
ग्वालियर की सहायक प्राध्यापक डॉ.संगीता सिंह ने छह माह के शोध के जरिए कालबेलिया समुदाय की भाषाई धरोहर को सहेजा
भाषा, संस्कृति और परंपरा किसी भी समुदाय की पहचान होती है और जब ये खतरे में होती हैं तो उस पहचान को पुन: जीने की जिम्मेदारी हम सभी पर आ जाती है। ऐसा ही कुछ किया ग्वालियर के विजयाराजे शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापक डॉ. संगीता सिंह ने, जिन्होंने कालबेलिया (सपेरा) समुदाय की विलुप्तप्राय भाषा को संरक्षित करने के लिए एक अनूठा नवाचार किया है। उनके इस कार्य ने न केवल इस समुदाय के अस्तित्व को बचाया बल्कि एक ऐसी तकनीकी डिक्शनरी बनाई जो न केवल शब्दों को पढऩे बल्कि सुनने का भी अनुभव देती है। ये मूल शब्दावली विलुप्त होने की कगार पर है। यह 'टॉकिंग डिक्शनरी' आने वाली कई पीढिय़ों को कालबेलिया भाषा के शब्दों के मूलरूप को सरंक्षित करने का कार्य करेगी। इस 'टॉकिंग डिक्शनरी' में 1384 शब्दों का संग्रह किया गया है और कुछ महत्वपूर्ण वाक्य भी रिकॉर्ड किए गए हैं। डॉ.सिंह का ये कार्य आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी और सेल संस्था, लखनऊ के मार्गदर्शन में पूरा हुआ है। इस 'टॉकिंग डिक्शनरी' को प्रदेश सरकार संस्कृति संचालनालय के मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय पोर्टल पर भी डिजिटल रूप में अपलोड किया गया है। हाल ही में गणतंत्र दिवस के मौके पर राज्यपाल मंगूभाई पटेल ने डॉ.संगीता सिंह को उनके इस अनूठे कार्य के लिए सम्मानित भी किया है।
जाने कालबेलिया समुदाय के बारे में
कालबेलिया समुदाय भारत के राजस्थान और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में बसा हुआ एक विशेष जातीय समूह है। इस समुदाय के लोग पारंपरिक रूप से घूमंतू होते हैं और उनका प्रमुख व्यवसाय सांप पकडऩा, सपेरा विद्या, लोकनृत्य और पशु चिकित्सा से जुड़ा रहता है। हालांकि उनकी सांस्कृतिक धरोहर को आज भी सम्मानित किया जाता है, लेकिन उनका पारंपरिक जीवन और भाषा लुप्त होने के कगार पर हैं।
छह महीने में पूरा किया शोध कार्य
डॉ.संगीता सिंह ने इस परंपरा को बचाने का जिम्मा उठाया और कालबेलिया समुदाय की भाषा, संस्कृति और जीवनशैली का सर्वेक्षण किया। उन्होंने यह कार्य ग्वालियर-चंबल संभाग में स्थित कालबेलिया बस्तियों में जाकर किया गया। यह एक लंबा और कठिन कार्य था, लेकिन उनका उद्देश्य स्पष्ट था- इस समुदाय की धरोहर को संरक्षित करना। डॉ.संगीता ने बताया कि मेरा ये शोध कार्य पूरा करने में छह माह का समय लगा। इस शोध के दौरान कालबेलिया समुदाय के बीच जाकर उनकी भाषा, बोली और संस्कृति को समझने के लिए एक गहन सर्वेक्षण किया। शुरुआत में उन्हें यह काम आसान नहीं लगा, क्योंकि इस समुदाय के लोग अपनी परंपराओं को लेकर बहुत ही सजग और संकोची थे। कई बार लोग उनके काम का मजाक भी उड़ाते थे, लेकिन मैंने हार नहीं मानी और उनके साथ घंटों समय बिताया। सर्वेक्षण के दौरान, मैंने यह महसूस किया कि इस समुदाय की भाषा न केवल एक बोली है बल्कि एक पूरी संस्कृति का प्रतीक है। उन्होंने देखा कि समुदाय के लोग सांस्कृतिक गीतों, नृत्य और लोककला के माध्यम से अपनी विरासत को जीवित रखते हैं, लेकिन उनकी भाषा धीरे-धीरे विलुप्त हो रही थी। इसके बाद, उन्होंने इस भाषा को दस्तावेजी रूप देने का निर्णय लिया।
ऐसे काम करती है 'टॉकिंग डिक्शनरी'
कालबेलिया भाषा के संरक्षण के लिए एक अभिनव तरीका अपनाया। उन्होंने एक 'टॉकिंग डिक्शनरी' विकसित की, जो न केवल शब्दों का हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद करती है, बल्कि समुदाय के लोगों की आवाज में शब्दों को सुनने का भी अनुभव देती है। यह डिक्शनरी त्रिभाषीय है। कालबेलिया शब्दों के हिंदी और अंग्रेजी अर्थों के साथ-साथ, प्रत्येक शब्द का इंटरनेशनल फोनेटिक अल्फाबेट (आइपीए) उच्चारण भी उपलब्ध है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस डिक्शनरी में शब्दों को पढऩे के साथ-साथ, उन्हें सुना भी जा सकता है, और यह आवाज कालबेलिया समुदाय की महिला या पुरुष की होती है। इस शब्दकोश से इस समुदाय के बच्चों और युवाओं को उनकी मातृभाषा को समझने और सीखने का मौका मिलेगा।
Published on:
30 Jan 2026 11:44 am

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