1 फ़रवरी 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बच्चों को भी नसीब नहीं शुद्ध पेयजल, 1.57 लाख छात्रों की सेहत दांव पर

इंदौर की घटना के बाद भी कटनी में स्कूलों के पानी की न जांच, न रिकॉर्ड

3 min read
Google source verification

कटनी

image

Balmeek Pandey

Feb 01, 2026

Anganwadi Centre, Anganwadi Centre in Rajasthan, Anganwadi Centre in Pali, Anganwadi Centre in Jalore, Anganwadi Centre in Sirohi, Pure Drinking Water, Pure Drinking Water Project, Pure Drinking Water Project in Pali, Pure Drinking Water Project in Jalore, Pure Drinking Water Project in Sirohi, आंगनबाड़ी केन्द्र, आंगनबाड़ी केन्द्र इन राजस्थान, आंगनबाड़ी केन्द्र इन पाली, आंगनबाड़ी केन्द्र इन जालोर, आंगनबाड़ी केन्द्र इन सिरोही, शुद्ध पेयजल, शुद्ध पेयजल प्रोजेक्ट, शुद्ध पेयजल प्रोजेक्ट इन पाली, शुद्ध पेयजल प्रोजेक्ट इन जालोर, शुद्ध पेयजल प्रोजेक्ट इन सिरोही

एआई तस्वीर

कटनी. इंदौर में दूषित पेयजल से जुड़ी घटना के बाद स्कूल शिक्षा विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि शासकीय स्कूलों में बच्चों को उपलब्ध कराए जाने वाले पानी की सैंपल जांच लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) से कराई जाए। उद्देश्य था कि स्कूलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही न रहे और बच्चों को सुरक्षित पेयजल मिल सके लेकिन जिले में यह निर्देश कागजों से बाहर निकलते नहीं दिख रहे हैं। जिले के लगभग दो हजार शासकीय स्कूलों में पढऩे वाले एक लाख सत्तावन हजार से अधिक बच्चे आज भी ऐसे पानी पर निर्भर हैं, जिसकी गुणवत्ता को लेकर न तो कोई पुख्ता व्यवस्था है और न ही नियमित जांच का सिस्टम।
जानकारी के अनुसार जिले में कुल 1985 शासकीय स्कूल संचालित हैं, जिनमें 1278 प्राथमिक, 531 माध्यमिक, 90 हाईस्कूल और 86 हायर सेकेंडरी स्कूल शामिल हैं। इन स्कूलों में कक्षा पहली से आठवीं तक 1 लाख 10 हजार 89 और कक्षा नौवीं से बारहवीं तक 47 हजार 660 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। यानी जिले की एक बड़ी आबादी प्रतिदिन स्कूल परिसर में उपलब्ध पानी पीती है, लेकिन अधिकांश स्कूलों में यह तय ही नहीं है कि वह पानी वास्तव में पीने योग्य है या नहीं। जमीनी हकीकत यह है कि शिक्षा विभाग के निर्देशों के बावजूद जिले में अब तक कितने स्कूलों ने पीएचई को पानी जांच के लिए पत्र लिखा, इसका कोई समेकित रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। कितने स्कूलों की पानी जांच रिपोर्ट आई और कितनों की लंबित है, यह जानकारी भी जिला स्तर पर उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। कई स्कूलों में तो यह तक स्पष्ट नहीं है कि छत पर रखी गई पानी की टंकियों या परिसर में रखी टंकियों की अंतिम बार सफाई कब कराई गई थी। पानी की जांच या टंकी सफाई को लेकर किसी तरह का रजिस्टर या दस्तावेज़ रखने की व्यवस्था अधिकांश स्कूलों में नहीं है।

किसी एक मानक पर नहीं पेयजल व्यवस्था

जिले के शासकीय स्कूलों में पेयजल व्यवस्था किसी एक मानक पर नहीं चल रही है। कहीं निगम के पानी पर भरोसा है, कहीं बोरिंग का बिना जांच किया पानी बच्चों को पिलाया जा रहा है, तो कहीं नलजल योजना के भरोसे व्यवस्था चल रही है। इंदौर की घटना के बाद जारी निर्देशों के बावजूद पानी की नियमित जांच, टंकी सफाई और उसका रिकॉर्ड रखने जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं अब भी सवालों के घेरे में हैं।

वाटर फिल्टर नहीं, टंकी में है पानी

शहर के शासकीय हाईस्कूल कुठला में 123 छात्र अध्ययनरत हैं। स्कूल में नगर निगम की सप्लाई का पानी एक टंकी में स्टोर किया जाता है और पाइपलाइन के माध्यम से नलों तक पहुंचाया जाता है। स्कूल में वाटर फिल्टर जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। प्रभारी प्राचार्य सरोज पटेल के अनुसार स्कूल में लगा हैंडपंप खराब है और उससे निकलने वाला पानी भी खराब आता है, इसलिए मजबूरी में नगर निगम की सप्लाई का पानी ही उपयोग में लिया जा रहा है। स्कूल में वाटर कूलर जरूर है, लेकिन शुद्धिकरण की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है।

बेहतर इंतजाम, स्टील टंकी में मिला स्वच्छ पानी

बस स्टैंड स्थित शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय में पेयजल की व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर नजर आई। यहां करीब 184 छात्र अध्ययनरत हैं। नगर निगम की सप्लाई के पानी को स्टील की टंकी में संग्रहित किया जाता है और बच्चों के लिए वाटर फिल्टर भी लगाया गया है। स्कूली प्रभारी प्रशांत चनपुरिया का कहना है कि बच्चों को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। हालांकि ऐसे उदाहरण जिले में गिने-चुने ही हैं।

निगम के भरोसे बच्चों की सेहत

शासकीय माध्यमिक विद्यालय एनकेजे में 114 छात्र पढ़ते हैं। यहां भी बच्चों के लिए नगर निगम की सप्लाई का पानी ही उपयोग में लिया जाता है। सुबह कर्मचारी स्टील की दो टंकियों में पानी भरकर रख देते हैं और बच्चे दिनभर उसी पानी का उपयोग करते हैं। पानी की सैंपलिंग को लेकर जब शिक्षकों से पूछा गया तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। शिक्षकों का कहना है कि यह नगर निगम का पानी है, जिसकी जांच नगर निगम करता होगा, लेकिन स्कूल स्तर पर इसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। यहां भी वाटर फिल्टर की कोई व्यवस्था नहीं है।

Story Loader