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ऊर्जा लक्ष्य को प्राप्त करने के सही रास्ते तलाशने की जरूरत

देश की सबसे बड़ी नहरों में इंदिरा गांधी कैनाल, राजस्थान की लंबाई 650 किलोमीटर है। अपर गंगा कैनाल की लंबाई 1412 किलोमीटर है।

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डॉ. भुवनेश जैन, पूर्व निदेशक मेरा युवा भारत युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार - सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय से थार की गोदी में पल रहे गोडावण के साथ कुछ क्षेत्र में पारिस्थितिकी संरक्षण की उम्मीद जगी है, थार रेगिस्तान का क्षेत्र हाइटेंशन विद्युत लाइन के जालों, पवन चक्की एवं सोलर पार्क में तब्दील होकर अपनी पहचान खोता जा रहा है। पारिस्थितिकी संतुलन के लिए चुनौती बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने गोडावण संरक्षण के प्राथमिकता क्षेत्र में हाइटेंशन बिजली लाइन और सोलर पावर पार्क, पवन चक्की की स्थापना पर रोक लगाई है।

राजस्थान के जैसलमेर की 14013 वर्ग किलोमीटर और गुजरात के कच्छ में नलिया सहित 740 वर्ग किलोमीटर में नई विद्युत लाइन बिछाने पर प्रतिबंध लगा दिया हैं। बिछाई हुई हाइटेंशन लाइन को अगले दो वर्षों में भूमिगत करने का आदेश भी दिया है। हाइटेंशन लाइन से गोडावण की अकाल मृत्यु की खबरें आती रही है और सोलर पार्क, पवन चक्की के कारण खेजड़ी सहित थार की बहुमूल्य वनस्पति पर आए संकट के कारण न केवल गोडावण, बल्कि अन्य पक्षियों के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। थार क्षेत्र में बेलगाम हाइटेंशन लाइन और सोलर परियोजनाएं ओरण गोचर के साथ-साथ निजी खेतों और सामुदायिक, शामलात जमीन को बर्बाद कर पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ दिया है।

सोलर पार्क, सोलर पावर प्लांट, पवन चक्की, हाइटेंशन विद्युत लाइनों की जाल में गोडावण ही नहीं, थार क्षेत्र की जैव विविधता खतरे में पड़ी हुई है। ऊर्जा के तय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संवेदनहीन तरीके से खेजडिय़ों, रोहिड़ा, केर, कुमट, फोग का खात्मा किया गया है, जिसके चलते गोडावण के साथ कई पक्षियों का जीवन संकट में आ गया है। ये पक्षी शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के हैं, जो पारिस्थितिकी संतुलन को बनाने में मदद करते हैं। थार मरुस्थल के मुख्यत: घास पैदावार का क्षेत्र होने के कारण यह पशुपालन का क्षेत्र रहा है। यहां के अधिकांश वन्यजीव एवं घरेलू पशु घास और चारे पर निर्भर हैं। ऐसे में थार मरुस्थल में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप यहां की पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाडऩा है।
कृषि विशेषज्ञ शिवगिरी का कहना है कि थार क्षेत्र का किसान होने के साथ पशुपालक भी है, लेकिन सोलर पार्क के लिए कितनी निजी, शामलात जमीन वन्यजीव पशुओं और इंसान के लिए छोडऩी चाहिए। उसको कहीं भी संज्ञान में नहीं लिया गया है। शहरों में भी एक मकान बनाने के लिए सेट बैक छोड़ा जाता है तो खेतों का उपयोग अन्य उद्देश्य के लिए करने के लिए खेत पर निर्भर रहने वालों को ध्यान में क्यों नहीं रखा जाता। विद्युत लाइनों के संबंध में यदि खातेदार अपनी जमीन का रूपांतरण आवासीय या औद्योगिक किस्म में करवा देता है तो उसकी जमीन हाइटेंशन लाइन से मुक्त हो जाती है। उचित ज्ञान और सूचना के अभाव में खातेदार ऐसा नहीं कर पाता है तो उसका खेत बर्बाद हो जाता हैं। थार मरुस्थल में सोलर कंपनियों के लिए सरकार ने ऐसा ही किया है।

गजट नोटिफिकेशन जारी करके केवल गांव का नाम लिख दिया जाता है उसमें कहीं भी खसरा नंबर नहीं होता है जो बता सके कि किसके खेत से विद्युत लाइन निकलेगी। सरकारी लवाजमा बिना अनुमति और एग्रीमेंट के खेत में घुस जाता है। हाइटेंशन लाइन, विद्युत पोल आदि खड़े कर देता है। सरकार की जिम्मेदारी बननी चाहिए कि मानव समाज की भावी जरूरतों को देखते हुए हाइटेंशन लाइन बिछाने से पहले खेत और आजीविका से जुड़े शामलात जमीन को कैसे बचाए, विचार करे और विकल्पों पर कार्य करे।

देश की सबसे बड़ी नहरों में इंदिरा गांधी कैनाल, राजस्थान की लंबाई 650 किलोमीटर है। अपर गंगा कैनाल की लंबाई 1412 किलोमीटर है। इस तरह नदी, नहरें, राज्य एवं राष्ट्रीय मार्ग, देश की सरकारी भवनों, रेलवे स्टेशनों का उपयोग पावर जनरेशन के लिए प्राथमिकता से और बड़े पैमाने पर किए जाने की जरूरत है। ग्रामीण, राज्य, राष्ट्रीय मार्गों के किनारे हाइटेंशन लाइन बिछाने का प्लान पहले बने, ताकि स्वच्छ ऊर्जा भी हो, जल संरक्षण और भूमि की बचत भी हो। ऊर्जा लक्ष्य को प्राप्त करने के सही रास्ते तलाश करने की जरूरत है। जहां-जहां भी हाइटेंशन लाइनें बिछ गई हैं, उन्हें भूमिगत किया जाए। जमीन नहीं बची तो जीने की जमीन खिसक जाएगी।

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