
देश में सबसे ज्यादा लाइसेंसी हथियार उत्तर प्रदेश में हैं, PC- Patrika
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में मंगलवार को केन्द्रीय मंत्री जयंत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के राज्य सचिव अफसर अली को गोली मार कर जख्मी कर दिया। एक शवयात्रा से लौटने के बाद लोहरार गांव में वह किसी दुकान के पास बैठे थे। तभी उनके भतीजे ने देसी कट्टे से गोली चला दी। बताया जाता है इनके बीच संपत्ति का झगड़ा है। ऐसी घटनाएं अक्सर सुनने को मिलती हैं और इन्हें मजबूत 'गन कल्चर' से जोड़ कर भी देखा जाता है।
यूपी (उत्तर प्रदेश) हो या यूएस (अमेरिका), गन कल्चर से दोनों परेशान हैं। दोनों ही जगह लोगों को बंदूक से ‘प्यार’ है। यूपी में बंदूक रखना रसूख और ताकत की निशानी है तो यूएस में सुरक्षा का भरोसा। यूपी के गन कल्चर का खौफनाक पहलू यह है कि यहां अवैध हथियारों की बहुतायत है।
Pew Research Center ने जून 2023 में एक सर्वे किया था। इसमें शामिल दस में से चार अमेरिकी वयस्क लोगों ने कहा कि उनके परिवार में गन है। 32 फीसदी लोगों ने खुद का गन होने की बात कही। महिलाओं में 25 फीसदी और पुरुषों में 40 फीसदी ने गन रखने की बात बताई। बंदूक रखने वाले 72 फीसदी लोगों ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा के लिए गन रखते हैं।
अमेरिका में करीब 25 लाख बंदूकें हैं। इनमें से एक-तिहाई हैंडगन हैं। वहां सालाना औसतन गोलीबारी में 50000 से ज्यादा मौतें होती हैं, जिनमें 12000 कत्ल होते हैं।
अमेरिका में 'गन कल्चर' जबरदस्त रूप से फैला है। वहां इसकी वजह से हिंसक वारदात भी खूब होते हैं। आलम यह है कि बंदूक से की जाने वाली हिंसा को वहां 'पब्लिक हेल्थ क्राइसिस' घोषित कर दिया गया है।
आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में देश में सबसे ज्यादा (1277914) लोगों के पास बंदूक का लाइसेंस है। लेकिन इससे छह-सात गुना ज्यादा लोगों के पास बिना लाइसेंस के हथियार है। राज्य के एक पूर्व महानिदेशक के हवाले से उन्होंने बताया था कि उत्तर प्रदेश के मोरादाबाद जिले में यूके और जापान के कुल हथियारों से ज्यादा हथियार हैं। उत्तर प्रदेश का कानपुर बिहार के मुंगेर की जगह नया 'गन कैपिटल' बन गया है।
नियम के मुताबिक, आम जनता को बंदूक का लाइसेंस लेने के लिए यह साबित करना पड़ता है कि उसकी जान को खतरा है। मूल रूप से आर्म्स एक्ट,1959 के तहत यह लाइसेंस दिया जाता है। 2016 में नया आर्म्स एक्ट बनाया गया। इसमें हथियार रखने से संबंधित नियम और कड़े किए गए हैं। 2019 में लाए गए आर्म्स एक्ट अमेंडमेंट बिल में अवैध हथियार रखने वालों को 7-14 साल जेल की सजा का प्रावधान रखा गया है।
यूपी का ‘गन कल्चर’ कोई नया चलन नहीं है। 1966 बैच के आईपीएस रहे अजय राज शर्मा ने अपनी किताब 'बाइटिंग द बुलेट' में एक जगह लिखा है, ‘जैसे औरतों के लिए गहना, वैसे ही मर्दों के लिए हथियार रखना।’ उन्होंने यह बात बांदा के संदर्भ में लिखी है। जब वह बतौर एसपी बांदा गए थे तो उन्होंने वहां कुछ ऐसी ही स्थिति देखी थी।
शर्मा लिखते हैं तब बांदा में दो ही चीज मिलती थी- तेंदु पत्ता, जो बीड़ी बनाने के काम आता था और, कट्टा-बंदूक। आलम यह था कि एक डिग्री कॉलेज में छात्र संघ का अध्यक्ष लाइसेंसी हथियार लेकर क्लास जाया करता था। क्लास में घुसते ही वह कोने में अपना हथियार रखता और फिर सीट पर बैठता था। क्लास के किसी छात्र या शिक्षक को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी।
हथियारों को लेकर ऐसी दीवानगी थी तो मर्डर भी खूब होते थे। एक कत्ल होते ही दूसरी हत्या होने की भी गारंटी थी। मरने वाले के परिवार का कोई व्यक्ति मारने वाले के किसी न किसी व्यक्ति को मारता ही था।
उन दिनों बांदा में गुंडा राज चल रहा था। हाल यह था कि एक दिन एक छात्र परीक्षा में नकल करता पकड़ा गया तो उसने तुरंत चाकू निकाला और शिक्षक को जान से ही मार डाला। इसके बाद वह फरार भी हो गया। अजय राज शर्मा तब नए-नए बांदा के एसपी बने थे। अफवाह फैली कि शिक्षक की जान लेने वाले लड़के से पुलिस मिली हुई है, क्योंकि वह क्लास 3 रेवन्यू अफसर का बेटा है। पुलिस पर लोगों का ऐसा अविश्वास था कि वे मान रहे थे कि पुलिस आरोपी को पकड़ने के बजाय भागने में मदद कर सकती है। सुबह नौ बजे की घटना थी। शाम पांच बजे तक आरोपी लड़के का कुछ पता नहीं था।
पुलिस के सामने जनता का भरोसा जीतने की बड़ी चुनौती थी। एसपी शर्मा ने अगले दिन शाम को नेताओं, पत्रकारों और स्थानीय गणमान्य लोगों को पुलिस के साथ बैठक के लिए बुलाया। इस बीच पुलिस को आरोपी को पकड़ने में कामयाबी मिल गई थी, लेकिन इस बात को गुप्त रखा गया था। शाम को बैठक शुरू हुई। लोगों ने बोलना शुरू किया। सभी ने एक तरफ से पुलिस की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी। एक विधायक ने तंज कसते हुए कहा- नए एसपी को पता चल गया होगा कि पुलिस के बारे में पब्लिक क्या सोचती है।
इसके बाद शर्मा ने अपनी बात रखनी शुरू की। उन्होंने पुलिस की खामी स्वीकार करते हुए कहा कि जनता भी अपराध को पुलिस के पास लाने से हिचके नहीं। उन्हें किसी जुर्म की जानकारी हो तो पुलिस को जरूर बताएं। इसके बाद उन्होंने एक सवाल किया- आप लोगों की राय में टीचर की जान लेने वाले लड़के के लिए क्या सजा होनी चाहिए? सबने कहा- उसे गोली मार देनी चाहिए। तभी उन्होंने उस लड़के को सामने कर दिया और सिपाही को आदेश दिया कि उसके हाथ-पैर बांध कर दीवार से बांध दिया जाए। मीटिंग में बैठी जनता डर और सहम गई। वे लड़के को नहीं मारने की गुहार लगाने लगे। तब शर्मा ने उनसे कहा- ऐसा दोहरा रवैया रखना ठीक नहीं है। आप पुलिस से कड़ी से कड़ी सजा देने की अपेक्षा रखें और अपना नजरिया अलग रखें। उस दिन की मीटिंग का अंततः हासिल यह रहा कि जनता में पुलिस के प्रति थोड़ी उम्मीद जगी।
पुलिस को जनता पर भरोसा बढ़ाने के लिए गुंडा राज पर प्रहार करना जरूरी था। बांदा में महेंद्र सिंह और लल्टा सिंह नाम के दो गुंडों का सबसे ज्यादा खौफ था। उनके खिलाफ गवाही देने की किसी में हिम्मत नहीं थी। इसलिए पुलिस चाह कर भी उन पर शिकंजा नहीं कस पा रही थी। वे अपनी मर्जी से सरेंडर करते थे और तत्काल जमानत पा लेते थे।
अकबर सिंह बांदा पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर थे। वह बड़े सख्त अफसर थे। एसपी शर्मा ने उन्हें महेंद्र और लल्टा पर शिकंजा कसने की अपनी मंशा के बारे में बताया। अकबर सिंह बोले- इससे हासिल कुछ नहीं होगा, मेरा तबादला जरूर हो जाएगा।
कुछ ही दिन बाद महेंद्र सिंह के खिलाफ एक शिकायत आई। वहां एक कॉलेज के हॉस्टल में रहने वाले लड़के ने शिकायत की कि महेंद्र सिंह ने उसके सारे पैसे छीन लिए। ये पैसे घर से कॉलेज की फीस और रहने के खर्च के लिए आए थे। उसने एफआईआर में महेंद्र सिंह का नाम लिया। अकबर सिंह को महेंद्र सिंह को उठाने का मौका मिल गया।
महेंद्र सिंह रसूख वाले परिवार से था। उसके पिता वकील थे। वह बार एसोशिएशन के सदस्य और कांग्रेस के नेता थे। अकबर सिंह को कहा गया कि उसके घर में घुसने से पहले पीएसी की एक पलटन तैयार रखें और तड़के चार बजे अचानक धावा बोलें। अकबर सिंह ने धावा बोला तो महेंद्र के पिता धर्मेंद्र सिंह ने दरवाजा खोला और पुलिस से जमकर बहस की। लेकिन, अकबर सिंह ने भी हार नहीं मानी और आखिरकार महेंद्र को उठा कर ले ही आए।
धर्मेंद्र सिंह ने सारे वकीलों को लामबंद कर अनिश्चितकालीन हड़ताल करा दी। लेकिन, जनता पुलिस के एक्शन से खुश थी। उसने पुलिस का साथ दिया। यहां तक कि दुकानदारों ने वकीलों को सामान बेचने तक से मना कर दिया। लेकिन, धर्मेंद्र सिंह शांत नहीं बैठे। उन्होंने लखनऊ में अपने संपर्कों का इस्तेमाल किया और सच में अकबर सिंह का तबादला आदेश आ गया। एसपी शर्मा भी तमाम कोशिशों के बावजूद इसे रुकवाने में नाकामयाब रहे।
Updated on:
14 Jan 2026 11:43 am
Published on:
13 Jan 2026 08:07 pm
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