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8th Pay Commission: क्या सिर्फ कागजों में होगी बढ़ोतरी और आय रहेगी कम? जानें वास्तविक सैलरी का सच

8th Pay Commission Update: 8वां वेतन आयोग कर्मचारियों के लिए राहत भी है और एक रियलिटी चेक भी। सैलरी बढ़ेगी, लेकिन यह बढ़ोतरी सरकारी क्षमता, टैक्स नियमों और भत्तों के नए ढांचे के साथ आएगी। इस बार असली सवाल यह नहीं है कि कितना बढ़ेगा, बल्कि यह है कि आखिर जेब में कितना बचेगा।

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भारत

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Himadri Joshi

Feb 07, 2026

8th Pay Commission

8वां वेतन आयोग (फोटो- एआई जनरेटेड)

8th Pay Commission News

केंद्रीय कर्मचारियों के बीच 8वें वेतन आयोग को लेकर उत्सुकता भी है और चिंता भी। यह लगभग तय माना जा रहा है कि सैलरी में बढ़ोतरी होगी, लेकिन यह बढ़ोतरी कब लागू होगी, कितनी होगी और किन शर्तों के साथ आएगी, इसे लेकर स्थिति अभी साफ नहीं है। इकोनॉमिक्स के नजरिये से देखें तो बड़ा सवाल सिर्फ वेतन बढ़ने का नहीं, बल्कि यह है कि सरकार कितना वित्तीय बोझ उठा पाएगी और कर्मचारियों को वास्तविक यानी नेट फायदा कितना मिलेगा।

सिर्फ सैलरी नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था पर असर

हर वेतन आयोग केवल वेतन बढ़ाने का फैसला नहीं होता। इसका सीधा असर कर्मचारियों की खरीद क्षमता, सरकार की राजकोषीय स्थिति और देश की डिमांड-साइड ग्रोथ पर पड़ता है। पिछले अनुभव बताते हैं कि नए वेतन आयोग के लागू होते ही शहरी खपत बढ़ती है। रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर को इससे सहारा मिलता है। दूसरी ओर, सरकार पर लाखों करोड़ रुपये का स्थायी खर्च भी जुड़ जाता है।

इकोनॉमिस्ट क्यों जता रहे हैं चिंता

वरिष्ठ अर्थशास्त्री नीलकंठ मिश्रा जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि 8वें वेतन आयोग का असर सिर्फ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा। उनके आकलन के अनुसार, नया वेतन ढांचा लागू होने के बाद सरकार पर करीब 8 से 9 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त दीर्घकालिक बोझ बन सकता है। इसमें सैलरी, पेंशन और उससे जुड़े भत्ते शामिल होंगे। यही वजह है कि इस बार सरकार खुली छूट देने के बजाय संतुलित और नियंत्रित बढ़ोतरी की राह अपना सकती है।

वेतन आयोग का वित्तीय गणित

अनुमानों के मुताबिक, 8वें वेतन आयोग से सरकार पर 8-9 लाख करोड़ रुपये का लॉन्ग-टर्म बोझ पड़ेगा। इसका असर केवल सैलरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पेंशन, डीए और अन्य भत्तों पर भी पड़ेगा। एक बार लागू हुआ वेतन ढांचा आमतौर पर करीब 10 साल तक चलता है, इसलिए सरकार हर पहलू को सावधानी से तौल रही है।

सैलरी बढ़ेगी या सिर्फ स्ट्रक्चर बदलेगा

यह सबसे संवेदनशील सवाल है। संभावनाएं दो तरह की मानी जा रही हैं। पहली, बेसिक सैलरी में बढ़ोतरी हो सकती है। दूसरी, भत्तों का रेशनलाइजेशन किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि कुल सैलरी तो बढ़े, लेकिन कुछ अलाउंस सीमित कर दिए जाएं या डीए मर्जर का तरीका बदला जाए। ऐसे में कागज पर दिखने वाली बढ़ोतरी और जेब में आने वाली रकम अलग-अलग हो सकती है।

पेंशनर्स के लिए राहत या नई चिंता

पेंशनर्स हर वेतन आयोग का अहम हिस्सा होते हैं, क्योंकि उनकी पेंशन लास्ट ड्रॉन बेसिक से जुड़ी होती है। फिटमेंट फैक्टर बढ़ने से पेंशन में भी इजाफा होता है। हालांकि इस बार सरकार पेंशन बोझ को लेकर ज्यादा सतर्क नजर आ रही है। संभव है कि यूनिफॉर्म फिटमेंट फैक्टर लागू किया जाए या कुछ श्रेणियों में चरणबद्ध लाभ दिया जाए। यानी पेंशन बढ़ेगी, लेकिन उम्मीदों के मुताबिक तेज नहीं।

टैक्स के बाद असली फायदा कितना

अगर सैलरी बढ़ती है तो टैक्स स्लैब में ऊपर जाने की संभावना भी बढ़ेगी। साथ ही एचआरए, टीए जैसे अलाउंस के स्ट्रक्चर में बदलाव हो सकता है। इसका असर यह होगा कि नेट इन-हैंड सैलरी की बढ़ोतरी उतनी बड़ी महसूस न हो। इसलिए अर्थशास्त्री ग्रॉस सैलरी की बजाय नेट सैलरी पर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं।

क्यों हर किसी के लिए अहम है यह खबर

8वां वेतन आयोग सिर्फ सरकारी कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। यह करोड़ों परिवारों की खपत क्षमता तय करेगा, सरकार के फिस्कल डेफिसिट पर असर डालेगा और महंगाई व ब्याज दरों के ट्रेंड को भी प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि इसे पूरी अर्थव्यवस्था का बड़ा इवेंट माना जा रहा है।

आगे क्या करना चाहिए कर्मचारियों को

विशेषज्ञों की सलाह है कि कर्मचारी अफवाहों से बचें और डेटा आधारित संकेतों पर भरोसा करें। अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर के सिनारियो बनाकर तैयारी रखें, टैक्स प्लानिंग पहले से सोचें और केवल “मैक्सिमम हाइक” की उम्मीद में बड़े फैसले न लें।