14 फ़रवरी 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Battle of Rezang La: पेट में गोली लगी तो पगड़ी से आंतें बांधीं! आखिरी दम तक लड़ते रहे, 4000 सैनिकों पर भारी पड़े थे 120 बहादुर

यह कहानी है 120 बहादुर भारतीय जवानों की, जिन्होंने साल 1962 में भारत-चीन जंग में रेजांग ला में 4000 सैनिकों पर भारी पड़े थे। इस युद्ध के नायक थे मेजर शैतान सिंह...

2 min read
Google source verification
major shaitan

मेजर शैतान सिंह (फोटो-X)

साल 1949 में चीन में माओत्सेतुंग के नेतृत्व में हुई क्रांति के बाद कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व कायम हो गया। इधर, भारत को भी 1947 में आजादी मिल चुकी थी। माओत्सेतुंग के समय से ही चीन विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाता गया। उसने साल 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। 1954 में भारत और चीन के बीच पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर भी हुए, लेकिन तिब्बत पर चीन के कब्जे और दलाई लामा को भारत में शरण मिलने (1959) से रिश्ते बिगड़ने लगे। 1962 में तनाव चरम पर पहुंच गया।

120 जवानों ने हजारों चीनी सैनिकों का किया मुकाबला

आखिरकार, 20 अक्टूबर 1962 को दोनों देशों की बीच जंग छिड़ गई। इस युद्ध की सबसे प्रसिद्ध लड़ाइयों में से एक है, रेजांग ला की लड़ाई, जो 18 नवंबर 1962 को लद्दाख के चुशूल सेक्टर में लड़ी गई। यहां भारतीय सेना की 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के महज 120 जवानों ने 4000 हजार चीनी सैनिकों का मुकाबला किया। भारतीय सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व मेज शैतान सिंह कर रहे थे।

रणनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण है रेजांग ला

रेजांग ला दर्रा लद्दाख में करीब 5500 मीटर की ऊंचाई पर है। यह इलाका चुशूल घाटी की रक्षा करता है। इसलिए रणनीतिक लिहाज से यह बेहद महत्वपूर्ण था। चुशूल में एक हवाईपट्टी भी थी। जोकि लेह तक सैनिकों को रसद पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण सप्लाई लाइन थी।

मेजर शैतान सिंह के पास थी रेजांग ला की कमान

मेजर शैतान को रेजांग ला पोस्ट की जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके साथ 120 जवान थे। जिनके पास .303 राइफलें, लाइट मशीन गन और 3-इंच मोर्टार जैसे हल्के और पुराने हथियार थे। उन्हें कोई आर्टिलरी सपोर्ट भी नहीं था। जबकि, दूसरी तरफ PLA यानी चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी के पास आधुनिक हथियार थे। साथ ही, वह उनकी तादाद भी काफी थी।

वेब की तरह हमला बोल रहे थे चीनी सैनिक

18 नवंबर 1962 की सुबह लगभग 3.30 बजे जब रेजांग ला में तापमान -25 से -40 डिग्री सेल्सियस के बीच था, उसी समय चीनी सैनिकों ने भारतीय चौकी पर हमला बोल दिया। पहले हमले में लगभग 350 चीनी सैनिक आए, दूसरे में 400। इसके साथ ही, चीनी सैनिकों ने भारतीय पोस्ट पर भारी आर्टिलरी, मोर्टार, रॉकेट लॉन्चर दागे। अंत में लड़ाई हाथों-हाथों तक पहुंच गई। गोला-बारूद खत्म होने पर भारतीय जवान बेनेट, चाकू और पत्थरों से चीनी सैनिकों को कूच-कूचकर मौत के घाट उतार दिए।

अंतिम सांस तक लड़ते रहे 120 बहादुर

युद्ध के दौरान भारतीय सेना को कमांड कर रहे मेजर शैतान सिंह बुरी तरह से घायल हो गए। उन्होंने अपने जवानों से लालकारते हुए 'एक इंच भी पीछे नहीं हटना' कहा! उन्होंने पेट में गोली लगने पर पगड़ी से आतें बांधीं और लाइट मशीन गन चलाते हुए कई दुश्मनों को ढेर कर दिया। उनके नेतृत्व में जवान 114 शहीद हुए लेकिन चुशूल एयरफील्ड बच गया। जनवरी 1963 में जब सर्च पार्टी पहुंची, तो उनकी लाश मिली – हथियार थामे हुए, जैसे अभी भी लड़ रहे हों। रेजांग ला में 1963 में मेमोरियल बनाया गया, जहां लिखा है: "जब तक हमारी यादें हैं, तब तक हम जीवित हैं। वहीं, मैजर शैतान सिंह को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।