
फोटो सोर्स- पत्रिका
MP News: मध्यप्रदेश के इंदौर में एमवायएच अस्पताल के डॉक्टरों ने अद्भुत कार्य करके दिखाया है। एक 38 वर्षीय युवक की गर्दन गंभीर रूप से कट गई थी। जिसके बाद उसका ऑपरेशन करके डॉक्टरों ने जान बचाई। युवक के गले में कटर मशीन चल गई थी। जिससे उसकी सांस व आहार नली सहित खून की नसें भी कट गई। गले पर गंभीर घाव बन गया। जो कि अंदर तक नजर आ रहा था।
इस दुर्लभ और गंभीर मामले में एमवायएच के सर्जरी विभाग की टीम ने सामने से कटी हुई गर्दन, पूरी तरह क्षतिग्रस्त सांस व खाने की नली व खून की नलियों को जोड़ा गया। लगभग चार घंटे तक टीम ने ऑपरेशन किया। मरीज घटना के लगभग डेढ़ से घंटे बाद एमवायएच पहुंचा था। ऐसे में स्थिति ओर भी गंभीर हो चुकी थी।
अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, 17 जनवरी शाम को इंदौर के गोकुल नगर निवासी 38 वर्षीय सोहन पुत्र पन्नालाल को गंभीर अवस्था में एमवायएच अस्पताल लाया गया। परिजनों ने बताया कि वह घर पर कटर मशीन (ग्राइंडर) से लोहे का सरिया काट रहा था। तभी अचानक कटर फिसलने से उसकी गर्दन गहराई तक कट गई। इस हादसे में मौके पर अधिक खून बह गया। मरीज की सांस की नली तथा खाने की नली दोनों कट गईं। जिससे उसकी हालत अत्यंत नाजुक हो गई।
मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए एमवायएच अस्पताल के सर्जरी विभाग ने तुरंत ऑपरेशन का निर्णय लिया। सर्जरी विभाग के डॉ. सुदर्शन ओडिय़ा के नेतृत्व में डॉ. संजय महाजन, डॉ. शुभ घनघोरिया, डॉ. सतीश वर्मा, डॉ. सुनील राठौड़, डॉ. नेहा कुमारी, डॉ. सुजय सिंह और डॉ. शेर सिंह की टीम ने आपातकालीन ऑपरेशन किया। इस जटिल सर्जरी में सांस की नली और खाने की नली को सावधानीपूर्वक पुन: जोड़ा गया।
मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया ने बताया मरीज बेहद गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचा था। सांस लेने में अत्यधिक परेशानी को देखते हुए तत्काल ट्रेकियोस्टॉमी कर कुछ दिनों के लिए अलग श्वसन मार्ग बनाया गया। मरीज को आइसीयू में निगरानी में रखा गया। पांच दिनों तक गहन चिकित्सा विभाग में रखकर उपचार किया गया। इस दौरान मरीज को पांच यूनिट ब्लड चढ़ाया गया। 7 दिन बात हालत में सुधार के बाद मरीज को वार्ड में शिफ्ट किया गया और मुंह से भोजन शुरू कराया गया। दस दिन बाद उसकी सांस की नली भी सुरक्षित रूप से निकाल दी गई। मरीज की आवाज लौट आई और पूर्ण रूप से स्वस्थ होने पर 31 जनवरी को डिस्चार्ज किया गया।
डीन डॉ. घनघोरिया ने यह मरीज मृत्यु की कगार पर था। अत्यधिक ब्लड लॉस के साथ सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि सांस की नली, खाने की नली और स्वर ग्रंथि तीनों को सुरक्षित रखा जाए। अत्यंत सावधानी और विशेषज्ञता के साथ यह सर्जरी की गई। जिससे मरीज की आवाज भी बचाई जा सकी। इसमें सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. अरविंद शुक्ला, यूनिट प्रमुख डॉ. सुदर्शन ओड़िया तथा एनेस्थीसिया विभाग की प्रमुख डॉ. शालिनी जैन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
Published on:
31 Jan 2026 06:31 pm

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