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UP Bureaucracy Dominates: यूपी में अफसरशाही पर सवाल, नेता प्रतिपक्ष बोले-थानेदार नहीं उठाते विधायकों के फोन

Mata Prasad Pandey: उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने अफसरशाही पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी विधायकों के फोन तक नहीं उठाते। शासनादेशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों की अनदेखी से लोकतांत्रिक व्यवस्था और सरकार की छवि पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Feb 17, 2026

थानेदार फोन नहीं उठाते”-विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का आरोप, जनप्रतिनिधियों ने उठाए गंभीर सवाल (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

थानेदार फोन नहीं उठाते”-विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का आरोप, जनप्रतिनिधियों ने उठाए गंभीर सवाल (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

UP Bureaucracy Under Fire: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर अफसरशाही बनाम जनप्रतिनिधि का मुद्दा सुर्खियों में है। विधानसभा सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने कार्यपालिका और पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदेश में विधायकों की बात नहीं सुनी जा रही है। उनका कहना था कि कई बार फोन करने के बावजूद थानेदार फोन तक नहीं उठाते, जिससे जनप्रतिनिधियों की भूमिका कमजोर होती जा रही है।

यह मुद्दा केवल विपक्ष तक सीमित नहीं है। समय-समय पर सत्तारूढ़ दल के जनप्रतिनिधियों ने भी अधिकारियों की कार्यशैली पर असंतोष जताया है। आरोप है कि प्रदेश में अफसरशाही बेलगाम होती जा रही है और जनप्रतिनिधियों के साथ अपेक्षित शिष्टाचार एवं प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया जा रहा।

विधानसभा में गूंजा मुद्दा

सदन की कार्यवाही के दौरान माता प्रसाद पाण्डेय ने कहा, “आपने कई बार आदेश दिया कि फोन उठा लिया करिए, लेकिन पुलिस के लोग कई बार फोन नहीं उठाते। हम कई बार फोन करते हैं, थानेदार फोन ही नहीं उठाता।” उनके इस बयान के बाद सदन में हलचल तेज हो गई। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन बताया, जबकि सत्ता पक्ष के कुछ सदस्यों ने भी अप्रत्यक्ष रूप से समस्या को स्वीकार किया।

पहले भी उठ चुके हैं सवाल

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के कुछ समय बाद से ही यह मुद्दा समय-समय पर सामने आता रहा है। कई सांसदों, विधायकों और यहां तक कि मंत्रियों ने भी सार्वजनिक मंचों और बैठकों में शिकायत की कि अधिकारी उनकी बात को गंभीरता से नहीं लेते। बताया जाता है कि कई मामलों में जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष तक से शिकायत की, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित सुधार नहीं दिखा।

शासनादेश, लेकिन अमल पर सवाल

प्रदेश सरकार की ओर से बीते वर्षों में कई शासनादेश जारी किए गए, जिनमें स्पष्ट निर्देश दिए गए कि अधिकारी सांसदों और विधायकों के फोन नंबर सेव करें, कॉल रिसीव करें या बैठक में होने की स्थिति में प्राथमिकता के आधार पर संदेश भेजकर कॉल बैक करें। निर्देशों में यह भी कहा गया कि जनप्रतिनिधियों द्वारा बताए गए मामलों को प्राथमिकता से निस्तारित कर उन्हें अवगत कराया जाए। शिथिलता बरतने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी रखा गया। इसके बावजूद जनप्रतिनिधियों का कहना है कि इन आदेशों का जमीनी स्तर पर पालन नहीं हो रहा।

सत्ता और विपक्ष दोनों असहज

दिलचस्प बात यह है कि यह मुद्दा केवल विपक्ष का नहीं रह गया है। सत्ता पक्ष के कुछ विधायक भी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि कई बार अधिकारियों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आगामी चुनावों में इसका असर पड़ सकता है। जनप्रतिनिधि स्वयं को असहाय महसूस करेंगे तो कार्यकर्ताओं का मनोबल भी प्रभावित होगा।

पुलिस पर ‘लॉबी’ के आरोप

सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रशासनिक तंत्र के भीतर एक ऐसी लॉबी सक्रिय है, जो सरकार की छवि को प्रभावित करने की मंशा से काम कर रही है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस तरह की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में तेज हैं। पुलिस विभाग की ओर से औपचारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि सभी को प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए और यदि कहीं चूक हो रही है तो शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी।

लोकतंत्र और जनप्रतिनिधियों की भूमिका

भारतीय लोकतंत्र में सांसद और विधायक जनता की आवाज माने जाते हैं। वे अपने क्षेत्र की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने का माध्यम होते हैं। यदि उनकी बात नहीं सुनी जाती, तो इसका सीधा असर जनता के विश्वास पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच संतुलन और संवाद बेहद जरूरी है। प्रशासनिक निष्पक्षता बनाए रखते हुए भी शिष्टाचार और प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए।

कार्यकर्ताओं की चिंता

राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी इस स्थिति से चिंतित हैं। उनका कहना है कि यदि जनप्रतिनिधियों को ही सम्मान और सहयोग नहीं मिलेगा तो कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर होगा। भाजपा और विपक्षी दलों के कुछ कार्यकर्ताओं ने निजी बातचीत में स्वीकार किया कि प्रशासनिक स्तर पर संवाद की कमी महसूस की जा रही है। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार को स्पष्ट और कड़े निर्देशों के साथ मॉनिटरिंग तंत्र को मजबूत करना होगा। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच नियमित समन्वय बैठकें,शिकायत निस्तारण की पारदर्शी व्यवस्था। प्रोटोकॉल उल्लंघन पर त्वरित कार्रवाई। ये कुछ कदम स्थिति सुधारने में मददगार हो सकते हैं।