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पानी पीओ आदिवासियों का खून नहीं

पैदल मार्च : आंध्र के चिंतुर में नक्सलियों के खिलाफ आदिवासियों की विशाल रैली...

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माओवादियों के विरोध में बैनर पोस्टर लेकर प्रदर्शन करते ग्रामीण आदिवासी

माओवादियों के विरोध में बैनर पोस्टर लेकर प्रदर्शन करते ग्रामीण आदिवासी

कोंटा . जनवरी चार तारीख की रात को नक्सलियों के द्वारा आंध्र की अल्लूरी सीताराम राजू पाडेरू जिला के थाना चिंतुर क्षेत्र अंतर्गत जो छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्र कोंटा से महज 10 किमी की दूरी पर स्थित ग्राम बुर्कनकोठा में माओवादियों के द्वारा पुलिस मुकबीर के शक में सोयम सुब्बैया का निर्ममता के साथ हत्या किया गया ।
हजारों आदिवासी लामबंद हुए - पुलिस मुखबिरी के शक में माओवादियों के द्वारा ग्रामीण सोयम सुब्बैया के हत्या के बाद आदिवासी समाज के द्वारा हजारों आदिवासी लामबंद हुए, ब्लाक मुख्यालय चिंतुर से चट्टी तक हजारों आदिवासियों के द्वारा एक विशाल रैली कर निर्दोष आदिवासियों पर बेबुनियाद आरोप लगा कर हत्या करना गलत ठहराया व धरना भी दिया।
रक्षक नहीं भक्षक हैं माओवादी - रजिता सु बैय्या के मौत के बाद माओवादियों के सुब्बैया पर पुलिस मुखबिरी करने का लगाए गए आरोप को पत्नी गौरम्मा व 15 वर्षीय पुत्री सोयम रजिता ने सरासर गलत कहा। पुत्री ने कहा की मेरे पिता एक कृषक हैं, खेती किसानी का कार्य करते थे। मुखबिरी की बात तो दूर हैं परंतु मेरे पिता पुलिस तक को नहीं जानते हैं। पत्नी गौरम्मा ने कहा की यदि मेरे पति पुलिस के मुखबिरी होते तो मेरे साथ, बुर्कनकोठा ग्राम सहित अन्य बीस ग्राम के ग्रामीण सड़क पर उतारू होने को मजबूर नहीं होते।
संगठन से दूरी बनाया तो कर दी हत्या - मृतक सुब्बैया माओवादी संगठन के लिए जन मिलिशिया सदस्य के रूप में काम किया, इस बात को माओवादी नकार नहीं सकते। वर्षो तक उसका माओवादी इस्तेमाल करने के पश्चात उसे पुलिस मुकबीर के नाम पर मार दिया गया। इस पर गौर करें तो माओवादी पार्टी जो कर रही हैं वह पागल के हाथ में पत्थर की तरह हैं। वे किसी को क्यों मारते हैं, वे हर घटना के पीछे मारने का कारण बताए , आदिवासी मोवादियों का सहयोग नहीं कर रहे हैं इसी कारण कई निर्दोषों का हत्या करने में नक्सली पीछे नहीं हट रहे हैं। एस सतीश कुमार, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक चिंतुर

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