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Kakori Kand: स्वतंत्रता संग्राम के उस वीर योद्धा की जयंती, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी,जानिए उसके बारे में

Kakori Hero Thakur Roshan Singh : काकोरी ट्रेन एक्शन के अमर नायक ठाकुर रोशन सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती देकर स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। ‘राष्ट्र प्रथम’ के संकल्प के साथ उन्होंने हंसते-हंसते फांसी का फंदा स्वीकार किया। आज उनकी जयंती पर देश उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Jan 23, 2026

काकोरी कांड के अमर नायक ठाकुर रोशन सिंह की जयंती, राष्ट्र प्रथम के संकल्प को किया गया नमन (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

काकोरी कांड के अमर नायक ठाकुर रोशन सिंह की जयंती, राष्ट्र प्रथम के संकल्प को किया गया नमन (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

Kakori Hero Thakur Roshan Singh Freedom Fighter:  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास त्याग, बलिदान और अदम्य साहस की अमिट गाथाओं से भरा पड़ा है। इन्हीं स्वर्णिम पन्नों में एक तेजस्वी नाम है,अमर क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह। वे उन विरले स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जिन्होंने केवल आज़ादी का सपना नहीं देखा, बल्कि उसे साकार करने के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती देने वाले ठाकुर रोशन सिंह ने क्रांतिकारियों के मन में ‘राष्ट्र प्रथम’ का भाव जाग्रत किया। आज उनकी जयंती पर देश उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।

प्रारंभिक जीवन: देशभक्ति की नींव

ठाकुर रोशन सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जनपद में एक साधारण लेकिन स्वाभिमानी परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही वे अन्याय और शोषण के विरुद्ध मुखर थे। अंग्रेजी शासन की क्रूर नीतियां, किसानों और आम जनता पर अत्याचार, भारी कर और दमनात्मक कानूनों ने उनके मन में विद्रोह की ज्वाला जला दी। उनकी शिक्षा-दीक्षा ने उन्हें केवल ज्ञानवान ही नहीं बनाया, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से भी ओत-प्रोत किया। वे मानते थे कि गुलामी की जंजीरें केवल साहस और बलिदान से ही तोड़ी जा सकती हैं।

क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ाव

युवावस्था में कदम रखते ही ठाकुर रोशन सिंह का संपर्क देश के उभरते क्रांतिकारी विचारों से हुआ। उन्होंने महसूस किया कि केवल याचिकाओं और सभाओं से अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी सोच के चलते वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़े। यह वही संगठन था, जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी जैसे निर्भीक क्रांतिकारी शामिल थे। इस संगठन का उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ब्रिटिश शासन का अंत करना था।

काकोरी ट्रेन एक्शन: इतिहास का साहसिक अध्याय

9 अगस्त 1925 को घटित काकोरी ट्रेन एक्शन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इस योजना का उद्देश्य अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटकर क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए संसाधन जुटाना था। ठाकुर रोशन सिंह इस ऐतिहासिक कार्रवाई के प्रमुख सूत्रधारों में शामिल थे। जब लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन के नजदीक ट्रेन रोकी गई, तो यह केवल एक आर्थिक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि अंग्रेजी शासन के अहंकार पर करारा प्रहार था। इस घटना ने ब्रिटिश सत्ता को यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि भारत के युवा अब भयभीत नहीं हैं।

गिरफ्तारी और अमानवीय यातनाएं

काकोरी कांड के बाद अंग्रेजी सरकार बौखला उठी। पूरे उत्तर भारत में व्यापक धरपकड़ अभियान चलाया गया। ठाकुर रोशन सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में उन्हें मानसिक और शारीरिक यातनाएं दी गई, ताकि वे अपने साथियों के नाम उजागर कर दें। लेकिन ठाकुर रोशन सिंह अडिग रहे। उन्होंने न तो किसी साथी के विरुद्ध बयान दिया और न ही अपने सिद्धांतों से समझौता किया। उनका यह साहस और मौन ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।

अदालत में निर्भीक स्वर

ब्रिटिश अदालत में चले काकोरी मुकदमे के दौरान ठाकुर रोशन सिंह का व्यवहार अत्यंत निर्भीक और आत्मविश्वास से भरा हुआ था। उन्होंने अदालत को साफ शब्दों में बताया कि वे जो कुछ कर रहे थे, वह देश की आज़ादी के लिए था और उन्हें अपने कृत्य पर कोई पश्चाताप नहीं है। अंग्रेजी सरकार ने इस मुकदमे के जरिए क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया, लेकिन यह प्रयास उल्टा पड़ गया। काकोरी के वीरों ने पूरे देश में स्वतंत्रता की ज्वाला को और तेज कर दिया।

फांसी की सजा और अमर बलिदान

ब्रिटिश सरकार ने ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई। यह फैसला सुनकर भी उनके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि गर्व और संतोष था। 19 दिसंबर 1927 को उन्होंने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया। उनका यह बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अमर धरोहर बन गया।

‘राष्ट्र प्रथम’ की अमर सीख

ठाकुर रोशन सिंह का संपूर्ण जीवन इस सिद्धांत का प्रतीक था कि राष्ट्र से बड़ा कुछ भी नहीं। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन, परिवार और भविष्य की सभी संभावनाओं को मातृभूमि के चरणों में अर्पित कर दिया। उनका यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि जब राष्ट्र की बात हो, तो स्वार्थ स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत

यद्यपि इतिहास की मुख्यधारा में कई बार उनका नाम अपेक्षित स्थान नहीं पा सका, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अविस्मरणीय है। आज़ाद भारत की नींव जिन बलिदानों पर टिकी है, उनमें ठाकुर रोशन सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। आज जब देश आज़ादी का अमृतकाल मना रहा है, तब ऐसे अमर क्रांतिकारियों को स्मरण करना और उनके आदर्शों को जीवन में उतारना हम सभी का कर्तव्य है।

ठाकुर रोशन सिंह का जीवन आज के युवाओं को साहस, ईमानदारी और राष्ट्र प्रेम का मार्ग दिखाता है। वे सिखाते हैं कि सच्ची देशभक्ति केवल नारों में नहीं, बल्कि त्याग और कर्तव्य में निहित होती है।

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