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“दोषी अफसरों को बचाने में जुटा सिस्टम?” हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, मुख्य सचिव को करना होगा विचार

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ओर राज्य सरकार खुद को गंभीर बताती है, लेकिन रिकॉर्ड से ऐसा लगता है कि अधिकारी दोषी कर्मचारियों को बचाने में लगे हुए हैं। यह विचार […]

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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ओर राज्य सरकार खुद को गंभीर बताती है, लेकिन रिकॉर्ड से ऐसा लगता है कि अधिकारी दोषी कर्मचारियों को बचाने में लगे हुए हैं। यह विचार करने का विषय है कि क्या राज्य के वरिष्ठ अधिकारी भी दोषी अधिकारियों के साथ मिलीभगत में हैं और निजी व्यक्तियों को अनुचित लाभ दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारी राज्य के हित की रक्षा करने के बजाय दोषी अधिकारियों को बचाने में अधिक रुचि ले रहे हैं।

न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया की एकलपीठ में मध्यप्रदेश शासन बनाम अमर सिंह व अन्य प्रकरण की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान शासन की ओर से बताया गया कि 8 फरवरी 2026 को अजय देव शर्मा के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने का निर्णय लिया गया था और 12 फरवरी 2026 को जांच अधिकारी तथा प्रस्तुतिकरण अधिकारी भी नियुक्त कर दिए गए थे। हालांकि कोर्ट ने पाया कि यह आदेश होने के बावजूद सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव ने अपने शपथपत्र के साथ इस आदेश की प्रति पेश नहीं की। इस पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह स्थिति चौंकाने वाली है। मुख्य सचिव को सोचना होगा कि पीठासीन अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी दोनों की नियुक्ति दिनांक 12 फरवरी 2026 के आदेश द्वारा की गई थी, फिर भी मध्य प्रदेश सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग, भोपाल के प्रधान सचिव, कार्मिक ने इसे अपने हलफनामे के साथ रिकॉर्ड में रखना उचित नहीं समझा। सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव एम सेल्वेंद्रन आदेश की प्रति के साथ अपना शपथपत्र 10 मार्च तक कोर्ट में पेश करें।

क्या है मामला

दरअसल दीनारपुर में उद्योग विभाग की जमीन की डिक्री हो गई थी। इस डिक्री के खिलाफ उद्योग विभाग केस हार गया था, लेकिन फिर ने डिक्री के खिलाफ केस दायर किया, लेकिन इसमें ऐसे पक्षकार को प्रतिवादी बनाया, जिनका निधन हो चुका था। आधार पर अपील खारिज हो गई। इस अपील को रीस्टोर करने के लिए आवेदन पेश किया। इस मामले में कोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।