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भारत, May 14, 2026

देश का पहला स्वदेशी पेन, सोने की निब, गांधी की कसौटी पर उतरे खरे, महीने में बनाते हैं सिर्फ 80 पेन

Made In India: क्या आज के मशीनों वाले दौर में कोई कंपनी अब भी हाथ से फाउंटेन पेन बनाती है? जी, हां! Ratnam Pen Works पिछले 90 सालों से यही कर रही है। 5 घंटे में तैयार होने वाला यह स्वदेशी पेन कभी महात्मा गांधी को इतना पसंद आया कि उन्होंने खुद पत्र लिखकर तारीफ की थी।

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रत्नम फाउंटेन पेन 302 मॉडल। @ratnampens/instagram

First Swadeshi Pen: मशीनों के इस युग में क्या आप यकीन करेंगे कि एक कंपनी आज भी हाथ से फाउंटेन पेन तैयार कर रही है। एक पेन तैयार करने में 4 से 5 घंटे का समय लगता है और महीने में केवल 70 से 80 पेन बेचे जाते हैं। आप भले ही इसे पुरानी सोच और नासमझी कहें, लेकिन यह विरासत को संजोने, सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ाने का जुनून है। एक ऐसा जुनून जो हर दिन यह साबित कर रहा है कि मशीनों का शोर हाथों के हुनर को खत्म नहीं कर सकता।

आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर राजमुंदरी की यह कंपनी आज भी एक चट्टान की तरह खड़ी हुई है। वक्त के साथ इसकी रंगत फीकी जरूर हुई, लेकिन अस्तित्व अब भी बरकरार है। कंपनी दावा करती है कि वे देश की पहली स्वदेशी पेन बनाने वाली कंपनी है।

जिज्ञासा ने दिया कंपनी को जन्म

इस कंपनी का नाम है 'रत्नम पेन वर्क्स', जिसकी स्थापना 1932 में दो भाई- कोसुरी सत्यनारायण और कोसुरी वेंकट रत्नम ने की थी। रत्नम पेन वर्क्स के हैंडमेड और पूरी तरह से स्वदेशी पेन ने महात्मा गांधी तक को मोहित कर दिया था। इन पेनों की कहानी एक कारीगर की जिज्ञासा से शुरू हुई। साल 1928 में, गांव का एक मुनीम अपना टूटा हुआ फाउंटेन पेन लेकर कोसुरी सत्यनारायण के पास पहुंचा। सत्यनारायण एक बहुत ही कुशल सुनार थे। उस पेन की निब सोने की बनी हुई थी। पेन की मरम्मत करने के दौरान सत्यनारायण और उनके भाई कोसुरी के मन में एक विचार आया- क्यों न एक ऐसा पेन बनाया जाए, जिसमें मातृभूमि की महक हो, जो स्वदेशी गौरव' का एक प्रतीक कहलाये।

गांधी की अपील ने किया प्रभावित

इसके बाद दोनों भाइयों ने मिलकर अपनी वर्कशॉप की विधिवत शुरुआत की। पहले कुछ सालों में विदेशी और देशी सामग्री के मिश्रण से पेन तैयार करते रहे। उदाहरण के तौर पर उच्च गुणवत्ता वाला 'सेल्युलाइड' जर्मनी से इम्पोर्ट किए जाते, जबकि पेन की सोने की निब हाथ से तैयार की जाती। इन पेनों की कीमत 15 रुपए थी, जो उस समय के हिसाब से एक बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। महात्मा गांधी की स्वदेशी अपनाने की अपील ने कोसुरी सत्यनारायण और कोसुरी वेंकट रत्नम को प्रभावित किया। और यहां से शुरू हुआ पूरी तरह से देशी पेन के निर्माण का सिलसिला। दोनों भाइयों ने स्वदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल करके पेन तैयार किया और महात्मा गांधी को बतौर उपहार भेजा।

बापू ने पत्र लिख जताई थी खुशी

पेन देखकर महात्मा गांधी को यकीन ही नहीं हुआ कि वो स्वदेशी है। उन्हें लगा कि विदेशी पेन को जोड़-तोड़कर देशी का नाम दिया गया है। सच्चाई का पता लगाने के लिए उन्होंने अपने करीबी जे.सी. कुमारप्पा को राजमुंदरी की वर्कशॉप में भेजा। जब कोसुरी सत्यनारायण और कोसुरी वेंकट रत्नम ने कुमारप्पा के सामने पूरी तरह से देशी चीज़ों का इस्तेमाल पेन तैयार करके दिखाया तो उनकी आंखें खुली कि खुली रह गईं। सच्चाई अब सामने थी, जब गांधी जी को यह पता चला तो वह बेहद खुश हुए। उन्होंने कोसुरी भाइयों का उपहार स्वीकार किया और वर्धा से अपने हाथ से लिखा हुआ एक पत्र उन्हें भेजा। जिसमें लिखा था - प्रिय रत्नम, आपने मुझे जो फाउंटेन पेन भेजा है, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं. यह बाज़ार में मिलने वाले विदेशी पेनों का एक अच्छा विकल्प लगता है।

स्वदेशी आंदोलन का राष्ट्रीय प्रतीक

गांधी जी के इस पत्र ने एक स्थानीय व्यवसाय को स्वदेशी आंदोलन के एक राष्ट्रीय प्रतीक में बदल दिया। इसके बाद रत्नम पेंस के ग्राहकों की सूची में कई प्रभावशाली लोग शामिल हुए। जैसे कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री, डॉक्टर, वकील, लेखक और चिरंजीवी एवं पवन कल्याण जैसे फ़िल्म स्टार। समय के साथ-साथ पेन बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री में तो बदलाव आए, लेकिन पेन बनाने के तरीके में कोई बदलाव नहीं आया। वर्ष 1940 में, दोनों भाइयों ने सेल्युलाइड का इस्तेमाल छोड़कर उससे कहीं अधिक हल्के और टिकाऊ ‘एबोनाइट’ का उपयोग शुरू कर दिया। इसी तरह, वर्ष 1990 में, सोने की निब की जगह कानपुर और मुंबई से मंगाई गई उच्च गुणवत्ता वाली स्टील की निबों का इस्तेमाल किया जाने लगा।

ऑर्डर पर ही बनाते हैं पेन

वर्ष 1956 में, यह फैमिली बिजनेस दो हिस्सों में बंट गया- रत्नम पेन वर्क्स और रत्नमसन बॉल पेंस। हालांकि, दोनों की सोच एक ही रही कि कारीगरी किसी भी विज्ञापन से बेहतर होती है। रत्नमसन बॉल पेंस, रत्नम पेन वर्क्स के ठीक सामने सड़क के दूसरी तरफ है और इसकी दीवार पर भी गांधी का पत्र फ्रेम करके लगाया गया है। रत्नम पेन वर्क्स का कामकाज सत्यनारायण के पोते शिवा कोसूरी (56) और उनके भाई रामबाबू (45) संभालते हैं। हर पेन ऑर्डर पर बनाया जाता है। यहां कोई असेंबली लाइन नहीं है, केवल 1932 की लेथ मशीनें और कुशल हाथ हैं। एक पेन बनाने में औसतन 4 से 5 घंटे लगते हैं। पेन तीन साइज़ में उपलब्ध हैं - मीडियम , बिग और सुप्रीम। कीमत की बात करें, तो मीडियम के दाम 1,850 रुपए, : बिग के 2,200 और सुप्रीम के 4,500 रुपए हैं। पेन को कड़ी जांच से गुजारा जाता है, ताकि ग्राहक को शिकायत का कोई मौका न मिले। इसके बाद उसे एक केस में पैक किया जाता है, जिसमें एक इंक ड्रॉपर और गांधी जी द्वारा लिखित पत्र की एक कॉपी होती है। रत्नम पेन वर्क्स सोशल मीडिया पर भी मौजूद है और उसी के माध्यम से अधिकांश ग्राहक ऑर्डर देते हैं।

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