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नागौर, Jun 01, 2026

ईरान टू थार: 35 साल बाद देश को मिला नया सांप, प्रदेश में रेंग रही नई प्रजाति ‘सिसतान सैंड बोआ’

राजस्थान के मरुस्थल की एक और बड़ी देन सामने आई है। भारत में सिसतान सैंड बोआ (एरिक्स सिसतानेंसिस) नामक सर्प प्रजाति की पहली उपस्थिति राजस्थान में दर्ज की गई है। प्रदेश के बीकानेर, चूरू और सीकर क्षेत्र में इसे देखा गया है। यानी 35 साल बाद थार की रेत ने देश को एक नया सांप दिया है।

जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिज़र्व (बीकानेर जिला) में सिसतान सैंड बोआ (एरिक्स सिसतानेंसिस) नामक सर्प

जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिज़र्व (बीकानेर जिला) में सिसतान सैंड बोआ (एरिक्स सिसतानेंसिस) नामक सर्प

दिनेश कुमार स्वामी@ नागौर. वैज्ञानिकों ने भारत में सिसतान सैंड बोआ (एरिक्स सिसतानेंसिस) नामक सर्प प्रजाति की पहली उपस्थिति दर्ज की गई है। प्रदेश के बीकानेर, चूरू और सीकर क्षेत्र में यह सांप देखा गया है। इससे पहले 1991 में व्हिटेकर बोआ को भारत की सूची में जोड़ा गया था, यानी 35 साल बाद थार की रेत ने देश को एक नया सांप दिया है। इस खोज से भारत की जैव विविधता में एक नया अध्याय जुड़ गया है। यह प्रजाति ईरान में पाई जाती है।

भारत में बोआ प्रजाति के इस चौथे सांप की मौजूदगी ने बीकानेर की जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिज़र्व को गिद्धों के साथ रेप्टाइल्स के लिए प्राकृतिक अनुकूलता को प्रमाणित की है। वाइड लाइफ फोटोग्राफर डॉ. जितु सोलंकी ने पिछली साल जुलाई में रात के समय जोड़बीड़ में इस अंजान सांप की फोटो ली थी। अब पहचान की पुष्टि सिसतान सैंड बोआ के रूप में हुई हैं।

जरनल में शोध प्रकाशित

जर्नल ऑफ थ्रेटन्ड टैक्सा में 26 मई को प्रकाशित एक शोध में वन्यजीव विशेषज्ञ विवेक शर्मा और धर्मेंद्र खंडाल ने इसकी पुष्टि की है। उनके अध्ययन के अनुसार, सीकर जिले की रामगढ़-शेखावाटी तहसील के बाहरी क्षेत्रों और खेतों से तीन जीवित सिसतान सैंड बोआ पाए गए है। इनमें एक शिशु, एक किशोर और एक प्रौढ़ सर्प शामिल था। चूरू जिले में भी इस प्रजाति के होने के प्रमाण मिले है।

पर्यावरणीय शुभ संकेत

सितान सैंड बोआ प्रजाति का सांप मिलना पर्यावरणीय शुभ संकेत है। यह लोकैलिटी ईरान से करीब 2200 किलोमीटर दूर बीकानेर-सीकर में मिला है। निशाचर और जहरीला नहीं होने से यह किसान-मित्र सांप है। जो चूहों को खाकर फसल की रक्षा करता है। आम बोलचाल में इसे दोमुंही, बांडी, गुम्बी बोलते हैं। खतरनाक होने की भ्रांति में लोग इसे मार देते हैं। इसकी पूंछ मुंह का आकार लिए मोटी होने से आगे व पीछे दोनों तरफ एक जैसा दिखता है।

- प्रो. प्रताप सिंह, एचओडी जूलॉजी, डूंगर कॉलेज, बीकानेर।

जुलाई की फोटो, अब जाकर पहचान

डॉ. सोलंकी ने बताया कि जुलाई 2025 में रात के समय जोड़बीड़ में यह सांप दिखा था। कुंद पूंछ, छोटा सिर और रेतीले रंग से यह आम सैंड बोआ से अलग लगा। परन्तु वैज्ञानिक सत्यापन नहीं हो पाया। अब शोध पत्र में आने पर फोटो मिलान से पुष्टि हुई है।

संरक्षित सूची में है शामिल

रैड सैंड बोआ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की अनुसूची-I में शामिल है। जबकि सिसतान सैंड बोआ अनुसूची-II में है। इसकी तस्करी होती है। ऐसे में इसकी सुरक्षा स्थिति के मूल्यांकन को बढ़ाने की जरूरत है।

यहां-यहां हुई पुष्टि

1. चूरू शहर के बाहरी इलाके व लीलकी बीड़ (चूरू जिला)

2. रामगढ़ शेखावटी के सुंडा की ढाणी व रुकनसर (सीकर जिला)

3. जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिज़र्व (बीकानेर जिला)

जैव विविधता में एक नया अध्याय

  • प्रवास: चूरू, सीकर और बीकानेर में दिखा ईरानी दुलर्भ प्रजाति का सांप
  • भ्रांति: दोमुंही, बांडी, गुम्बी कहकर खतरनाक होने की भ्रांति में मार देते हैं
  • हकीकत: किसान मित्र, जहरीला नहीं, शांत और दो तरफ रेंगने में सक्षम
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