
UGC के नए नियम की रॉलेट एक्ट से हो रही तुलना, PC- Image generated by Chatgpt
लखनऊ : बरेली मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे के बाद से UGC के मुद्दे ने काफी तूल पकड़ ली है। यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने और समानता का माहौल बनाए रखने के लिए एक नया नियम (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations) बनाया है।
इस नियम को सभी विश्विद्यालय और कॉलेजों में लागू किया जाना है। लेकिन, इस नियम के लागू होने से पहले इसका विरोध तेज हो गया है। वजह है एक वर्ग के साथ भेदभाव और पक्षपात का आरोप। इसी को लेकर PCS अफसर अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और इस नियम को काला कानून बताया। यूजीसी के नए नियम को रॉलेट एक्ट यानि कि काले कानून से जोड़कर देखा जा रहा है।
रॉलेट एक्ट को काला कानून भी कहा जाता है। यह 19 मार्च 1919 को भारत की ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से निर्मित कानून था। यह कानून सिडनी रौलेट की अध्यक्षता वाली सेडिशन समिति की सिफारिशों के आधार पर बनाया गया था। रॉलेट एक्ट का सरकारी नाम अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम, 1919 (The Anarchical and Revolutionary Crime Act of 1919) था।
रॉलेट एक्ट को काला कानून इसलिए बताया गया था क्योंकि इस नियम से ब्रिटिश सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि किसी भी भारतीय आंदोलनकारी को बिना अदालत में मुकदमा चलाए सीधे जेल में बंद कर सके। इस कानून के तहत अपराधी को उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम जानने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया। इस काले कानून से सरकार को यह अधिकार मिल गया कि वह बलपूर्वक प्रेस की स्वतंत्रता का अधिकार छीन ले और अपनी इच्छा अनुसार किसी व्यक्ति को कारावास दे दे या देश से निष्कासित कर दे। इसीलिए इस कानून को काला कानून कहा गया।
अब यूजीसी के नए इक्विटी रूल की तुलना अंग्रेज़ी दौर के रॉलेट एक्ट से की जा रही है। इसकी वजह यह है कि नए नियमों के तहत कोई भी पीड़ित व्यक्ति इक्विटी कमेटी को लिखित शिकायत कर सकता है। कमेटी शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखते हुए मामले को कार्रवाई के लिए सीधे पुलिस को भेज सकती है, जिसके बाद आरोपी पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
इसी प्रावधान को लेकर सबसे ज्यादा नाराजगी जताई जा रही है। आलोचकों का कहना है कि नियमों में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि शिकायत करने वाले को अपने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य देना अनिवार्य होगा। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि झूठी शिकायतें बड़ी संख्या में दर्ज हो सकती हैं और बिना पुख्ता जांच के कार्रवाई भी हो सकती है।
इतना ही नहीं, अगर कोई व्यक्ति अपने ऊपर लगे आरोपों को झूठा साबित भी कर देता है, तो नियमों में झूठे आरोप लगाने वालों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। यह बात भी विरोध का बड़ा कारण बन रही है।
इसके अलावा, नए नियमों के तहत इक्विटी सेंटर, इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वाड के गठन का प्रावधान किया गया है। लेकिन इन सभी संरचनाओं में कहीं भी सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की स्पष्ट व्यवस्था नहीं की गई है। इसी वजह से विरोध करने वालों का कहना है कि यह नियम एकतरफा हैं और इसी कारण इनका व्यापक स्तर पर विरोध किया जा रहा है।
Updated on:
27 Jan 2026 06:32 pm
Published on:
27 Jan 2026 06:29 pm
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