजगी दर्ज कराने और सरकार पर नैतिक व राजनीतिक दबाव बनाने के उद्देश्य से उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत स्पीकर को हटाने के लिए नोटिस देने का फैसला किया, भले ही उनके पास इसे पारित कराने के लिए जरूरी संख्या बल मौजूद नहीं है। संंसद में उनके मौजूद न रहने के हालात के चलते भाजपा ने यह कार्ड खेला है कि आयोजन के बहाने उन्हें बांग्लादेश दौरे पर भेज दिया जाए। क्यों कि बिरला कह चुके हैं कि अविश्वास प्रस्ताव मामला सुलझने तक वे संसद में नहीं जाएंगे।
दोनों देशों के बीच रिश्तों का यह उतार-चढ़ाव नया नहीं है। इतिहास गवाह है कि सत्ता परिवर्तन के साथ ढाका का दिल्ली के प्रति रुख बदलता रहा है।
इंदिरा गांधी और मुजीबुर्रहमान (1971-75): यह रिश्तों का स्वर्णकाल था। इंदिरा गांधी के सहयोग से बांग्लादेश बना और मुजीब के साथ भावनात्मक रिश्ते रहे।
जनरल इरशाद (1982-90): सैन्य शासन के दौरान रिश्ते ठंडे बस्ते में चले गए। भारत ने 'वेट एंड वॉच' की नीति अपनाई।
खालिदा जिया (1991-96, 2001-06): बीएनपी के शासन में भारत विरोधी गतिविधियां बढ़ीं। पूर्वोत्तर के उग्रवादियों को पनाह मिलने और आईएसआई के प्रभाव के आरोप लगे। रिश्ते सबसे निचले स्तर पर थे।
शेख हसीना (1996-2001, 2009-2024): हसीना के दौर में कनेक्टिविटी, सीमा विवाद और सुरक्षा पर ऐतिहासिक काम हुआ। इसे 'गोल्डन चैप्टर 2.0' कहा गया।
मुहम्मद यूनुस और तारिक रहमान (वर्तमान): नोबेल विजेता यूनुस ने देश में अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में कार्यभार संभालते ही भारत की आलोचना की। वहीं, बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान (जो खालिदा जिया के बेटे हैं) का इतिहास भारत विरोधी रहा है, हालांकि वे अब कूटनीतिक भाषा बोल रहे हैं। इधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को फोन कर जीत की बधाई दी और देश में लोकतंत्र की मजबूती की उम्मीद की।
बहरहाल ओम बिरला को बांग्लादेश भेजने के फैसले से एक तरह से एक तीर से तीन निशाने लगाए गए हैं। विपक्ष के 'अविश्वास 'के बावजूद पीएम मोदी और भाजपा का यह 'विश्वास' भारी पड़ रहा है। इस तरह बिरला का मनोबल टूटने से बचाने के लिए डैमेज कंट्रोल भी कर लिया गया है। ओम बिरला का दौरा यह संकेत है कि भारत बांग्लादेश की जनता (People-to-People contact) से जुड़ाव रखना चाहता है, लेकिन अंतरिम सरकार की नीतियों से खुश नहीं है। यह मोदी सरकार का एक कूटनीतिक 'पॉज' है, ताकि भविष्य की दिशा तय की जा सके।
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Updated on:
15 Feb 2026 06:52 pm
Published on:
15 Feb 2026 06:51 pm
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