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Explainer: नरवणे पहले नहीं हैं ! एडमिरल विष्णु भागवत से लेकर ब्रिगेडियर सुरेंद्र सिंह तक… जब फौज ने सरकार से पूछा- ‘क्यों’

Civil-Military Relations: पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे के 'अग्निपथ' खुलासे ने मचाई खलबली। जानिए इतिहास के वो 3 बड़े मौके जब फौज ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाए।

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भारत

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MI Zahir

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Feb 03, 2026

Agnipath Controversy

एम.एम. नरवणे, एडमिरल विष्णु भागवत व ब्रिगेडियर सुरेंद्रसिंह। (फोटो : AI)

Military Memoirs: भारतीय फौज ने हर दौर में बहादुरी का परिचय दिया है। भारत में सरकार और फौज में हमेशा से तालमेल रहा है, लेकिन कभी-कभी विचित्र स्थिति हो जाती है। भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे (Gen MM Naravane) के संस्मरणों ने दिल्ली के सियासी और रक्षा गलियारों में खलबली मचा दी है। उनकी किताब में 'अग्निपथ योजना' को लेकर किए गए दावों ने एक बार फिर सिविल-मिलिट्री रिश्तों (Civil-Military Relations) पर बहस छेड़ दी है। लेकिन, भारतीय रक्षा इतिहास में यह पहला मौका नहीं है जब किसी शीर्ष सैन्य अधिकारी ने सरकार के फैसलों पर सवाल उठाए हों या अपनी असहमति जताई हो। नरवणे से पहले भी पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल विष्णु भागवत और कारगिल युद्ध के दौरान ब्रिगेडियर सुरेंद्र सिंह के प्रकरण इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं।

जनरल एम.एम. नरवणे 'अग्निपथ' और 'बोल्ट फ्रॉम द ब्लू' : क्या कहा

जनरल नरवणे ने अपनी आगामी किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' (Four Stars of Destiny) के अंशों में कथित तौर पर लिखा है कि अग्निपथ योजना सेना के लिए "नीले आसमान से गिरी बिजली" (Bolt from the blue) की तरह थी। किताब के लीक हुए अंशों में उन्होंने देश की सबसे बड़ी सैन्य भर्ती योजना 'अग्निपथ' (Agnipath Scheme) और चीन के साथ हुए तनाव पर ऐसे खुलासे किए हैं, जिन्होंने रक्षा मंत्रालय से लेकर संसद तक खलबली मचा दी है। सबसे बड़ा दावा अग्निपथ योजना की लॉन्चिंग को लेकर है, जिसे उन्होंने तीनों सेनाओं के लिए एक "झटका" बताया है।

20 हजार सैलरी पर अड़ गए थे जनरल

इस किताब में एक और बड़ा खुलासा अग्निवीरों की सैलरी को लेकर है। नरवणे लिखते हैं कि शुरुआत में अग्निवीरों के लिए पहले साल की सैलरी मात्र 20,000 रुपये (सब कुछ मिलाकर) तय की गई थी। इस पर उन्होंने सख्त आपत्ति जताई थी। उन्होंने लिखा, "यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं था। हम एक प्रशिक्षित सैनिक की बात कर रहे हैं, जिसकी तुलना दिहाड़ी मजदूर से नहीं की जा सकती।" उनके विरोध के बाद ही सैलरी बढ़ाई गई।

वो रात जब राजनाथ बोले- 'जो उचित समझो, वो करो' किताब का दूसरा सबसे विस्फोटक हिस्सा 31 अगस्त 2020 की रात का है, जब पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला (Rechin La) के पास चीनी पीएलए के टैंक भारतीय चौकियों की तरफ बढ़ रहे थे। स्थिति बेहद तनावपूर्ण थी.

  • नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को फोन कर पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिए।
  • रात करीब 10:30 बजे राजनाथ सिंह ने उनसे कहा: "जो उचित समझो, वो करो" (Do whatever you deem appropriate).
  • नरवणे इसे "हॉट पोटैटो" (गर्म आलू/मुश्किल जिम्मेदारी) बताते हैं। उनके पास कार्रवाई की खुली छूट (Carte Blanche) थी, लेकिन जिम्मेदारी भी पूरी तरह उन्हीं के कंधों पर थी.

तथ्य और कारण: उनका दावा है कि सेना शुरू में सैनिकों के लिए 'टूर ऑफ ड्यूटी' (Tour of Duty) का एक छोटा मॉडल चाहती थी, लेकिन सरकार ने इसे पूरे सशस्त्र बलों के लिए लागू कर दिया। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पहले साल 25% अग्निवीरों को रिटेन करने की बात नहीं थी, यह बाद में जोड़ा गया।

कब: यह मामला दिसंबर 2023 और जनवरी 2024 में तब सामने आया जब उनकी किताब के अंश मीडिया में लीक हुए। फिलहाल किताब की समीक्षा चल रही है।

(सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जनरल नरवणे के पुराने इंटरव्यू और किताब से जुड़े वीडियो क्लिप्स लगातार वायरल हो रहे हैं, जिसमें वे सेना में सुधारों की बात कर रहे हैं।)

किताब का स्टेटस: क्यों अटका है प्रकाशन ?

यह किताब पेंगुइन रैंडम हाउस (Penguin Random House) द्वारा प्रकाशित की जानी है. इसे जनवरी 2024 में रिलीज होना था, लेकिन रक्षा मंत्रालय (MoD) और सेना मुख्यालय फिलहाल इसकी समीक्षा (Review) कर रहे हैं. संवेदनशील सैन्य जानकारियों और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर इसे अभी तक ​क्लीन चिट नहीं मिली है, जिसके कारण इसकी रिलीज अनिश्चितकाल के लिए टल गई है

एडमिरल विष्णु भागवत: जब पहली बार बर्खास्त हुए कोई चीफ

क्या हुआ था: यह भारतीय सैन्य इतिहास का सबसे बड़ा भूचाल था। 30 दिसंबर 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने तत्कालीन नौसेनाध्यक्ष एडमिरल विष्णु भागवत को पद से बर्खास्त कर दिया था।

क्यों और तथ्य: विवाद की जड़ तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस (George Fernandes) और एडमिरल भागवत के बीच का टकराव था। भागवत ने वाइस एडमिरल हरिंदर सिंह को डिप्टी चीफ बनाने के सरकार के फैसले का विरोध किया था। भागवत का तर्क था कि हरिंदर सिंह का रिकॉर्ड दागदार है और वे सांप्रदायिक आधार पर समर्थन मांग रहे थे।

नतीजा: सरकार ने इसे "आदेश की अवमानना" माना और भागवत को हटा दिया। भागवत ने बाद में आरोप लगाया कि हथियारों की लॉबी (Arms Lobby) रक्षा मंत्रालय के फैसलों को प्रभावित कर रही थी।

ब्रिगेडियर सुरेंद्र सिंह: कारगिल और वो 'चेतावनी' वाली चिट्ठियां

क्या था विवाद: सन 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान ब्रिगेडियर सुरेंद्र सिंह 121 इन्फैंट्री ब्रिगेड (121 Infantry Brigade) के कमांडर थे, जिनके जिम्मे द्रास (Dras) और करगिल सेक्टर की सुरक्षा थी।

क्या कहा: युद्ध के बाद सुरेंद्र सिंह ने दावा किया कि उन्होंने पाकिस्तानी घुसपैठ को लेकर युद्ध शुरू होने से बहुत पहले ही वरिष्ठ अधिकारियों और तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वी.पी. मलिक को चेतावनी दी थी, लेकिन उनकी खुफिया रिपोर्टों को नजरअंदाज कर दिया गया।

मुद्दा बरसों तक सुर्खियों में रहा

तथ्य: सरकार और सेना मुख्यालय ने उन पर ही लापरवाही बरतने का आरोप लगा दिया। उन्हें कमांड से हटा दिया गया और बाद में कोर्ट-मार्शल का सामना करना पड़ा। सुरेंद्र सिंह ने अंत तक यह कहा कि उन्हें "बलि का बकरा" (Scapegoat) बनाया गया, ताकि बड़े अधिकारियों की नाकामी छिपाई जा सके। जॉर्ज फर्नांडीस ने उस समय सरकार का बचाव किया था, लेकिन यह मुद्दा बरसों तक सुर्खियों में रहा।

खरगे और राहुल गांधी ने मुददा उठाया

विपक्ष का हमला: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सांसद राहुल गांधी ने जनरल नरवणे के खुलासों को आधार बना कर मोदी सरकार पर हमला बोला है। उनका कहना है कि सरकार ने सैनिकों की राय लिए बिना अग्निपथ योजना थोपी।

रक्षा विशेषज्ञ: पूर्व सैन्य अधिकारियों का एक वर्ग कह रहा है कि "ऑपरेशनल मामलों में सरकार का हस्तक्षेप बढ़ा है", जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि "नीति बनाना सरकार का काम है और सेना को उसे लागू करना होता है।"

भाजपा/सरकार: सरकार ने अभी तक नरवणे की किताब पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह "निजी राय" हो सकती है, जो जरूरी नहीं कि पूरे सच को बयां करे।

अब इन बिंदुओं पर नजर रहेगी

किताब की रिलीज: क्या रक्षा मंत्रालय की समीक्षा के बाद नरवणे की किताब से विवादित अंश हटाए जाएंगे?

संसदीय समिति: क्या विपक्ष संसद के आगामी सत्र में अग्निपथ योजना की समीक्षा के लिए जेपीसी (JPC) की मांग करेगा?

पूर्व जनरलों की राय: क्या अन्य पूर्व सेनाध्यक्ष भी नरवणे के समर्थन में खुलकर सामने आएंगे ?

फौजी जुबान और 'कोड ऑफ कंडक्ट' यह पूरा विवाद एक बड़े नैतिक प्रश्न को जन्म देता है।

एक सैनिक को कब बोलना चाहिए?

सेना का अनुशासन कहता है कि सेवारत रहते हुए आप सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं कर सकते। लेकिन रिटायरमेंट के बाद कई जनरलों ने (जैसे जनरल के.एस. थिमैया का नेहरू से विवाद) अपनी बात रखी है।बहरहाल नरवणे का मामला इसलिए पेचीदा है क्योंकि अग्निपथ योजना अभी लागू है और देश की सुरक्षा नीति का हिस्सा है। ऐसे में उनके खुलासे योजना की स्वीकार्यता पर सवाल खड़े कर सकते हैं।

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