
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी कर्मचारी से दशकों तक सेवा लेने के बाद उसे पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियुक्ति अवैध नहीं बल्कि अनियमित थी और कर्मचारी ने लंबे समय तक निरंतर सेवा दी है, तो उसे नियमित मानते हुए सभी सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाना अनिवार्य है। राज्य सरकार ने 28 वर्षों तक नियमित वेतनमान पर सेवाएं लीं और सेवानिवृत्ति की अनुमति दी, इसलिए अब पेंशन से इनकार करना अनुचित है। हाईकोर्ट ने 14 दिसंबर 2016 का आदेश निरस्त करते हुए शासन को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता की सेवा 27 अक्टूबर 1987 से नियमित मानी जाए, पेंशन प्रकरण तैयार कर पीपीओ-जीपीओ जारी किए जाएं और 30 अगस्त 2014 से एरियर सहित पेंशन का भुगतान किया जाए। कोर्ट ने तीन माह में आदेश का पालन न होने पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने और मानसिक उत्पीड़न के लिए 50 हजार रुपए क्षतिपूर्ति देने के निर्देश भी दिए।
यह आदेश न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहारावत ने पूर्णिमा सक्सेना बनाम मध्यप्रदेश शासन प्रकरण में पारित किया। याचिकाकर्ता की नियुक्ति 27 अक्टूबर 1987 को करुणा नियुक्ति के तहत पीजी कॉलेज शिवपुरी में रजिस्ट्रार पद पर हुई थी। बाद में उनका स्थानांतरण शासकीय पीजी कॉलेज गुना किया गया। याचिकाकर्ता 30 अगस्त 2014 को सेवानिवृत्त हुईं, लेकिन सेवा नियमित न होने का हवाला देकर उन्हें पेंशन से वंचित कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि विभाग स्वयं स्पष्ट कर चुका था कि क्लास-2 गजेटेड पद के लिए लेखा प्रशिक्षण आवश्यक नहीं है और लोक सेवा आयोग द्वारा इस पद के लिए कभी विज्ञापन भी जारी नहीं किया गया। ऐसे में शर्तें पूरी न होने का दोष कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता।
Published on:
07 Feb 2026 11:12 am
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